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संजय निरुपम की जगह मिलिंद देवड़ा को क्यों बनाया गया मुंबई कांग्रेस का अध्यक्ष?

संजय निरुपम और मिलिंद देवड़ा के बीच खींचतान की पूरी कहानी.

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मिलिंद देवड़ा और संजय निरुपम में टकराव की शुरुआत मार्च 2015 से ही हो गई थी. यह टकराव अब सतह पर आ गया है.

साल 2004. यह उस दौर की बात है जब संजय निरुपम शिवसेना में हुआ करते थे. वो शिवसेना के हिंदी मुखपत्र 'दोपहर सामना' के संपादक थे. शिवसेना के कार्यकर्ताओं के बीच उनकी पहचान बाल ठाकरे के दत्तक पुत्र की तरह हुआ करती थी.  2004 के लोकसभा चुनाव में संजय निरुपम मुंबई (उत्तर-पश्चिम) लोकसभा सीट से मैदान में उतर गए. उनके सामने थे कांग्रेस के कद्दावर नेता सुनील दत्त. मुंबई उत्तर-पश्चिम सीट सुनील दत्त का गढ़ हुआ करती थी. वो यहां से चार मर्तबा सांसद रह चुके थे. शुरुआत में यह मुकाबला एकतरफा माना जा रहा था. लेकिन संजय निरुपम ने अपने तेज-तर्रार भाषणों से माहौल बदल दिया. संजय से पार पाने में सुनील दत्त को काफी मशक्कत करनी पड़ी थी. हालांकि वो 47,358 वोट से चुनाव हार गए, लेकिन चुनाव लड़ने के ढंग ने विरोधियों को भी उनका कायल बना दिया.

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साल 2005. शिवसेना का बीजेपी के साथ गठबंधन था, लेकिन संजय निरुपम की कलम बराबर बीजेपी के खिलाफ चल रही थी. वो दोपहर सामना में बीजेपी की कड़ी आलोचना कर रहे थे. प्रमोद महाजन के साथ उनकी तकरार सतह पर थी. इस बीच आया रिलायंस इंफोकॉम के शेयर आवंटन में गड़बड़ी का मामला. इस शेयर घोटाले के छींटे प्रमोद महाजन के दामन तक भी पहुंचे. उनके एक करीबी व्यवसायी को गलत तरीके से रिलायंस इंफोकॉम के शेयर आवंटित हुए हैं. जिस समय यह आवंटन हुआ, महाजन केन्द्रीय संचार मंत्री हुआ करते थे. संजय निरुपम ने महाजन के खिलाफ मोर्चा खोल दिया. यह फरवरी 2005 की बात है. इधर महाजन शिवसेना के कार्यकारी प्रमुख उद्धव ठाकरे पर संजय निरुपम के खिलाफ एक्शन लेने का दबाव बना रहे थे. आखिरकार 9 मार्च 2005 को उद्धव ने निरुपम को महाजन से सार्वजानिक तौर पर माफ़ी मांगने के लिए कह दिया. निरुपम ने सरेंडर करने से इनकार कर दिया और शिवसेना छोड़ दी.


2005 तक शिवसेना बदल चुकी थी. पार्टी चल तो बाल ठाकरे के नाम पर रही थी लेकिन उसे असल में चला रहे थे उद्धव ठाकरे.
2005 तक शिवसेना बदल चुकी थी. पार्टी चल तो बाल ठाकरे के नाम पर रही थी, लेकिन उसे असल में चला रहे थे उद्धव ठाकरे.

अब तक संजय निरुपम की पहचान फायरब्रांड शिवसैनिक की हुआ करती थी. वो अक्सर सोनिया गांधी और कांग्रेस को लेकर हमलावर हुआ करते थे. 2005 में उन्होंने शिवसेना का पल्ला छोड़कर कांग्रेस का दामन थाम लिया. पत्रकारों ने उनसे पूछा कि अब तक सोनिया गांधी के बारे में दिए उनके बयानों का क्या होगा? निरुपम का जवाब था कि वो शिवसेना और उसकी विचारधारा को छोड़कर आए हैं. अब वो कांग्रेस में हैं और कांग्रेस की विचारधारा को मानते हैं.

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लेकिन एक बयान से अतीत को साफ़ नहीं किया जा सकता. 2005 में संजय निरुपम कांग्रेस में थे. सुनील दत्त की मौत हो चुकी थी. प्रिया दत्त मुंबई (नार्थ-वेस्ट) सीट पर हुआ उपचुनाव जीतने में कामयाब रहीं. प्रिया को अपने पिता और संजय के बीच हुआ चुनावी मुकाबला याद था. निरुपम ने उस समय सुनील दत्त के खिलाफ खूब बयानबाजी की थी. कहते हैं कि प्रिया ने संजय निरुपम को कांग्रेस में शामिल करने का जमकर विरोध किया था. यहां से संजय निरुपम के खिलाफ मुंबई कांग्रेस में खेमेबाजी की शुरुआत हुई.

साल 2007. देश की तमाम लोकसभा और विधानसभा सीटों की नए सिरे से हदबंदी हुई. इससे कई जगहों के राजनीतिक समीकरण बदल गए. मुंबई में कुल छह लोकसभा सीटे हैं. गुरुदास कामत कांग्रेस के कद्दावर नेता थे और मुंबई (नार्थ-ईस्ट ) सीट से चुनाव लड़ते आए थे. 2007 परिसीमन ने उनका राजनीतिक समीकरण बिगाड़ दिया. 2009 के लोकसभा चुनाव में वो (मुंबई नार्थ-ईस्ट) की बजाए, मुंबई (नार्थ-वेस्ट) सीट चुनाव में उतरे. संजय निरुपम भी इस सीट से टिकट मांग रहे थे. कामत के दबाव में उन्हें मुंबई उत्तर सीट से चुनाव लड़ना पड़ा. 2009 में देश में कांग्रेस के पक्ष में माहौल था. संजय निरुपम लोकसभा पहुंचने में कामयाब रहे. दिल्ली में रहे तो टीवी में रहे, कांग्रेस के प्रवक्ता के तौर पर. राहुल गांधी के साथ करीबी बढ़ी. गुरुदास कामत अनुभवी राजनेता थे. वो जानते थे कि आलाकमान से करीबी का क्या मतलब होता है. इस तरह मुंबई कांग्रेस में संजय निरुपम के खिलाफ दूसरा धड़ा खड़ा हुआ.


यह कार्टून बाल ठाकरे ने अपने हाथ से बनाया था. जवानी के दौर में. वो जिंदगी भर मराठी मानुष की राजनीति करते रहे.
यह कार्टून बाल ठाकरे ने अपने हाथ से बनाया था. जवानी के दौर में.

तीन दशक से बाहरी

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संजय निरुपम ने शिवसेना से अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत की थी. शिवसेना हिंदुत्व के अलावा महाराष्ट्र में 'मराठी मानुष' की राजनीति करती आई है. उत्तर भारतीयों को लेकर शिवसेना हमेशा से मुखर रही है. संजय निरुपम मूलतः बिहार के रहने वाले हैं. वो शिवसेना में रहते हुए भी अक्सर 'परप्रांतीय' या बाहरी होने का आरोप झेलते रहे. शिवसेना के मराठी मानुष की राजनीति में वो फिट नहीं बैठते थे. उत्तर भारतीय होने की वजह से वो अक्सर राज ठाकरे के निशाने पर भी रहते हैं. कांग्रेस में उनके साथ यह संकट नहीं था. लेकिन कांग्रेस के साथ दूसरी दिक्कत थी. चाहे इंदिरा का दौर हो या राजीव का, कांग्रेस में दूसरी पार्टी से आए नेताओं को अपने लिए जगह बनाने में बहुत दिक्कत आती है. 2005 में निरुपम शिवसेना से कांग्रेस में आए थे. लेकिन 'बाहरी' का टैग बदस्तूर जारी रहा.

साल 2014. देश में नरेंद्र मोदी की लहर. मुंबई की छह की छह सीटों पर कांग्रेस को करारी हार झेलनी पड़ी. सबसे बड़ी हार हुई संजय निरुपम की. लगभग साढ़े चार लाख वोट से. मुंबई में कांग्रेस की इस करारी हार के बाद मुंबई रीजनल कांग्रेस कमिटी के अध्यक्ष जनार्दन चांदुरकर को दूसरा कार्यकाल मिलने की कोई उम्मीद नहीं थी. नए अध्यक्ष के लिए दो लोगों की दावेदारी थी. पहले थे मिलिंद देवड़ा. कद्दावर नेता मुरली देवड़ा के बेटे. दूसरे थे संजय निरुपम. यहां निरुपम को अपनी आलाकमान के साथ करीबी काम आई. गुरुदास कामत के विरोध के बावजूद उन्हें मुंबई कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया. तारीख थी 2 मार्च 2015. इसके पीछे एक तर्क यह भी दिया गया कि संजय निरुपम को विपक्ष की राजनीति का लंबा अनुभव है. संजय निरुपम ने कांग्रेस की कमान संभालते ही मुंबई में कांग्रेस की रणनीति में बदलाव शुरू किया. वो कांग्रेस को फिर से सड़क पर ले गए. रैली-धरने करने लगे. कांग्रेस का झंडा थामे वो शिवसेना स्टाइल में राजनीति कर रहे थे.

बगावत की शुरुआत

मुंबई कांग्रेस में परम्परागत तौर पर दो धड़े हुआ करते थे. पहला धड़ा था गुरुदास कामत का और दूसरा धड़ा था मुरली देवड़ा का. अब मुरली देवड़ा के धड़े की कमान उनके बेटे मिलिंद देवड़ा के पास आ गई थी. संजय निरुपम के कमान संभालने के साथ मुंबई कांग्रेस तीन धड़ो में बंट गई.अगस्त 2018 में गुरुदास कामत का देहांत हो गया. इसके बाद उनके धड़े के ज्यादातर लोग मिलिंद के खेमे में आकर मिल गए. सितंबर 2018 में मुंबई कांग्रेस के भीतर चल रही खींचतान सतह पर आ गई.

16 सितंबर 2018 को महाराष्ट्र के कांग्रेस प्रभारी मल्लिकार्जुन खडगे मुंबई में थे. यहां मिलिंद देवड़ा के नेतृत्व में कांग्रेस नेताओं का दल उनसे मिलने पहुंचा. इस दल की मांग थी कि संजय निरुपम को मुंबई कांग्रेस अध्यक्ष पद से हटाया जाए. असंतुष्टों से मल्लिकार्जुन खडगे की यह मुलाकात आलाकमान के इशारे पर हुई थी. दरअसल संजय विरोधी गुट के नेता दिल्ली जाकर राहुल गांधी से मिलना चाहते थे. राहुल गांधी के दफ्तर से उन्हें निर्देश दिया गया कि अपनी शिकायत को 'थ्रू प्रॉपर चैनल' आलाकमान पहुंचाया जाए. मल्लिकार्जुन खडगे ने असंतुष्ट नेताओं की बात सुनी. राहुल गांधी को रिपोर्ट देने की बात कही और मुंबई से दिल्ली लौट आए. मल्लिकार्जुन खडगे से मुलाकात के बाद असंतुष्ट विधायकों को उम्मीद थी निरुपम के खिलाफ आलाकमान कुछ एक्शन लेगा. लेकिन कुछ नहीं हुआ. इसके बाद असंतोष और ज्यादा बढ़ गया.


राहुल गांधी, संजय निरुपम और गुरुदास कामत.
राहुल गांधी, संजय निरुपम और गुरुदास कामत.

टकराव की नई वजह मुंबई उत्तर-पश्चिम भी है. गुरुदास कामत के जाने के बाद संजय निरुपम इस सीट पर अपना दावा जाता रहे हैं. पिछले दो चुनाव वो मुंबई उत्तर सीट से लड़े हैं. यह सीट परम्परागत तौर पर बीजेपी का गढ़ मानी जाती है. संजय निरुपम 2009 में गुरुदास कामत के दबाव में मुम्बई उत्तर सीट पर गए थे. अब वो अपने लिए सुरक्षित सीट चाहते हैं. इधर किसी दौर में कांग्रेस का उत्तर भारतीय चेहरा रहे कृपाशंकर सिंह भी इस सीट से अपनी उम्मीदवारी जता रहे थे.

जनवरी 2019. लोकसभा चुनाव से चार महीने पहले प्रिया दत्त ने परिवार को समय देने की बात कहते हुए अगला लोकसभा चुनाव लड़ने से मना कर दिया. तब यह कयास लगाए गए कि प्रिया शायद निरुपम के मामले में आलाकमान पर दबाव बनाने का प्रयास कर रही थीं. हालांकि अब प्रिया दत्त मुंबई नार्थ-सेंट्रल सीट से कांग्रेस की टिकट चुनाव लड़ रही हैं. इसके बाद 3 फरवरी को मिलिंद देवड़ा ने टीवी स्क्रीन से संजय निरुपम पर हमला बोल दिया. न्यूज़ 18 को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा,

'मुंबई कांग्रेस में जो चल रहा है, कई दफा मैं खुद उससे निराश हो जाता हूं. मुझे खुद कई बार लगता है कि अगला चुनाव लड़ा जाना चाहिए या नहीं. मैंने हाल ही में राहुल गांधी को इस बारे में बताया भी. अगर लोगों को फिर से एकजुट नहीं किया गया तो मुझे भी पता नहीं है कि मैं राजनीति में रह पाऊंगा या नहीं."


इसके दो दिन बाद उन्होंने मुंबई कांग्रेस की खस्ता हालत के बारे में ट्वीट की झड़ी लगा दी. अपने हालिया ट्वीट में मिलिंद ने कहा है कि मुम्बई कांग्रेस की अंदरूनी कलह की वजह से पार्टी का जमीनी समर्थन खिसक रहा है. एक ट्वीट में उन्होंने लिखा,


"मुंबई जैसे शहर में जोकि हमारी सांस्कृतिक और आर्थिक राजधानी है हमें लोगों को एकसाथ लाना चाहिए. मुंबई कांग्रेस गुटबाजी का मैदान नहीं बन सकती, जिसमें एक नेता दूसरे के लिए गड्ढे खोदे."

मिलिंद देवड़ा के हालिया बयान इस बात की तस्दीक करते हैं कि मुंबई कांग्रेस में पानी खतरे के निशान के बहुत ऊपर बह रहा था. चुनाव से ठीक पहले आलाकमान को समझ में आया कि स्थिति को और ज्यादा टालना खरतनाक साबित हो सकता है. लिहाजा संजय निरुपम के हाथ से मुंबई कांग्रेस की कमान छीनकर मिलिंद देवड़ा के हाथ में थमा दी गई है. निरुपम को इस कुर्बानी के बदले मुंबई नार्थ-वेस्ट सीट थमा दी गई है. आलाकमान के इस फैसले से चुनाव में पार्टी का प्रदर्शन कितना सुधरता है ये तो वक़्त ही बताएगा.




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