सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि विधायकों और सांसदों की अयोग्यता पर फैसला लेने के लिए एक स्थायी ट्रिब्यूनल बनाया जा सकता है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज या हाईकोर्ट के रिटायर्ड चीफ जस्टिस इसके अध्यक्ष हो सकते हैं या एक ऐसा सिस्टम बने जो निष्पक्ष हो.
किस मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा कहा है
ये बात जस्टिस आरएफ नरीमन की अध्यक्षता वाली बेंच ने मणिपुर के एक मामले में कही. मणिपुर में मार्च, 2017 चुनाव में बीजेपी विधायक टीएच श्यामकुमार कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीते. बाद में बीजेपी में शामिल हो गए और सरकार में मंत्री बन गए. कांग्रेस ने इस पर आपत्ति की. कहा कि ये एंटी डिफेक्शन लॉ (10वीं अनुसूची) का उल्लंघन है.
कांग्रेस विधायक के. मेघचंद्र ने मणिपुर हाईकोर्ट में श्यामकुमार को अयोग्य ठहराने की याचिका डाली. हाईकोर्ट ने कहा कि स्पीकर को कोर्ट निर्देश दे या नहीं, ये मामला सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की बेंच के पास है. इसलिए इस पर हम आदेश नहीं दे सकते. बाद में कांग्रेस विधायक सुप्रीम कोर्ट पहुंचे. कांग्रेस ने मांग की थी कि श्यामकुमार की मंत्री पद पर नियुक्ति रद्द की जाए. और स्पीकर के बजाय सुप्रीम कोर्ट ही मंत्री की अयोग्यता पर फैसला करे क्योंकि स्पीकर ख़ुद एक पार्टी से जुड़े हैं.

टीएच श्यामकुमार. फोटो: ट्विटर
सुप्रीम कोर्ट ने कहा, 'स्पीकर मंत्री की अयोग्यता से जुड़ी याचिका पर चार हफ्ते के भीतर फैसला नहीं लेते हैं तो सुप्रीम कोर्ट में कोई भी पार्टी याचिका डाल सकती है ताकि आगे के लिए निर्देश/राहत मिल सके.'
ऐसा ही मामला कर्नाटक में हुआ था, जब स्पीकर केआर रमेश कुमार ने विधानसभा में विश्वास मत से एक दिन पहले 17 बागी विधायकों को अयोग्य घोषित कर दिया था. तब अयोग्य करार दिए गए विधायक सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए थे. ये स्पीकर की शक्तियों को चैलेंज करने जैसा था.
सुप्रीम कोर्ट पहले भी संसद को ये सलाह दे चुका है
कोर्ट ने दूसरी बार संसद को ऐसी सलाह दी है. इससे पहले 1992 में नगालैंड के विधायक किहोतो होलोहान की अयोग्यता के मामले में कोर्ट ने कहा था,
इसका फैसला स्पीकर से अलग सदन से बाहर कोई करे, जिसे ऐसा करने का अधिकार दिया जाए. स्पीकर सदन के अंदर एक अथॉरिटी है. उसका कार्यकाल बहुमत की इच्छा पर निर्भर करता है. ऐसे में उसके पक्षपाती होने की आशंका है. किसी सदस्य को अगर अयोग्य करार देना है तो इसे न्यायिक प्रक्रिया के तहत करना चाहिए.तब जस्टिस जेएस वर्मा ने कहा था कि न्याय व्यवस्था में यही होता है कि उस जज को ऐसे मामले सुनने से मना कर दिया जाता है, जिसमें उसके पक्षपाती होने का संदेह हो. उनका कहना था कि न्याय सिर्फ होना नहीं चाहिए बल्कि होते हुए दिखना भी चाहिए.

जस्टिस जेएस वर्मा. फोटो: इंडिया टुडे
जस्टिस वर्मा ने कहा,
संविधान बनाने वालों ने जानबूझकर लाभ का पद (आर्टिकल 191), चुनाव याचिकाएं (आर्टिकल 329) और भ्रष्ट आचरण (आर्टिकल 103) के मामले देखने से स्पीकर को दूर रखा है. जस्टिस वर्मा ने कहा कि इस योजना में कुछ भी असामान्य नहीं है. हम ये ध्यान रखें कि सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जजों को हटाने (महाभियोग) का काम न्यायपालिका के दायरे से बाहर संविधान के आर्टिकल 124 (4) के तहत संसद को दिया गया है. इसी आधार पर सदस्यों की अयोग्यता तय करने के लिए सदन से बाहर एक व्यवस्था होनी चाहिए जैसा कि आर्टिकल 103 और 192 में किया गया है.स्पीकर की शक्तियां
विधायकों या सांसदों के दल बदलने या व्हिप का उल्लंघन करने को लेकर संविधान की 10वीं अनुसूची (एंटी डिफेक्शन) के तहत केवल स्पीकर फैसला ले सकता है. वो विधायकों या सांसदों को अयोग्य ठहरा सकता है. स्पीकर के फैसले में न तो अपील का प्रावधान है और न ही उसके फैसले का फिर से निरीक्षण किया जा सकता है.
इसके अलावा आर्टिकल 101 (3) कहता है कि लोकसभा का कोई सदस्य स्पीकर को इस्तीफा देगा. अगर स्पीकर इस्तीफा स्वीकार कर लेता है तो सीट खाली हो जाएगी. हालांकि अगर स्पीकर को लगता है कि इस्तीफे के पीछे की वजह सही नहीं हैं तो वो इस्तीफा स्वीकार नहीं करेगा.
स्पीकर के अलावा कौन सांसदों/विधायकों को अयोग्य करार दे सकता है?
स्पीकर के अलावा संसद के दोनों सदनों के सदस्यों को राष्ट्रपति अयोग्य करार दे सकते हैं. राज्यों में विधानसभा/विधानपरिषद के सदस्यों को राज्यपाल अयोग्य करार दे सकते हैं. लेकिन इसमें सदस्यों को अयोग्य घोषित करने के लिए निश्चित क्राइटेरिया होते हैं. उनमें फिट होने पर सदस्य अयोग्य घोषित किया जा सकता है.
संसद के लिए
आर्टिकल 103
इसमें संसद के दोनों सदनों (लोकसभा/राज्यसभा) के किसी सदस्य को अयोग्य करार देने की ताकत राष्ट्रपति को दी गई है. इसके तहत सदस्य को हटाने का क्राइटेरिया आर्टिकल 102(1) में दिया गया है. इसके लिए राष्ट्रपति चुनाव आयोग से परामर्श लेंगे और उसके हिसाब से ऐक्शन लेंगे.
आर्टिकल 102(1) में क्राइटेरिया क्या है
संसद के दोनों सदनों के किसी सदस्य को इन आधार पर अयोग्य करार दिया जा सकता है-
- अगर वो सरकार के अधीन किसी लाभ के पद पर हो, जिसके बारे में संसद या कानून ने अनुमति ना दी हो.
- अगर वो मानसिक रूप से अस्वस्थ हो और कोर्ट ने ऐसा घोषित कर दिया है.
- अगर वो दीवालिया है.
- अगर वो भारत का नागरिक नहीं है और उसने बाहरी देश की नागरिकता ले ली है.
- अगर उसे संसद से बनाए गए किसी कानून के तहत अयोग्य करार दिया जाए.

राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद. फोटो: ट्विटर
विधानसभा/विधानपरिषद के लिए
आर्टिकल 192
इसके तहत विधायकों को अयोग्य करार देने का अधिकार राज्यपाल को दिया गया है. इसके तहत सदस्य को हटाने का क्राइटेरिया आर्टिकल 191 में दिया गया है. 191 के प्रावधान ऊपर दिए गए 102 (1) जैसे ही हैं. इसमें सदस्य को हटाने से पहले राज्यपाल चुनाव आयोग से परामर्श लेता है.
जानिए आर्टिकल 131, जिसको आधार बनाकर केरल सरकार CAA के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट चली गई है
























