1969 का राष्ट्रपति चुनाव शायद पहला मौका था, जब दूसरी वरीयता के वोट की गिनती की जरूरत पड़ी. पहली वरीयता की गिनती में वी.वी. गिरी को 4,01,515 और कांग्रेस के आधिकारिक उम्मीदवार नीलम संजीव रेड्डी को 3,13,548 वोट मिले. हालांकि, गिरी आगे थे, लेकिन उन्हें जरूरी पचास फीसदी वोट नहीं मिले थे. पिछली
कड़ी में आपने वी.वी. गिरी की नाटकीय उम्मीदवारी और मतदान के किस्से पढ़े.
महामहिम: इस राष्ट्रपति चुनाव के बाद कांग्रेस दो टुकड़ों में बंट गई
इस चुनाव ने कांग्रेस के चरित्र को बदल दिया. इसके बाद आजादी आंदोलन से निकली पार्टी, एक घराने की मिल्कियत बन कर रहा गई.


सेकेंड प्रिफरेंस वोटों की गिनती शुरू हुई. नीलम संजीव रेड्डी को उम्मीद के मुताबिक बढ़त मिलती दिख रही थी. ऑल इंडिया रेडियो हर घंटे इस चुनाव के अपडेट दे रहा था. जो अंतिम नतीजा घोषित हुआ, उसमें रेड्डी के वोट 3,13,548 से बढ़कर 4,05,427 पर पहुंच गए. वहीं वी.वी. गिरी को इस राउंड में महज 19 हजार वोटों का फायदा हुआ. लेकिन, वो बहुमत के जरूरी आंकड़े को पार कर चुके थे. उन्हें 4,20,077 वोट हासिल हुए. लेकिन, ये इस कहानी का अंत नहीं था. कहानी का अंत दो महीने बाद लिखा जाना था.
इस फूट ने कांग्रेस को हमेशा के लिए बदल दिया
1 नवंबर 1969, कांग्रेस की वर्किंग कमिटी की मीटिंग बुलाई गई. कमाल ये था कि मीटिंग एक नहीं, दो जगह चल रही थी. पहली मीटिंग 7, जंतर-मंतर रोड पर कांग्रेस के नेशनल हेडक्वॉर्टर पर और दूसरी 1, सफदरजंग रोड माने प्रधानमंत्री आवास पर. 21 सदस्यों वाली वर्किंग कमिटी में उपस्थित रहने वाले सदस्यों की संख्या दोनों जगह एक ही थी. ये कमाल घटित हुआ केरल के केसी अब्राहम की वजह से. वो दोनों मीटिंग में गए और बराबर समय रुके. अब्राहम के निष्पक्षता दिखाने का ये प्रयास भी कांग्रेस की फूट को टाल नहीं पाया.
इस मीटिंग के कुछ दिनों बाद ही निजलिंगप्पा ने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से बर्खास्त कर दिया. इसके अगले दिन इंदिरा गांधी ने पार्टी के दोनों सदनों के सदस्यों की मीटिंग बुलवाई. कुल 429 सदस्यों में से 310 सदस्य इस मीटिंग में थे. इसमें से 229 सदस्य लोकसभा के थे. ये आंकड़ा बहुमत के लिए काफी नहीं था. इंदिरा को कम्युनिस्ट पार्टी का समर्थन हासिल था. इसके अलावा कई क्षेत्रीय पार्टियां भी इंदिरा के समर्थन में खड़ी थीं. इंदिरा को लोकसभा में बहुमत की चिंता नहीं थी.

के. कामराज के साथ इंदिरा
22 जुलाई 1969 को ऑल इंडिया कांग्रेस कमिटी की रेक्वेज़िशन मीटिंग बुलाई गई. सिंडिकेट ने इस मीटिंग के बहिष्कार का ऐलान किया. कुल 705 में से 446 मेंबर इंदिरा के समर्थन में इस मीटिंग में पहुंचे. संसदीय दल और AICC में अपना बहुमत साबित करने के बाद इंदिरा ने इसी मीटिंग के आधार पर अपनी नई पार्टी बनाई- कांग्रेस (रेक्वज़िशन ). लोकप्रिय भाषा में इसे कांग्रेस (रूलिंग) बुलाया जाने लगा.
इंदिरा को नहीं मिला चुनाव चिन्ह
1952 के पहले चुनाव के समय कांग्रेस ने अपना चुनाव चिन्ह चुना था, ‘बैलों का जोड़ा.’ 1969 में कांग्रेस में फूट के बाद चुनाव आयोग ने इंदिरा को ये चुनाव चिन्ह देने से मना कर दिया. लोगों को भरोसा था कि बैलों के जोड़े के बिना इंदिरा का प्रभाव समाप्त हो जाएगा. इंदिरा के पास नया चुनाव चिन्ह लेने की मजबूरी थी. उन्होंने चुनाव चिन्ह चुना ‘बछड़े को दूध पिलाती गाय”. 1972 का लोकसभा चुनाव उन्होंने इसी चिन्ह पर लड़ा और जीता. इंदिरा की कांग्रेस 43 फीसदी मतों के साथ 352 सीट जीतने में कामयाब रही. कामराज के नेतृत्व वाली कांग्रेस (ओ) को महज 10 फीसदी वोट और 16 सीटें हासिल हुई. ये धमाकेदार जीत थी, जिसमें तानाशाही की आहट छिपी हुई थी.

कांग्रेस(आर) का पोस्टर (स्त्रोत: Guruprasad's Portal)
वैसे वी.वी. गिरी का राजनीतिक जीवन भी कम उतार-चढ़ाव भरा नहीं रहा. 10 अगस्त 1894 को बेहरामपुर, उड़ीसा में पैदा हुए वी.वी. गिरी की परवरिश गांधीवादी परिवार में हुई. उनके पिता जोगय्या पंतुलू बहरामपुर के सफल वकील थे और कांग्रेस से जुड़े हुए थे. लेकिन, असल में ये उनकी मां सुभद्रा थीं, जो आजादी के आंदोलन में बहुत सक्रिय थीं. वो अवज्ञा आंदोलन में जेल में भी रहीं.
1913 में उस दौर के चलन के हिसाब से गिरी वकालत पढ़ने के लिए आयरलैंड गए. वहां उन्होंने यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ़ डबलिन में दाखिला लिया. यहां आकर गिरी राजनीति में सक्रिय हो गए. 1916 में डबलिन में वकालत पढ़ने गए गिरी वहां की सरकार की नज़रों में मुजरिम बन गए. वो उस समय अफ्रीका और भारत में हो रहे ब्रिटिश सरकार के अत्याचार के खिलाफ पर्चे बांटा करते. ये वो दौर था, जब आयरलैंड में अंग्रेज सरकार के खिलाफ भयंकर विद्रोह चल रहा था. पर्चे बांटने के चक्कर में गिरी पहले से ही खुफिया पुलिस की नज़रों में चढ़ चुके थे.
इस बीच अप्रैल 1916 में ईस्टर के मौके पर डबलिन में विद्रोह खड़ा हो गया. विद्रोहियों ने डबलिन की सरकारी इमारतों पर कब्ज़ा कर लिया. अंत में ब्रिटिश सेना आई और विद्रोह दबा दिया गया. गिरी पर विद्रोहियों साथ संपर्क रखने का इल्जाम लगा और उन्हें एक महीने के भीतर आयरलैंड छोड़ने का आदेश दे दिया गया.
गिरी आयरलैंड में अपनी पढ़ाई पूरी नहीं कर पाए, लेकिन वो दो जरूरी सबक लेकर लौटे-
#1. भारत की आजादी के आंदोलन में मजदूरों को भी अहम रोल निभाना होगा. खासतौर पर संगठित क्षेत्र के मजदूर. मसलन मुंबई की कपड़ा मिलों में काम करने वाले या रेलवे में लगे लोग.
#2. भारत को औद्योगीकरण की राह पकड़नी होगी. साइंस के आधुनिक तरीके अपनाने होंगे.
भारत लौटते ही गिरी मजदूर राजनीति में सक्रिय हो गए. उन्होंने 1923 में आल इंडिया रेलवे मेंस फेडरेशन की स्थापना में अहम भूमिका निभाई और एक दशक तक इसके महासचिव रहे. 1926 में वो आल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस के पहली मर्तबा अध्यक्ष बने.
1937 में पहली बार उनका सितारा चमका. मद्रास प्रोविंस में कांग्रेस की सरकार बनी. उन्हें मंत्री बनाया गया. अगले ही बरस गांधी उनके एक बयान से बेतरह नाराज हो गए. गिरी ने एक जलसे में इंडस्ट्री के पक्ष में तमाम दलीलें पेश की थीं. वर्धा में बैठे गांधी ने इसे साफतौर पर अपनी हिंद स्वराज थ्योरी के उलट माना.
जब गिरी को ये पता चला, तो उन्होंने वो काम किया, जिसमें आजकल के नेता बेशरमी की हद तक महारत हासिल कर चुके हैं. उन्होंने अपने बयान से पल्ला झाड़ लिया. कह दिया कि मैंने ऐसा कुछ कहा ही नहीं. उस वक्त टीवी नहीं था, जो उनकी बाइट को लूप में चलाता. अखबार थे. और मद्रास प्रेसिडेंसी के तकरीबन हर अखबार ने उनका बयान छापा था. फिर भी गिरि इनकार पर अड़े रहे और गांधी इससे बहुत प्रसन्न हुए.

कुछ ही बरसों में अंग्रेजों के रवैये के चलते कांग्रेस मंत्रिमंडलों ने सत्ता छोड़ दी. गिरि भी फिर से ट्रेड यूनियन के काम में लग गए. यूनियनबाजी में उन्होंने एक अहम सबक सीखा. जब तक जीवन-मरण का प्रश्न न हो, एक पाला स्पष्ट रूप से न चुनो. तमिलनाडु में उन दिनों कांग्रेस के दो अहम गुट थे. सी. राजगोपालाचारी और टी प्रकाशम. वैसे ही केंद्र में नेहरू और पटेल के बीच लाइन खिंची थी.
गिरी सब देख रहे थे, सबसे बनाकर चल रहे थे. आजादी के तुरंत बाद नेहरू ने उन्हें सीलोन में भारत का पहला हाई कमिश्नर बनाकर भेजा. वो कांग्रेस के भीतर की खींचतान से बच गए.
1952 में पहले लोकसभा चुनाव में मद्रास स्टेट की पतापट्टनम सीट से चुनाव जीत कर आए. उन्हें नेहरू मंत्रिमंडल में जगह मिली और श्रम मंत्रालय सौंपा गया.
1954 में जब सरकार ने बैंक कर्मचारियों का वेतन घटाने का निर्णय लिया, तो देशभर में बैंक यूनियन आंदोलन में खड़े हो गए. इस गिरी मजदूर यूनियन के साथ समझौते पर अड़े हुए थे. सरकार नहीं मानी और अगस्त 1954 में उन्होंने मंत्रीपद से इस्तीफा दे दिया. मंत्रीपद पर रहते हुए गिरी ने उद्योगपतियों और मजदूर यूनियन के बीच के मसले आपसी समझौतों से सुलझाने पर जोर दिया. इसे 'गिरी अप्रोच' कहा गया.
1957 के चुनाव में गिरी ने पार्वतीपुरम सीट से अपनी किस्मत आजमाई. गिरी चुनाव हार गए. कांग्रेस ने उनका राजनीतिक पुनर्वास किया. जून 1957 में वो उत्तर प्रदेश के राज्यपाल बने. इसके बाद उन्हें राज्यपाल के तौर पर 1960 में केरल भेजा गया. वहां से 1965 में उनकी नियुक्ति कर्नाटक में हुई. 1967 में वो कांग्रेस के उम्मीदवार बनकर उपराष्ट्रपति पद तक पहुंचे.
रिटायरमेंट के बाद स्मृति लेखों की शक्ल में वीवी गिरी ने अपनी राजनीति बखाननी शुरू की. इसमें उन्होंने भारत के आजादी आंदोलन का भी ब्यौरा दिया. मगर इसमें कई झोल थे. मसलन, होम रूल लीग. इस आंदोलन में वो खूब सक्रिय थे, इसे बेहद सफल बताते रहे, मगर इसके खत्म होने की वजहों पर नहीं ठिठके. नहीं बताया कि गांधी के रवैये के चलते कई अहम नेताओं ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था.
सन 1974 में पूरे भारत में आजादी के बाद की सबसे बड़ी रेल हड़ताल हुई. इस हड़ताल का अगुआ संगठन था आल इंडिया रेलवे मेंस फेडरेशन. वो संगठन, जिसके गिरी संस्थापक सदस्य थे. जॉर्ज फर्नांडिस को गिरफ्तार कर लिया गया. उनके अलावा 30 हजार रेल कर्मचारी जेल में ठेल दिए गए. 1 रायसीना हिल्स में बैठे गिरी यह सब देखते रहे. कभी वेतन में कटौती के विरोध में इस्तीफा दे देने वाले गिरी बेबसी से सारा मंजर देखते रहे.
यह भी पढ़े
महामहिम: अब तक का सबसे सनसनीखेज राष्ट्रपति चुनाव
वो राष्ट्रपति जिनकी जीत का ऐलान जामा मस्जिद से हुआ था
महामहिम: पहले मुस्लिम राष्ट्रपति के लिए इंदिरा ने क्या चाल चली
महामहिम: दो प्रधानमंत्रियों की मौत और दो युद्ध का गवाह रहा राष्ट्रपति






















