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ये डॉक्टर लोगों को अपना खून पीने की सलाह देता था, ड्रैकुला स्टाइल में

इलाहाबाद की घटना है ये.

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तांबे के एक कटोरे में एक नींबू निचोड़िए. उसमें 100 ग्राम शुद्ध शहद मिलाइए. फिर उसमें बूंद-बूंद कर के लगभग 50 से 100 सीसी ताजा खून टपकाइए और इन सबको तांबे के एक चम्मच से मिलाइए. खून खुद का ही इस्तेमाल करना है. ये ड्रैकुला के नाश्ते की चटनी नहीं है. ये इलाहाबाद के डिग्रीधारी डॉक्टर आर सी गुप्ता ने गठिया के इलाज के लिए सुझाया था. ये कहानी है 90 के दशक की. इंडिया टुडे में रिपोर्ट हुई थी. बाकी डॉक्टर तो हक्के-बक्के रह गये थे. पर रोगी इस्तेमाल करने लगे थे. मैगजीन में रिपोर्ट छपने तक 26 रोगी तो हफ्ते में दो बार अपना खून पीते हुए पांच हफ्ते का कोर्स पूरा कर चुके थे. बहुत लोग तो इसका फायदा भी बता रहे थे. कई लोग तो ये कहने लगे कि दस साल से बीमार था. ठीक हो रहा हूं. गुप्ता कोई नीम-हकीम नहीं थे. सर्जरी में मास्टर्स थे. मेडिकल कॉलेज के एक डिपार्टमेंट हेड रह चुके थे. इनको नेशनल और इंटरनेशनल अवॉर्ड भी मिल चुके थे. पर ये मेडिकल के तमाम नियमों से अलग अपने नियम बना लेते थे. इनका ज्ञान लोगों को तब पता चला जब इन्होंने अपने कलीग डॉक्टर रौतेला को खून से सना सैंडविच खाने को दिया. रौतेला खा भी गये. पता नहीं क्या समझा दिया था. हालांकि इसके बाद रौतेला को 15 दिन अस्पताल में रहना पड़ा. इस घटना से खौफ खा मेडिकल कॉलेज के छात्रों ने हड़ताल कर दी. गुप्ता को रिटायर होने के आठ दिन पहले सस्पेंड कर दिया गया. पर गुप्ता पर कोई फर्क नहीं पड़ा. अपना प्रयोग जारी रखा. रोगी भी आते रहे. प्रतापगढ़ की 17 वर्ष की काकुल ने दावा किया कि पांच हफ्ते में तो गठिया उड़न-छू हो गया. 26 साल के छोटे प्रसाद को दस साल में पहली बार फायदा नजर आने लगा. मध्य प्रदेश की 39 साल की शशि वर्मा के मुताबिक तो उनको नया जीवन मिल गया. पर सारे मरीज अपना खून पीने के लिए राजी नहीं होते थे. बहुत से डॉक्टर नाराज थे इस इलाज से. डॉक्टर गुप्ता को बहुत गाली देते थे. पर गुप्ता कहां मानने वाले थे. फीस भी बहुत कम लेते थे. इसलिए कोई उन पर लोगों को बहका के रुपये बनाने का भी आरोप नहीं लगा सकता था. हमारे देश में मेडिकल की हालत इतनी बुरी है कि आज भी कोई चाहे तो अपनी डॉक्टरी जमा सकता है. इसी तरीके से. गुड़गांव में ही तो एक डॉक्टर खिलौनों से इलाज करता था. पर ये फीस बहुत लेता था. लोग देते भी थे. आर सी गुप्ता वाली घटना 1991 की है. पर 25 साल बाद भी देश में ज्यादा बदला नहीं है.
 

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