खुद प्रणव के शब्दों में
मैं शायद इकलौता आदमी हूं जो 1978 में बनी कांग्रेस की वर्किंग कमेटी में था. और कुछ सालों का अपवाद छोड़ दूं तो 2012 तक इसमें रहा.ये अपवाद हर बार छोड़ दिए जाते हैं. वो समय जब राजीव गांधी ने प्रणव मुखर्जी को साइडलाइन कर दिया. इंदिरा के बाद नंबर टू की हैसियत वाला आदमी, जिसे राजीव ने अपनी कैबिनेट में जगह तक नहीं दी. फिर पार्टी में भी नोटिस पर नोटिस. आखिर में मुखर्जी ने पार्टी छोड़ दी, अपनी पार्टी बनाई और बुरी तरह हारे पश्चिम बंगाल के चुनाव में. इस बीच कांग्रेस के उनके पुराने दोस्त राजीव के साथ दोस्ती की कोशिशें करवाते रहे. आखिर में राजीव ने माफ किया, मगर उसके कुछ समय बाद सत्ता ही नहीं रही.

बाएं से माखनलाल फोतेदार, सोनिया गांधी और नटवर सिंह.
प्रणव की गांधी खेमे में वापसी कैसे हुई. 1998 के पंचमढ़ी अधिवेशन से. पेशे से वकील प्रणव मुखर्जी ओल्ड स्कूल कांग्रेसी हैं. ड्राफ्टिंग स्किल्स में माहिर और परिवार के लिए लॉयल. सोनिया तब नई नई पार्टी अध्यक्ष बनी थीं. पुराने वफादारों मसलन माखनलाल फोतेदार, नटवर सिंह और आरके धवन के जरिए काम चला रही थीं. उस दौरान उन्होंने प्रणव मुखर्जी का कौशल देखा. और फिर धीमे धीमे उन्हें पार्टी में जिम्मेदारी मिलने लगी. सोनिया के ही कहने पर 2004 में दशकों बाद प्रणव मुखर्जी राज्यसभा के बजाय लोकसभा के लिए दावेदारी करते नजर आए. जब कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन को सरकार बनाने का मौका मिला, तो सबको लगा सोनिया पीएम बनेंगी. जब सोनिया ने इनकार किया तो प्रणव मुखर्जी को लगा कि उनका चांस आ गया है. वह चांस, जिसके चक्कर में 1984 में राजीव गांधी बुरा मान गए थे. इसलिए इस बार प्रणव चुप रहे. बोलते भी तो क्या होता. सोनिया एक ऐसा आदमी चाहती थीं, जिसका राजनीतिक वजन न हो और न ही होने की संभावना हो. यानी मनमोहन सिंह. राज्यसभा में उनके सलाहकार और नेता प्रतिपक्ष.

बुक लॉन्च के दौरान पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी और पूर्व प्रधानमंंत्री मनमोहन सिंह.
अब प्रणव के सामने मुश्किल. जो आदमी तीन दशक तक उनका जूनियर रहा हो, उसकी कैबिनेट में कैसे काम करें. उन्होंने सोनिया से कहा कि मुझे सरकार नहीं संगठन में ही रहने दीजिए. मगर सोनिया जानती थीं कि प्रणव मुखर्जी स्टाइल ऑफ पॉलिटिक्स की उनको बहुत जरूरत पड़ेगी. क्योंकि यूपीए वन की सेहत लेफ्ट फ्रंट के भरोसे है. प्रणव मुखर्जी की बंगाल ब्लॉक के कम्युनिस्टों से अच्छी बनती थी. इसके अलावा दशकों का संसदीय अनुभव फ्लोर मैनेजमेंट में काम आता था. ऐसे में प्रणव मुखर्जी को मानना पड़ा. मनमोहन ने भी अपने एक्स बॉस का मान रखा.
प्रणव अपनी स्टाइल से काम करते रहे और मनमोहन ने उसमें ज्यादा दखल नहीं दिया. अब कुछ भी कहा जाए, मगर तब सभी जानते थे कि प्रणव मनमोहन के बजाय सोनिया को ही रिपोर्ट करते थे, प्रकट और परोक्ष रूप से. सोनिया प्रणव की कार्यशैली से वाकिफ थीं और इससे सरकार का भी काम चल रहा था. मसलन, न्यूक्लियर डील के मसले पर प्रणव मुखर्जी ने ज्योति बसु को मना लिया था. मगर प्रकाश करात और केरल लॉबी ने ज्योति बाबू की सलाह को ठेंगे पर रखा और सरकार गिराने के लिए बीजेपी के साथ जाने को तैयार हो गए. फिर प्रणव ने बाकी दलों को साधा. साधने की उनकी कला कभी गुस्सा दिखाकर तो कभी चुप रह गुस्सा देखने में सफल होती थी. जब कैबिनेट मीटिंग में प्रणव मुखर्जी की कम सुनी जाती तो वह तेज आवाज में बात रखने लगते. मगर जब उसी कैबिनेट मीटिंग में ममता बनर्जी चीखतीं तो प्रणव बाबू चुप हो सुनते. इस चुप्पी के कई गुण थे. ममता लाख प्रणव को कोस लें, कभी कांग्रेस में अपने पराभव के लिए, तो कभी कम्युनिस्टों के साथ दोस्ती के लिए, मगर उनका आपसी मान था. तो जब तक प्रणव कांग्रेस में सक्रिय रहे, कायम और इसी अर्थ में सफल रहा. और 2012 में प्रणव के राष्ट्रपति बनने के कुछ ही महीनों के बाद ममता बनर्जी यूपीए से बाहर चली गईं.

सोनिया गांधी ने प्रणव मुखर्जी को मनमोहन सरकार में मंत्री बनाया था.
सोनिया को अंदाजा था कि प्रणव के राष्ट्रपति भवन जाने के क्या नुकसान हैं. इसीलिए 2007 में रेस में सबसे आगे नाम होने के बाद भी उन्हें पीछे खींच लिया गया. जबकि वह लेफ्ट और समाजवादी ब्लॉक से लेकर डीएमके तक की पहली पसंद थे. मगर सोनिया और मनमोहन को उनके रणनीतिक कौशल की सरकार में ज्यादा जरूरत थी. ऐसे में प्रतिभा पाटिल की किस्मत खुली. 2009 के चुनाव में 1991 के बाद पहली बार कांग्रेस ने 200 का आंकड़ा पार किया. मगर तीन सालों में ही कभी कोल स्कैम, तो कभी सीडब्लूजी स्कैम, तो कभी लोकपाल आंदोलन के चलते यूपीए 2 की साख जमीन पर लोटती नजर आने लगी. उसी दौर में आए एक बार फिर से राष्ट्रपति के चुनाव. यूपीए के पास जरूरी वोटों से एक लाख मूल्य कम के वोट थे. प्रणव मुखर्जी को लग रहा था कि अब उनकी किस्मत खुलने को है. आठ साल पीएम रहे मनमोहन सिंह को मैडम प्रेजिडेंट बना देंगी. और प्रणव पीएम बन जाएंगे. दो साल के लिए ही सही. आखिरी दौर में ही सही. लेकिन सोनिया ने एक बार फिर प्रणव को चौंका दिया. मनमोहन कायम रहे और प्रणव से कहा गया कि सिर्फ आपके नाम पर ही विपक्षी दलों को साथ लाया जा सकता है. प्रणव भी समझ गए. तारीख में दो ही नाम दर्ज होते हैं. या तो पीएम या प्रेजिडेंट. तो प्रेजिडेंट ही सही. उनकी उम्मीदवारी के ऐलान के बाद शेर-बकरी ने एक घाट पर पानी पिया. सपा-बसपा दोनों ने सपोर्ट किया. ममता बनर्जी और लेफ्ट ने भी ऐसा ही किया. सोनिया की गणित थी कि 2014 के लोकसभा चुनाव में किसी पार्टी को बहुमत न मिलने पर राष्ट्रपति का रोल अहम होगा. ऐसे में एक पुराना कांग्रेसी रायसीना हिल्स पर बैठ फैसला ले तो बढ़िया. मगर जनता ने इसकी नौबत नहीं आने दी.

प्रणव मुखर्जी और (दाएं) पीयूष गोयल.
2014 में कांग्रेस क्यों हारी. इस सवाल की कैफियत प्रणव मुखर्जी सधे और सुरक्षित ढंग से पेश करते हैं. उनके मुताबिक यूपीए के पहले कार्यकाल में कांग्रेस की संख्या 150 से कम थी. लचीलापन ज्यादा था. गठबंधन को साधने के बाद भी अहम फैसले हो रहे थे. वह चाहे आरटीआई हो या मनरेगा. न्यूक्लियर डील या किसानों की ऋण माफी. मगर यूपीए टू में कांग्रेस को अपनी 200 से ज्यादा सीटों का घमंड हो गया. उसने सहयोगी दलों को ठीक से समायोजित नहीं किया. इसके अलावा सहयोगी दलों के मंत्रियों पर करप्शन के इल्जाम लगे. इन सबके चलते कांग्रेस हारी. हालांकि कांग्रेस को अपनी इतनी बुरी हार और बीजेपी की इतनी बड़ी जीत का इल्म नहीं था. उन दिनों राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी से मिलने कई नेता जाते. कांग्रेस के. सब बताते, हम कम से कम 170-180 सीटें जीतेंगे. बीजेपी को वह खुद से दसेक सीटें ही ज्यादा देते. सिर्फ मनमोहन और सोनिया ही नंबरों की कयासबाजी से बचे. उन्होंने प्रणव से सिर्फ इतना कहा, मामला क्रिटिकल है. उधर बीजेपी के पीयूष गोयल ने मुखर्जी को अपनी पार्टी के बारे में 260 का आंकड़ा दिया. और आखिर में पीयूष ही सही साबित हुए.

अपनी बेटी शर्मिष्ठा के साथ पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी.
आखिर का जिक्र आया. प्रणव मुखर्जी अब बतौर राष्ट्रपति रिटायर हो चुके हैं. कांग्रेस अब भी सलाहकार के रूप में उनकी सेवा ले सकती है. मगर ये सोनिया वाली नहीं, राहुल वाली कांग्रेस है, जो नए सिरे से राह बनाने की जैसे भी हो कोशिश कर रही है. उस राह में ओल्ड गार्ड के नए वर्जन के आखिरी पालनहारों में से एक के जिम्मे क्या काम आएगा, समझना आसान है. फिर भी प्रणव मुखर्जी ने सेफ खेला है. अपनी आत्मकथा के तीन खंडों में विवादित विषयों से बचे हैं .गांधी परिवार के प्रति दरियादिल रहे हैं. क्योंकि उन्हें अपने परिवार की भी चिंता करनी है. बेटी शर्मिष्ठा मुखर्जी जो अब लुटियंस दिल्ली की राजनीति कर रही हैं.

प्रणव दा, जो कि उनका प्रचलित नाम था, सारी जिंदगी यही करते रहे और खूब करते रहे. सब कुछ पाया. बस इक मलाल रहा. पीएम न बन पाने का. और उसकी खुद उन्होंने तीन वजहें गिनाईं. पहली, कामराज वाला लॉजिक, जो हिंदी नहीं बोल सकता, वो पीएम नहीं रह सकता. दूसरी, वह एक ऐसे राज्य से आते हैं, जहां कांग्रेस कमजोर है. जब आपकी बैकिंग के लिए एक सॉलिड स्टेट न हो तो नंबर आपके हक में नहीं होंगे. तीसरा, अपने राजनीतिक करियर में ज्यादातर वह राज्यसभा के रास्ते आए. ऐसे में जनता से सीधा जुड़ाव रखने वाले नेता की छवि नहीं बन पाई. पाइप पीकर रणनीति बनाने वाले पॉलिटिकल मैनेजर की छवी रही. राजनीति अंततः छवियों का खेल है. अस्तु.
वीडियो में देखें किस्सा प्रणव मुखर्जी के राष्ट्रपति बनने का
इन 5 चीजों के लिए देश मनमोहन सिंह को थैंक्यू बोलेगा
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रिटायर होने के बाद राष्ट्रपति रहने कहां जाते हैं?













