हार्दिक पांड्या अपनी बेशकीमती घड़ियों को लेकर फिर से चर्चा में हैं. लेकिन इस बार बात घड़ियों की कीमत से आगे की है. बीती 15 नवंबर की सुबह हार्दिक पांड्या जब UAE से लौटे तो छत्रपति शिवाजी एयरपोर्ट पर पांड्या को कस्टम ऑफिसर्स का सामना करना पड़ा. कारण, डेढ़ करोड़ की उनकी घड़ी. कहा गया कि पांड्या की घड़ियां कस्टम ऑफिसर्स ने जब्त कर ली हैं, क्योंकि वो कस्टम वालों को घड़ियों के इन्वॉइस नहीं दिखा पाए थे. और न ही उन्होंने अपनी इन घड़ियों को बाकी सामान की लिस्ट के साथ डिक्लेयर किया था.
हार्दिक पांड्या को अपनी करोड़ों की घड़ी के लिए कस्टम वालों को कितना पैसा देना पड़ेगा?
इम्पोर्टेड सामान घर आते-आते क्यों हो जाता है महंगा? जानें कस्टम ड्यूटी का पूरी गणित.
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हार्दिक पांड्या को कस्टम ड्यूटी अदा किए बिना दुबई से लाई घड़ी नहीं मिलेगी (फोटो सोर्स- आज तक)
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कुछ मीडिया रिपोर्टों में पांड्या की घड़ियों की कीमत 5 करोड़ रुपये बताई गई थी. लेकिन पांड्या ने ट्वीट कर साफ किया कि कीमत 5 करोड़ नहीं डेढ़ करोड़ है. ये भी कहा कि उन्हें कस्टम वालों ने नहीं पकड़ा, बल्कि वो ख़ुद कस्टम ऑफिसर्स के पास गए, सारे डाक्यूमेंट्स दिखाए और उन्हें जितनी कस्टम ड्यूटी देनी थी उसकी हामी भरी. कुछ महीने पहले हार्दिक पांड्या के भाई क्रुनाल पांड्या को भी महंगी घड़ियों के साथ मुंबई एयरपोर्ट पर रोका गया था. तब क्रुनाल ने कहा था कि उन्हें डिक्लेरेशन प्रोसीज़र और कस्टम ड्यूटी के बारे में पता नहीं था.
अब क्रुनाल पांड्या तो क्रिकेट स्टार के भाई हैं. कह दिया कि उन्हें कस्टम के नियम कायदे नहीं पता. लेकिन हम और आप तो ठहरे आम आदमी. कभी विदेश जाने का मौक़ा मिला और लौटते वक्त विदेशी सामान के साथ कस्टम काउंटर पर धर लिए गए तो! ऐसे में क्रुनाल वाला एक्सक्यूज़ न देना पड़े इसलिए कुछ नियम कायदे जान लेते हैं.
बेसिक कस्टम ड्यूटी- ये ड्यूटी उन इम्पोर्टेड गुड्स पर लगती है जो कस्टम ड्यूटी एक्ट के सेक्शन 12 में दिए गए हैं.
एडिशनल कस्टम ड्यूटी- ये ड्यूटी उन इम्पोर्टेड गुड्स पर लगती है जो कस्टम ड्यूटी एक्ट 1975 के सेक्शन 3 में दिए गए हैं. इसका रेट कमोबेश देश के अन्दर मैन्युफैक्चर होने वाले सामान पर लगने वाले टैक्स जितना ही रहता है. और अब ये जीएसटी के तहत आती है.
ट्रू काउंटरवेलिंग ड्यूटी और सेफ़गार्ड ड्यूटी- ये दोनों ड्यूटीज़ उन गुड्स पर लगाई जाती हैं, जिनसे घरेलू प्रोडक्ट्स के मार्केट को नुकसान होने की संभावना हो. इन ड्यूटीज़ के रेट टैरिफ कमिश्नर डिसाइड करता है.
एंटी डंपिंग ड्यूटी- ये ड्यूटी तब लगाई जाती है जब इम्पोर्टेड गुड्स की कीमत मार्केट वैल्यू से कम हो. इसको ऐसे समझिए कि अगर आप किसी देश से सस्ते में कोई माल खरीदकर यहां महंगे दाम पर बेचना चाहें तो आपको ये ड्यूटी देनी पड़ेगी.
इन सारे टैक्सेज़ से रेवेन्यू यानी सरकारी कमाई बढ़ती है. वहीं कस्टम ड्यूटी में सख्ती से घरेलू बाज़ार का विदेश से कंपीटिशन भी कंट्रोल हो जाता है. माने ऐसा समझिए कि अगर सस्ते में बाहरी गुड्स इम्पोर्ट करना बहुत आसान हो जाए तो मेक इन इंडिया वाला कॉन्सेप्ट धराशायी हो जाएगा.
2018 में स्टील इम्पोर्ट पर एंटी डंपिंग ड्यूटी लगा दी गई थी, क्यूंकि भारतीय स्टील कंपनियों ने कहा था कि विदेशी स्टील कंपनियां देश में स्टील डंप करके घरेलु स्टील के रेट गिरा देंगीं (प्रतीकात्मक फोटो -आज तक)
#कस्टम ड्यूटी के डिसाइडिंग फैक्टर्स कस्टम ड्यूटी कई चीज़ों पर डिपेंड करती है. जैसे गुड्स कहां से आए हैं, यानी मैन्युफैक्चरिंग कहां हुई है, लाए गए सामान में मटेरियल क्या यूज़ हुआ है, वज़न कितना है आदि-आदि. जो ड्यूटी गुड्स के प्राइस के अतिरिक्त दूसरे फैक्टर्स पर डिपेंड करती है उसे ‘एड वेलोरेम ड्यूटी’ (Ad valorem Duty) कहते हैं और वज़न पर बेस्ड कस्टम ड्यूटी को ‘स्पेसिफिक ड्यूटी’ कहा जाता है.
कस्टम ड्यूटी एक्ट, 1962 के मुताबिक़, देश में कस्टम ड्यूटी CBEC यानी ‘सेंट्रल बोर्ड ऑफ़ इंडायरेक्ट टैक्सेज़ एंड कस्टम्स’ के अंडर आती है. ये बोर्ड ही ड्यूटी लगाने, अवैध सामान, जैसे नार्कोटिक ड्रग्स वगैरह के इम्पोर्ट-एक्सपोर्ट को रोकने और पेनलाइज़ करने सरीखे काम देखता है. इम्पोर्ट-एक्सपोर्ट की पॉलिसीज़ क्या रहेंगी, ये तय करना भी इसी बोर्ड का काम है.
CBIC, फोटो सोर्स - wikimedia
#कस्टम ड्यूटी कितनी लगेगी कैसे तय करते हैं कस्टम वाले? कस्टम वैल्यूएशन रूल्स का तीसरा नियम कहता है कि इम्पोर्टेड गुड्स की कीमत दसवें रूल के प्रोवीजन के एकॉर्डिंग तय होगी. लेकिन अगर वैल्यूएशन फैक्टर्स के हिसाब से संबंधित डेटा मौजूद नहीं है या कस्टम्स ऑफिसर्स को गुड्स की कीमत को लेकर कोई डाउट होता है तो वैल्यूएशन दूसरे मेथड्स से किया जाएगा.
#कम्पेरेटिव वैल्यू मेथड(रूल 4)- इस तरीके में होता ये है कि उसी तरह के दूसरे सामान की कीमत से तुलना करके इस सामान की कीमत तय की जाती है.
# कम्पेरेटिव वैल्यू मेथड(रूल 5)- तरीका ये भी रूल 4 जैसा ही है. फर्क इतना है कि पहले वाले में बिल्कुल एक जैसे सामानों का कंपैरिजन करते हैं, जबकि रूल 5 में उसके जैसे किसी दूसरे सामान का कंपैरिजन किया जाता है. अब मान लीजिए आप कोई नायाब पेंटिंग खरीदकर लाए, और आपके खरीदारी के डाक्यूमेंट्स पर कस्टम वालों को शक हुआ, तो वो इसकी कीमत वैसी ही दूसरी किसी पेंटिंग से कंपेयर करेंगे. और अगर हू-ब-हू वही पेंटिंग नहीं है तो वो ये देखेंगे कि फलां पेंटर जिसकी पेंटिंग आप लाए हैं उसकी दूसरी पेंटिंग्स अमूमन कितने की रहती हैं.
#डिडक्टिव वैल्यू मेथड(रूल 5- iii)- इस तरीके में ये देखा जाता है कि जिस देश में सामान इम्पोर्ट किया जा रहा है, उसमें उस सामान की क्या कीमत है.
#कंप्यूटेड वैल्यू मेथड (रूल-7)- इस तरीके में कीमत को तोड़कर देखते हैं. तोड़ना मतलब ऐसे समझिए कि सामान के मटेरियल की कॉस्ट क्या है, उस पर बाकी फेब्रिकेशन कैसा है, जिस देश में वो सामान मैन्यूफैक्चर हुआ है वहां कंपनी ने प्रॉफिट कितना कमाया है, आदि-आदि चीज़ें काउंट की जाती हैं.
#फॉलबैक मेथड (रूल 9)- ये तरकीब और कुछ नहीं बल्कि अभी तक की सारी तरकीबों का मिला-जुला रूप है, फ़र्क बस इतना है कि इसमें बाकी सारी तरकीबों में थोड़ी फ्लेक्सिबिलिटी यानी लचीलापन ले आते हैं. जब बाकी सारे रूल्स से काम न चले, कीमत न तय हो पाए तो उन्हीं सारे रूल्स को थोड़ा कम स्ट्रिक्ट रख कर कीमत तय की जा सकती है. #खेला जीएसटी का इंटीग्रेटेड जीएसटी एक्ट 2017 के मुताबिक़ इम्पोर्टेड गुड्स पर आईजीएसटी लगता है. इम्पोर्ट पर जीएसटी कितने फ़ीसद है, जब इसकी खोजबीन की तो सीबीआईसी का एक पीडीएफ मिला. विस्तृत समझना है तो लिंक पर क्लिक करें
. संक्षिप्त में तिया-पांचा ये है- मान लीजिए आपने कोई सामान सौ रुपए का इम्पोर्ट किया. जिसपर 10% बेसिक कस्टम ड्यूटी है. तो इसे जोड़कर टोटल प्राइस हुआ 110 रुपए. अब 10% बेसिक ड्यूटी का 3% एजुकेशन सेस है जो हुआ 30 पैसे. यहां तक आपके सौ रुपए के सामान की कीमत हो गई 110 रुपए 30 पैसे.
इसे मूल धन मान लीजिए. अब इस पर दो टैक्स लगेंगे, वो भी अलग-अलग. एक कंपनसेशन सेस जोकि 16% होता है. और दूसरा जीएसटी जोकि इम्पोर्टेड गुड्स पर 18% लगता है. तो कंपनसेशन सेस हो गया 16 रुपए 55 पैसे और आईजीएसटी हुआ 19 रुपए 85 पैसे.
माने अगर पांड्या ने दुबई में घड़ी 100 रुपए की खरीदी होती तो उन्हें भारत सरकार को टैक्स में कुल 46 रुपए 70 पैसे चुकाने होते. अब घड़ी डेढ़ करोड़ की थी तो उसका 46.7% जोड़कर देख लीजिएगा और कमेंट सेक्शन में हमें भी बताइएगा. कस्टम्स एक्ट 1962 के मुताबिक़ घड़ी पांड्या को तभी मिलेगी जब वो कस्टम्स डिपार्टमेंट को पूरा टैक्स चुका देंगे.
टैक्स का गुणा-भाग (फोटो ग्रैब - CBIC)
#कस्टम ड्यूटी ख़ुद कैसे कैलकुलेट करें अब अगर आप भी कुछ विदेशी आइटम मंगाने की सोच रहे हैं और जोड़ना चाहते हैं कि आपको कितनी रकम बतौर टैक्स अदा करनी होगी, तो इसके लिए सीबीआईसी की वेबसाइट पर अलग से एक कस्टम ड्यूटी कैलकुलेटर ICEGATE पोर्टल में दिया गया है.
इस कैलकुलेटर का इस्तेमाल जब आप करेंगे तो आपको उस सामान का HS कोड डालना होगा, जिसे आप इम्पोर्ट करना चाहते हैं. HS कोड 6 डिजिट का एक कोड होता है जो हार्मोनाइज्ड कमोडिटी डिटेल्स और कोडिंग प्रणाली पर बेस्ड होता है.
कैलकुलेटर पर जाकर तीस शब्दों के अंदर डिटेल भरनी होगा और उस कंट्री को सेलेक्ट करना होगा जहां सामान बना है. इसके बाद सर्च पर क्लिक करेंगे तो आपको सामान की एक लिस्ट दिखाई देगी. किसी भी एक आइटम को चुनने के बाद, इससे जुड़ा हुआ एक चार्ट देख पाएंगे, जिसमें कस्टम ड्यूटी से रिलेटेड इनफार्मेशन होगी.
कस्टम ड्यूटी कैलकुलेटर ICEGATE- (सोर्स- CBIC)
#ऑनलाइन कस्टम ड्यूटी ICEGATE यानी इंडियन कस्टम्स इलेक्ट्रॉनिक कॉमर्स/इलेक्ट्रॉनिक डेटा इंटरचेंज गेटवे. ये पोर्टल आपको बिज़नेस और कार्गो वालों की जानकारी तो देता ही है साथ ही ई-फाइलिंग सर्विसेज भी प्रोवाइड कराता है.
ऑनलाइन कस्टम ड्यूटी पे करने के लिए आप ये स्टेप्स फॉलो कर सकते हैं.
ये तो था मोटा-माटी ज्ञान कस्टम रूल्स और कस्टम ड्यूटी पेमेंट को लेकर. अब अगर आप ज्यादा डिटेल में जाना चाहें तो इस लिंक से सीबीआईसी की वेबसाइट पर जाकर गहन अध्ययन कर सकते हैं.
हिंदी में समझना चाहें तो इस लिंक से सीबीआईसी का ये दस पेज का पीडीएफ़ डाउनलोड कर लीजिए.
अब क्रुनाल पांड्या तो क्रिकेट स्टार के भाई हैं. कह दिया कि उन्हें कस्टम के नियम कायदे नहीं पता. लेकिन हम और आप तो ठहरे आम आदमी. कभी विदेश जाने का मौक़ा मिला और लौटते वक्त विदेशी सामान के साथ कस्टम काउंटर पर धर लिए गए तो! ऐसे में क्रुनाल वाला एक्सक्यूज़ न देना पड़े इसलिए कुछ नियम कायदे जान लेते हैं.
कस्टम ड्यूटी का गणित
#इम्पोर्ट ड्यूटी क्या है? कस्टम ड्यूटी को समझने से पहले इम्पोर्ट ड्यूटी को समझना होगा. इम्पोर्ट ड्यूटी मतलब आयात पर लगने वाला शुल्क या टैक्स. इसी तरह एक्सपोर्ट पर जो शुल्क या टैक्स लगता है उसे एक्सपोर्ट ड्यूटी कहते हैं. आयात शुल्कों को कैलकुलेट करने में कई चीज़ें शामिल होती हैं. जैसे,बेसिक कस्टम ड्यूटी- ये ड्यूटी उन इम्पोर्टेड गुड्स पर लगती है जो कस्टम ड्यूटी एक्ट के सेक्शन 12 में दिए गए हैं.
एडिशनल कस्टम ड्यूटी- ये ड्यूटी उन इम्पोर्टेड गुड्स पर लगती है जो कस्टम ड्यूटी एक्ट 1975 के सेक्शन 3 में दिए गए हैं. इसका रेट कमोबेश देश के अन्दर मैन्युफैक्चर होने वाले सामान पर लगने वाले टैक्स जितना ही रहता है. और अब ये जीएसटी के तहत आती है.
ट्रू काउंटरवेलिंग ड्यूटी और सेफ़गार्ड ड्यूटी- ये दोनों ड्यूटीज़ उन गुड्स पर लगाई जाती हैं, जिनसे घरेलू प्रोडक्ट्स के मार्केट को नुकसान होने की संभावना हो. इन ड्यूटीज़ के रेट टैरिफ कमिश्नर डिसाइड करता है.
एंटी डंपिंग ड्यूटी- ये ड्यूटी तब लगाई जाती है जब इम्पोर्टेड गुड्स की कीमत मार्केट वैल्यू से कम हो. इसको ऐसे समझिए कि अगर आप किसी देश से सस्ते में कोई माल खरीदकर यहां महंगे दाम पर बेचना चाहें तो आपको ये ड्यूटी देनी पड़ेगी.
इन सारे टैक्सेज़ से रेवेन्यू यानी सरकारी कमाई बढ़ती है. वहीं कस्टम ड्यूटी में सख्ती से घरेलू बाज़ार का विदेश से कंपीटिशन भी कंट्रोल हो जाता है. माने ऐसा समझिए कि अगर सस्ते में बाहरी गुड्स इम्पोर्ट करना बहुत आसान हो जाए तो मेक इन इंडिया वाला कॉन्सेप्ट धराशायी हो जाएगा.
2018 में स्टील इम्पोर्ट पर एंटी डंपिंग ड्यूटी लगा दी गई थी, क्यूंकि भारतीय स्टील कंपनियों ने कहा था कि विदेशी स्टील कंपनियां देश में स्टील डंप करके घरेलु स्टील के रेट गिरा देंगीं (प्रतीकात्मक फोटो -आज तक)#कस्टम ड्यूटी के डिसाइडिंग फैक्टर्स कस्टम ड्यूटी कई चीज़ों पर डिपेंड करती है. जैसे गुड्स कहां से आए हैं, यानी मैन्युफैक्चरिंग कहां हुई है, लाए गए सामान में मटेरियल क्या यूज़ हुआ है, वज़न कितना है आदि-आदि. जो ड्यूटी गुड्स के प्राइस के अतिरिक्त दूसरे फैक्टर्स पर डिपेंड करती है उसे ‘एड वेलोरेम ड्यूटी’ (Ad valorem Duty) कहते हैं और वज़न पर बेस्ड कस्टम ड्यूटी को ‘स्पेसिफिक ड्यूटी’ कहा जाता है.
कस्टम ड्यूटी एक्ट, 1962 के मुताबिक़, देश में कस्टम ड्यूटी CBEC यानी ‘सेंट्रल बोर्ड ऑफ़ इंडायरेक्ट टैक्सेज़ एंड कस्टम्स’ के अंडर आती है. ये बोर्ड ही ड्यूटी लगाने, अवैध सामान, जैसे नार्कोटिक ड्रग्स वगैरह के इम्पोर्ट-एक्सपोर्ट को रोकने और पेनलाइज़ करने सरीखे काम देखता है. इम्पोर्ट-एक्सपोर्ट की पॉलिसीज़ क्या रहेंगी, ये तय करना भी इसी बोर्ड का काम है.
CBIC, फोटो सोर्स - wikimedia#कस्टम ड्यूटी कितनी लगेगी कैसे तय करते हैं कस्टम वाले? कस्टम वैल्यूएशन रूल्स का तीसरा नियम कहता है कि इम्पोर्टेड गुड्स की कीमत दसवें रूल के प्रोवीजन के एकॉर्डिंग तय होगी. लेकिन अगर वैल्यूएशन फैक्टर्स के हिसाब से संबंधित डेटा मौजूद नहीं है या कस्टम्स ऑफिसर्स को गुड्स की कीमत को लेकर कोई डाउट होता है तो वैल्यूएशन दूसरे मेथड्स से किया जाएगा.
#कम्पेरेटिव वैल्यू मेथड(रूल 4)- इस तरीके में होता ये है कि उसी तरह के दूसरे सामान की कीमत से तुलना करके इस सामान की कीमत तय की जाती है.
# कम्पेरेटिव वैल्यू मेथड(रूल 5)- तरीका ये भी रूल 4 जैसा ही है. फर्क इतना है कि पहले वाले में बिल्कुल एक जैसे सामानों का कंपैरिजन करते हैं, जबकि रूल 5 में उसके जैसे किसी दूसरे सामान का कंपैरिजन किया जाता है. अब मान लीजिए आप कोई नायाब पेंटिंग खरीदकर लाए, और आपके खरीदारी के डाक्यूमेंट्स पर कस्टम वालों को शक हुआ, तो वो इसकी कीमत वैसी ही दूसरी किसी पेंटिंग से कंपेयर करेंगे. और अगर हू-ब-हू वही पेंटिंग नहीं है तो वो ये देखेंगे कि फलां पेंटर जिसकी पेंटिंग आप लाए हैं उसकी दूसरी पेंटिंग्स अमूमन कितने की रहती हैं.
#डिडक्टिव वैल्यू मेथड(रूल 5- iii)- इस तरीके में ये देखा जाता है कि जिस देश में सामान इम्पोर्ट किया जा रहा है, उसमें उस सामान की क्या कीमत है.
#कंप्यूटेड वैल्यू मेथड (रूल-7)- इस तरीके में कीमत को तोड़कर देखते हैं. तोड़ना मतलब ऐसे समझिए कि सामान के मटेरियल की कॉस्ट क्या है, उस पर बाकी फेब्रिकेशन कैसा है, जिस देश में वो सामान मैन्यूफैक्चर हुआ है वहां कंपनी ने प्रॉफिट कितना कमाया है, आदि-आदि चीज़ें काउंट की जाती हैं.
#फॉलबैक मेथड (रूल 9)- ये तरकीब और कुछ नहीं बल्कि अभी तक की सारी तरकीबों का मिला-जुला रूप है, फ़र्क बस इतना है कि इसमें बाकी सारी तरकीबों में थोड़ी फ्लेक्सिबिलिटी यानी लचीलापन ले आते हैं. जब बाकी सारे रूल्स से काम न चले, कीमत न तय हो पाए तो उन्हीं सारे रूल्स को थोड़ा कम स्ट्रिक्ट रख कर कीमत तय की जा सकती है. #खेला जीएसटी का इंटीग्रेटेड जीएसटी एक्ट 2017 के मुताबिक़ इम्पोर्टेड गुड्स पर आईजीएसटी लगता है. इम्पोर्ट पर जीएसटी कितने फ़ीसद है, जब इसकी खोजबीन की तो सीबीआईसी का एक पीडीएफ मिला. विस्तृत समझना है तो लिंक पर क्लिक करें
. संक्षिप्त में तिया-पांचा ये है- मान लीजिए आपने कोई सामान सौ रुपए का इम्पोर्ट किया. जिसपर 10% बेसिक कस्टम ड्यूटी है. तो इसे जोड़कर टोटल प्राइस हुआ 110 रुपए. अब 10% बेसिक ड्यूटी का 3% एजुकेशन सेस है जो हुआ 30 पैसे. यहां तक आपके सौ रुपए के सामान की कीमत हो गई 110 रुपए 30 पैसे.
इसे मूल धन मान लीजिए. अब इस पर दो टैक्स लगेंगे, वो भी अलग-अलग. एक कंपनसेशन सेस जोकि 16% होता है. और दूसरा जीएसटी जोकि इम्पोर्टेड गुड्स पर 18% लगता है. तो कंपनसेशन सेस हो गया 16 रुपए 55 पैसे और आईजीएसटी हुआ 19 रुपए 85 पैसे.
माने अगर पांड्या ने दुबई में घड़ी 100 रुपए की खरीदी होती तो उन्हें भारत सरकार को टैक्स में कुल 46 रुपए 70 पैसे चुकाने होते. अब घड़ी डेढ़ करोड़ की थी तो उसका 46.7% जोड़कर देख लीजिएगा और कमेंट सेक्शन में हमें भी बताइएगा. कस्टम्स एक्ट 1962 के मुताबिक़ घड़ी पांड्या को तभी मिलेगी जब वो कस्टम्स डिपार्टमेंट को पूरा टैक्स चुका देंगे.
टैक्स का गुणा-भाग (फोटो ग्रैब - CBIC)#कस्टम ड्यूटी ख़ुद कैसे कैलकुलेट करें अब अगर आप भी कुछ विदेशी आइटम मंगाने की सोच रहे हैं और जोड़ना चाहते हैं कि आपको कितनी रकम बतौर टैक्स अदा करनी होगी, तो इसके लिए सीबीआईसी की वेबसाइट पर अलग से एक कस्टम ड्यूटी कैलकुलेटर ICEGATE पोर्टल में दिया गया है.
इस कैलकुलेटर का इस्तेमाल जब आप करेंगे तो आपको उस सामान का HS कोड डालना होगा, जिसे आप इम्पोर्ट करना चाहते हैं. HS कोड 6 डिजिट का एक कोड होता है जो हार्मोनाइज्ड कमोडिटी डिटेल्स और कोडिंग प्रणाली पर बेस्ड होता है.
कैलकुलेटर पर जाकर तीस शब्दों के अंदर डिटेल भरनी होगा और उस कंट्री को सेलेक्ट करना होगा जहां सामान बना है. इसके बाद सर्च पर क्लिक करेंगे तो आपको सामान की एक लिस्ट दिखाई देगी. किसी भी एक आइटम को चुनने के बाद, इससे जुड़ा हुआ एक चार्ट देख पाएंगे, जिसमें कस्टम ड्यूटी से रिलेटेड इनफार्मेशन होगी.
कस्टम ड्यूटी कैलकुलेटर ICEGATE- (सोर्स- CBIC)#ऑनलाइन कस्टम ड्यूटी ICEGATE यानी इंडियन कस्टम्स इलेक्ट्रॉनिक कॉमर्स/इलेक्ट्रॉनिक डेटा इंटरचेंज गेटवे. ये पोर्टल आपको बिज़नेस और कार्गो वालों की जानकारी तो देता ही है साथ ही ई-फाइलिंग सर्विसेज भी प्रोवाइड कराता है.
ऑनलाइन कस्टम ड्यूटी पे करने के लिए आप ये स्टेप्स फॉलो कर सकते हैं.
# 1- ICEGATE ई-पेमेंट पोर्टल पर जाएंहालांकि इस ताम-झाम से बचना चाहते हैं तो आप शिपरॉकेट जैसे किसी लॉजिस्टिक्स पार्टनर की मदद भी ले सकते हैं.
# 2- इम्पोर्ट/एक्सपोर्ट कोड डालें या ICEGATE द्वारा दिए गए लॉगिन क्रेडेंशियल डालें
# 3- ई-पेमेंट पर क्लिक करें
# 4- पेमेंट करने का तरीका चुनें
# 5- चुने हुए बैंक के पेमेंट गेटवे पर पे करें.
ये तो था मोटा-माटी ज्ञान कस्टम रूल्स और कस्टम ड्यूटी पेमेंट को लेकर. अब अगर आप ज्यादा डिटेल में जाना चाहें तो इस लिंक से सीबीआईसी की वेबसाइट पर जाकर गहन अध्ययन कर सकते हैं.
हिंदी में समझना चाहें तो इस लिंक से सीबीआईसी का ये दस पेज का पीडीएफ़ डाउनलोड कर लीजिए.
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