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हर मोहल्ले में पाए जाते हैं, ये दस किस्म के पड़ोसी

बबली की मम्मी, बेंजामिन साहब, पम्मी आंटी, ठाकुर बब्बा. और कौन-कौन से तो बसते हैं मोहल्लों में.

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फोटो - thelallantop
हमारे मोहल्लों में किस्म-किस्म के लोग रहते हैं. कुछ तो हर एक मोहल्ले में एक जैसे ही रहते हैं. थोड़ा-बहुत ऊपर-नीचे करके लगभग कॉमन से ही होते है. आंटियां होती हैं, इरिटेटिंग बच्चे होते हैं. कुछ लोगों के डरावने घर होते हैं. घर की खिड़की से बाहर झांकें, तो ये दस तो नजर आ ही जाएंगे. अब न आएं तो तब तो नजर आते ही थे, जब आप मोहल्ले में रहते थे. मैक्सी वाली पम्मी आंटी पम्मी आंटी मैक्सी पहनती हैं. ऐसा करने वाली अपनी उम्र की मोहल्ले में वो पहली और इकलौती होती हैं. बालों में डाई करती हैं. सुबह-सुबह योगा करती हैं. जब सब्जी लेने जाती हैं तो मैक्सी पर दुपट्टा डाल लेती हैं. उनका लड़का बैंगलोर में रहता है. मोहल्ले में पहली लव मैरिज इन्हीं की बेटी ने की थी. महाराजा गेट वाले अंकल-आंटी ये दोनों मोहल्ले के वो लोग होते हैं. जिनके बच्चे अमेरिका में रहते हैं. इनके घर के बाहर गार्डन होता है. जिसमें गुड़हल के लाल वाले फूल लगते हैं. इनके घर में लाल बीज के अमरूद वाला पेड़ होता है, जो बाउंड्री से बाहर आता है. इनको हम जितना जानते हैं, उनके यहां काम करने वालों से जानते हैं. लल्लू अंकल लल्लू अंकल की एक खासियत होती है. उनके हाथ में हमेशा तमाखू-चूने वाली झोरी होती है. अमूमन ये सुपारी काटते पाए जाते हैं. इनके यार दोस्त भी सारे पान-गुटखावाले होते हैं. मोहल्ले का कोई कार्यक्रम हो पतलून की जेब में हाथ दिए खी-खी-खी करते लड़के इन्हीं के आस-पास होते हैं. ये उमर में बहुत बड़े होते हैं पर इनके आसपास भीड़ इसलिए जुटती है. क्योंकि ये जवान होते लड़कों के बीच नॉनवेज जोक मारते रहते हैं. बबली की मम्मी बबली की मम्मी को उनके नहीं बबली के नाम से जाना जाता है. यही उनकी सबसे बड़ी समस्या होती है. क्योंकि बबली सालों पहले 'भाग' गई होती है. ये स्कूल टीचर होती थीं. ये किसी से बहुत मिलने-विलने नहीं जातीं. इनके घर जाओ तो खुर्मा खिलाती हैं. पिंटू भइय्या वो सब कर सकते हैं. एंटीना सुधार सकते हैं. सीधी बाउंड्री पर चढ़ जाते हैं. हाथ छोड़कर साइकल चला लेते हैं. ट्यूबलाइट भी फ्यूज हो जाती है तो फिर जला लेते हैं. किसी के घर पर कोई भी काम हो, उन्हीं को याद किया जाता है. इंटरनेट कनेक्शन लगवाना हो, उनको बुलाया जाता है. रीठा और मेहंदी असली वाली कहां मिलती है. ये बस उनको पता होता है. उनसे सब डरते थे. जो लड़का मोहल्ले के लड़कों को पीटता है. उसे छुट्टे में पकड़ के पीटते हैं. मोहल्ले में पहली पल्सर उन्हीं की थी. कुल जमा मोहल्ले के छोटे-मोटे सुपरहीरो होते हैं. पीले मकान वाले प्रिंसिपल साहब  वहां कौन रहता है, क्या करता है, यह इतना मायने नहीं रखता. मायने रखता है ये कि कहा जाता है उनका घर भुतहा है. उनके मेनगेट में लोहे की जो ग्रिल लगी होती है. उसे देखकर भी डर लगता है. उनके घर के बाहर जो अशोक का पेड़ लगा होता है, उसे भी देखकर डर लगता है. कुछ लोग बताते हैं वहां पहले बच्चों का स्कूल लगता था. एक दिन वहां एक बच्चा मर गया. उसका भूत भटकता है. कुछ लोग बताते हैं उन लोगों ने अपने ही बच्चे को मारकर अपने ही घर में गाड़ दिया. बच्चे सबसे ज्यादा उनके किस्से सुनते हैं. रात को उनके घर की तरफ भी देखने में डरते हैं. डॉक्टर बब्बा ये मोहल्ले के वो वाले सयाने होते हैं, जो मोहल्ले में बड़ों में झगड़ा हो जाए तो सुलझाने आते हैं. इनसे मिलने जो लोग आते हैं वो भी सफेद गाड़ी में आते हैं. बड़ी वाली गाड़ी में. ये दिवाली में छत पर खुल्ले में दारू पीते हैं. इनके यहां बड़ा वाला कुत्ता होता है. इनका नाती चार पहिए वाली साइकल भी चलाने निकलता है. तो उसके पीछे दो लोग दौड़ते हैं. इनके यहां नवरातों में जब कन्या खिलाई जाती है तो साथ में एक सौ एक रुपये और बॉल वाली आइसक्रीम दी जाती है. बेंजामिन साहब इनका घर मोहल्ले का सबसे पहला पक्का घर होता है. कहते हैं ये एयरफोर्स में थे. उसके पहले आजाद हिंद फौज में, कुछ लोग कहते हैं कि इनने सुभाष चंद्र बोस को भी देखा था. इनके बारे में दंतकथाएं चलती हैं. बताते हैं कैसे इनकी बेटी ने एक बार नाग को गोली से मार दिया था. कैसे एक बार इनको अटैक आया तो खुद ही उठकर इलाज के लिए गाड़ी चलाकर अस्पताल जा पहुंचे थे. लोग बताते हैं अब भी इनके पास पुरानी-पुरानी ढेर सी बंदूके हैं. ये हैरी पॉटर के डंबलडोर वाला फील देते हैं. इनकी भौंह के बाल तक पके होते हैं. सोनू सोनू जी का झबार होता है. सिंचाई विभाग वाले बाबू का बेटा होता है. कैप्री पर स्पोर्ट्स शूज पहनता है, उस पर स्कूल वाले सफेद मोज़े पहनता है. प्लास्टिक वाली बॉल से खेले, तो भी दस्ताने पहनकर बैटिंग करता है. जब मोहल्ले के लड़के पटरा छिलाकर बैट-बॉल खेलते हैं, तब इसके पास ब्रिटानिया वाला बैट होता है. इनको क्रिकेट न खिलाओ तो पिन्नाते हैं, खिलाओ तो आउट होकर भी आउट नहीं मानते. यही वो परम होता है जो हारने पर अपना बैट लेकर भाग जाता है. अगली बार खिलाने से ही मनाकर दो, तो इनकी मम्मी छत से रिक्वेस्ट करने लगती हैं, खिला लो लड़के को. ये वही इरिटेटिंग लड़का होता है जो शनिवार को पारले-जी पर मैच रखता है और ऐन मौके पर मम्मी-पापा के साथ स्कूटर पर आगे खड़ा होकर घूमने चला जाता है. गोलू के घरवाले गोलू के पूरे घरवाले दुष्ट होते हैं. ये वो लोग होते हैं जो हर बार किसी भी काम में चंदा लेने सबसे आगे आते हैं और पूरा चंदा गप्प कर जाते हैं. इनके यहां गेंद चली जाए तो कभी नहीं देते. भले इनके घर में दो साल पहले पुताई हुई हो. गेंद दीवार पर लग जाए तो लड़ने घर तक पहुंच जाते हैं. ये इतने कंजूस होते हैं कि कटिया फंसाते हैं और इनकी लग्गी लगने से मोहल्ले भर की लाइट आती-जाती रहती है. इनके लिए हर कोई कहता है कि ये मोहल्ले से चले जाएं, तो सब सुखी हो जाएं.

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