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जानी दुश्मन ख़राब फ़िल्म नहीं है, मैं बड़ा हो गया हूं!

मुझे नहीं लगता कि हर बदलाव जरूरी या लाभकारी होता है. 90 के दशक में पैदा हुए तमाम लोग अब मिडलाइफ क्राइसिस और कर्ज़ के कुचक्र में फंस चुके हैं. 90 का दशक वो धर्म है जो दो जातियों में बंटा है. 95 से पहले वाले एक जाति के और 95 के बाद वाले दूसरी जाति के. मैं दूसरी जाति का हूं.

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जानी दुश्मन को दोबारा देखा तो वो बर्दाश्त से बाहर लगी. (Photo: AI Generated)

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  • लेख में लेखक ने 90 के दशक की यादें और बचपन के अनुभवों को व्यक्त करते हुए यह बताया कि उन्होंने ताराबानो फैजाबादी के गीतों को फिर से सुना और पुरानी फिल्मों को देखा।
  • लेखक का संदर्भ 90 के दशक के सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन हैं, जिसमें मिडलाइफ क्राइसिस, कर्ज़ के दबाव और व्यक्तिगत जीवन के बदलाव शामिल हैं, जो उनकी वर्तमान सोच को प्रभावित करते हैं।
  • इन परिवर्तनों के कारण लेखक का बचपन और उस दौर की संस्कृति धीरे-धीरे खत्म हो रही है, और वे अपने खोए हुए बचपन को पुनः पाने की उम्मीद रखते हैं, जो आगे की पुनर्स्थापना की दिशा संकेत करता है।

कल मेरे साथ एक सुघटना और एक दुर्घटना घटी. बहुत दिनों के बाद कल मैंने ताराबानो फैजाबादी को सुना. मैं 'फैज़ा' भी लिख सकता था लेकिन गीत में बारम्बार 'जुलमी' सुनकर मैंने 'फैजा' को चुना. मैंने पाया कि बरसों बाद भी ताराबानो के गीत की नायिका उसी काउंटर पर खड़ी है. वो वही है. उसकी उम्र भी वही है. दर्जी से आंखें बंद करके चोली सिलने की उसकी दरख़्वास्त भी अभी तक वही है. ताराबानो की दुनिया में अब भी सबकुछ वैसा ही था. रस. छंद. लोक. नौटंकी. संगीत. लेकिन अफ़सोस अब मैं बड़ा हो गया हूं.

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इस तथ्य को और पुख़्ता करने के लिए फिर कल मैंने एक फिल्म देखी. साल 2002 में आई राजकुमार कोहली की फिल्म 'जानी दुश्मन: एक अनोखी कहानी'. बचपन में जानी दुश्मन न सिर्फ मुझे डराती थी बल्कि थ्रिल और इमोशन से भी भर देती थी. लेकिन कल जब मैंने अपने बचपन की फिल्म को दोबारा देखा तो वो बर्दाश्त से बाहर लगी.

अरमान कोहली के रैक्सीन के कपड़े देखकर सोच में पड़ जाता कि इन्हें धुला जाता होगा या इन पर पॉलिश होती होगी. लाल स्प्लेंडर पर बैठकर जंगल के बीच से पार्टी में जाती एक खूबसूरत अभिनेत्री इस फिल्म का शुक्रवारीय 9:45 लेखन है. बहुत जिम्मेदारी से कह रहा हूं कि सोनू निगम अगर इस तरह की दो-तीन फिल्में और कर देते तो मैं उनके गाने सुनना छोड़ देता. मनीषा कोइराला का किरदार एक आत्मा या नाग प्रेमिका से ज्यादा एक मूर्ख महिला का था. फिल्म का एनिमेशन देखकर मुझे बहुत दुख हुआ और ये बात अब पुख्ता हो चुकी थी कि मैं अब बड़ा हो गया हूं.

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मुझे नहीं लगता कि हर बदलाव जरूरी या लाभकारी होता है. 90 के दशक में पैदा हुए तमाम लोग अब मिडलाइफ क्राइसिस और कर्ज़ के कुचक्र में फंस चुके हैं. 90 का दशक वो धर्म है जो दो जातियों में बंटा है. 95 से पहले वाले एक जाति के और 95 के बाद वाले दूसरी जाति के. मैं दूसरी जाति का हूं. मेरे आसपास की चीजें अब बदल चुकी हैं. लेकिन मैं खुद को वैसा ही देखता हूं. मेरी उम्र वही है. मेरी नजर वही है. मेरी इच्छाएं वही हैं. शायद, मेरी दुनिया अब भी वैसी ही है.

लेकिन मेरे आसपास के पौधे अब पेड़ बन चुके हैं. इमारतें और घर ऊंचे हो गए हैं. साथ उठने-बैठने वाले अब वैसे नहीं रहे, इसलिए मजबूरन मुझे भी बड़ा होना पड़ा. लेकिन ये 'बड़प्पन' और इसके लक्षण मुझे तक़लीफ़ देते हैं. रूमी गेट को किसी ने फिर से पेंट कर दिया. उस पर लगी काई अब बीते हुए कल की बात हो चुकी है. अब उसके नीचे से बसें भी नहीं गुजरतीं. रिजॉइस शैम्पू विलुप्त हो चुका है. सनी देओल का बुढ़ापा मुझसे देखा नहीं जाता. तुम कहां हो ग्रेसी सिंह? डर लगता है, कहीं विद्या सिन्हा पर लिखी कविता पुरानी ना हो जाए.

संपूर्ण क्रांति में सीटें उपलब्ध क्यों हैं? लंबे समय से मैंने रोडवेज़ में यात्रा नहीं की. उम्मीद है उसकी खिड़की अभी भी आगे-पीछे बैठी दो सवारियों के बीच संवाद प्रकट करने में कामयाब हो जाती होंगी. क्या बच्चों को अब बूस्ट की ज़रूरत नहीं पड़ती? शक्तिमान का दर्द से करहाना मुझे ऑर्गेज्म क्यों लगने लगा है? पेंसिल को देखकर आज भी खुश हो जाता हूं लेकिन लिखने को कुछ नहीं है. स्कूल में था तब बड़े भाइयों और चाचा से अपने हिस्से का लिखवा लेता था. शायद उसी का फल मिल रहा है. इंग्लिश वाली टीचर की दो बेटियां अब स्कूल जाने लगी होंगी. गोविंदा का खालीपन भरना चाहता हूं. भरना चाहता हूं उस खाली दीवार को जिसपर तीन लकीरों को खींचकर स्टंप की आकृति बना लिया करते थे. बहुत कुछ पीछे छूट गया.

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मेरी और आपकी कहानी अलग हो सकती है लेकिन अंतस्थ में मिठास छिपाए किसी तेज काले नमक वाले आम पापड़, ठेले पर हिमालय जैसे बिकते सूखे पेठों, विरक्त हो चुकी मधुमक्खियों, मिठाई जिनके विनियम में बाल दिए गए थे और बीएसएनएल के हरे लैंडलाइन से निकलती लोकधुनों के किसी संगम पर हमारी कहानी एक हो ही जाएगी. महानगर की आग में बहुत कुछ मैंने खुद जला दिया. मुक्तिबोध को पढ़कर शहर आया था. सोचा था अपने 'पार्टनर' को गलत साबित करूंगा. कम लेकर, बहुत कुछ दूंगा और देश को जीवन देकर मर जाऊंगा. लेकिन अब बड़ा मैं, महानगर में खड़ा, इंतजार में हूं देवीप्रसाद की उस इकलौती ब्लू लाइन बस के जो एक रोज़ आकर कुचल देगी मेरे बचे-खुचे बचपन को.  

बहुत दिन बाद आज यूकोलिपटिस की खुशबू आई है. लेकिन मुझे इंतजार है उस तारे का, जिसके प्रकाश ने 90 के दशक में हमारी ओर चलना शुरू किया था. जिस दिन वो मुझसे टकराएगा उस दिन मुझे मेरा खोया हुआ बचपन मिल जाएगा, दूसरी जाति वाला.

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