
मानीबाई गोलछा दुकान का नाम है
तो सुनो. दुकानदार का नाम पीयूष गोलछा. ये दुकान मार्केट में सबसे पहले यानी 8 बजे सुबह खुल जाती है. पीयूष जैन हैं और पक्के पुजारी हैं. सुबह सवेरे नहाकर धोती लपेटकर पूजा करने जाते हैं और लौटकर दुकान खोलते हैं. ये घर में ही है. ये भी समझ लो कि दुकान 15 फरवरी 2012 को खुली है, वैलेंटाइन्स डे के एक दिन बाद. और घर 2013 में बना है. इससे वो कहावत याद आ जाती है कि दुकान से मकान बन सकता है लेकिन मकान से दुकान नहीं.

मम्मी पापा के साथ पीयूष
दुकान खुली कैसे? इसका भी किस्सा है. पीयूष ने 2008 में बारहवीं पास की. स्कूल में टॉप किया. उसके बाद बी.कॉम किया, एम.कॉम किया. फिर रायपुर चले गए, CA की कोचिंग करने. इस बीच पापा की तबीयत काफी खराब हो गई. उनकी पहले से कपड़े की दुकान है. वो चाहते थे कि छोटा बेटा यानी पीयूष का छोटा भाई आयुष एक और कपड़े की दुकान खोल ले. लेकिन उसने नहीं खोली. घर में गरमा गरमी भी हुई. फिर पीयूष ने कहा- रुको हम खोलते हैं. फिर ये दुकान खुल गई.

अंदर से कपड़े की दुकान
अब सुनो इस दुकान में मिलता क्या क्या है. बाहर से लोग फटे कपड़े टंगे देखकर हंसते हुए अंदर घुसते हैं तो भौचक रह जाते हैं. सब मिलता है भई सब. पैदाइश से मरने तक की ड्रेस. बिना जेब की नैपी से लेकर बिना जेब के कफन तक सब कुछ. पूरी मार्केट में कपड़ों को 80-90 दुकाने हैं. लेकिन हर जगह सब कुछ नहीं मिलता. उन्होंने सारे पैसे डिस्प्ले और प्रचार में लगा दिए होंगे ;) पीयूष ने बताया कि 110 नंबर की चड्डी भी यहां मिल जाएगी. अमित शाह से भी मोटा आदमी हो उसके लिए ये साइज लगता है. यहां 400 में चार साड़ियां भी मिल सकती हैं और 10 हजार की एक भी है.

अपनी दुकान में स्वैग से स्वागत करते पीयूष
पीयूष ने इस दुकान से बहुत दाम भी कमाया और नाम भी. 'जो दिखता है वो बिकता है' वाली थ्योरी भी पलट दी. अब वो बिकता है जो भाईसाब बेचते हैं.

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