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वो 'स' को 'श' कहने वाले कलाकार

गांव में कुछ लोग आदतन और कुछ शुद्ध हिन्दी बोलने का भ्रम पालते हुए स को श बोलते थे. मसलन शाम तो शाम है ही, लेकिन सुबह, शुबह है. सुगंध शुगंध है.

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गांव में कुछ लोग आदतन और कुछ शुद्ध हिन्दी बोलने का भ्रम पालते हुए स को श बोलते थे. मसलन शाम तो शाम है ही, लेकिन सुबह, शुबह है. सुगंध शुगंध है. ऐसे दो-चार लोग हमारे पहचाने हुए थे, उन्हें देखते ही हम शुशुआने लगते. ना ना.. बाल्यकाल में धार निकालने के लिए माता या बहनों के मुंह से निकाली जाने वाली आवाज नहीं, बल्कि उन सज्जन के स्वागत में कहे जाने वाले कुछ शब्द, जिनका अस्तित्व तो स से था लेकिन मुख से प्राकट्य श से हुआ करता था. ऐसे ही एक सज्जन थे हमारे गांव में, शकारों में सर्वोत्तम. उनके मुंह से सकार शब्दों को निकालने में दांतों की कोई भूमिका नहीं थी, जो भी था वह तालू और जिह्वा के सौजन्य से हुआ करता. उनकी काया इकहरी थी और कद बिचौलिये वाला. पांच फुट सात इंच तक जाते-जाते वह बस बोल गए थे लेकिन बदन लड़कपन में ही कमर के ऊपर से जरा लुढ़कने लगा था. चेहरे पर हमेशा एक खास तरह की हंसी होती, पढ़ने-लिखने में मध्यम दर्जे के मेधावी थे. हम गांव में नाटक खेला करते थे. जब उसका रिहर्सल होता तो श्रीमान उसी चिर परिचित मुस्कुराहट, माफ कीजिए मुश्कुराहट के साथ हाजिर हो जाते और कभी पारसी तो कभी ईरानी और कभी ग्रामीण गला-फाड़ अभिनय संस्कार की मिसालें देते. फिर निष्णात अभिनेता की तरह कहते, 'तुमशे नै होगा.' एक दिन रिहर्सल में उनके सामने नीरज कुमार पड़ गए. नीरज कुमार ने चार लाइन का संवाद कहने में इतनी बार रीटेक किया कि अभिनय (शम्राट) क्रुद्ध हो गए, बोले उंह.." रात को मरी खाकर आए हो और शुबह खुलाशा भी नहीं हुआ है तुमको, इशलिए तुम बोल नहीं शकते "! नीरज लंपट टाइप का था, उसने आव देखा न ताव, शकार जी का टैंटवा धर लिया. अब लगे वो गर्र-गर्र करने. देखभैं..देखभैं... की आवाज के साथ एक नाकाम अभिनेता सारी खीज और बौखलाहट लिये परदे के पार का प्रेम चोपड़ा बन गया था. बिना किसी जिम्मेदारी के निर्देशक बने शकार जी अपनी कमजोर और मुड़ी हुए भुजाओं के आघूर्ण से खुद को छुड़ाने की फिराक में थे, लेकिन छूट नहीं सके. नीरज का बाहुकंटक ही ऐसा था. जब उनका टैंटवा तप्त होकर लाल होने लगा और गर्दन की नसें अपनी शारीरिक औकात से ज्यादा फूल गईं तब हमें लगा कि साहब सुटकने वाले हैं. उनके श.. शमाप्त होने का शंकट घिर आया तो हमने नीरज को धर के पटक दिया. उनकी जान छूटी और छूटते ही वो शपाशप करने लगे. लेकिन एक विचित्र बात ये हुई कि उस दिन से उनका गला दुरुस्त हो गया. एक तो कम बोलने लगे, ऊपर से श को संभाल लिया. उनके शुगंधित शब्दों के सुमन (शुमन) कम झरने लगे, जिन्हें हम उन्हें ही चढ़ाने के लिए पहले चुन लिया करते थे.

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