इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा किए जा रहे एनकाउंटर्स पर सवाल खड़े किए हैं. कोर्ट ने उन एनकाउंटर्स को कटघरे में खड़ा किया है जिनमें अक्सर पुलिस की गोली आरोपियों के पैर में लगती है. कोर्ट ने कहा है कि ये एनकाउंटर एक तरह से 'रूटीन' बन गए हैं. कोर्ट ने ये भी कहा है कि इस तरह के एनकाउंटर या तो सीनियर को खुश करने या आरोपियों को सबक सिखाने के इरादे से किए जा रहे हैं.
आरोपियों को गोली मारने पर हाई कोर्ट ने कहा- 'सजा देने का अधिकार कोर्ट को है, पुलिस को नहीं'
कोर्ट ने उन एनकाउंटर्स को कटघरे में खड़ा किया है जिनमें अक्सर पुलिस की गोली आरोपियों के पैर में लगती है. कोर्ट ने कहा है कि ये एनकाउंटर एक तरह से 'रूटीन' बन गए हैं. कोर्ट ने ये भी कहा है कि इस तरह के एनकाउंटर या तो सीनियर को खुश करने या आरोपियों को सबक सिखाने के इरादे से किए जा रहे हैं.
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इलाहाबाद हाईकोर्ट में जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल की बेंच एक मामले की सुनवाई कर रही थी. ये मामला उत्तर प्रदेश के अलग-अलग जिलों में पैर में गोली लगने के बाद गिरफ्तार किए गए तीन लोगों: मुजफ्फरनगर के रहने वाले अनस, झांसी के दीपक लोहपिता और मिर्जापुर के राजू उर्फ राजकुमार का था. इन्हें पैर में गोली लगने के बाद पुलिस ने गिरफ्तार किया था. इन तीन लोगों की याचिका को कोर्ट ने एक साथ क्लब कर दिया. इसके बाद याचिका पर सुनवाई करते हुए 28 जनवरी को कोर्ट ने कहा,
इस कोर्ट के सामने अक्सर ऐसे मामले आते हैं, जहां चोरी जैसे छोटे अपराधों में भी पुलिस घटना को पुलिस एनकाउंटर बताकर अंधाधुंध फायरिंग करती है. ऐसा बर्ताव बिल्कुल गलत है, क्योंकि सजा देने का अधिकार सिर्फ कोर्ट के पास है, पुलिस के पास नहीं. भारत एक लोकतांत्रिक देश है जो कानून के शासन से चलता है, इसलिए कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका के काम अलग-अलग और अच्छी तरह से तय हैं, और पुलिस द्वारा न्यायपालिका के क्षेत्र में किसी भी दखल को बर्दाश्त नहीं किया जा सकता.
इसके अलावा हाईकोर्ट ने राज्य के DGP और एडिशनल चीफ सेक्रेटरी-होम को 30 जनवरी को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग पर कोर्ट के सामने पेश होने का निर्देश दिया. इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक कोर्ट ने अधिकारियों को तलब किया ताकि बेंच को ये जानकारी मिले कि क्या पुलिस अधिकारियों को पुलिस एनकाउंटर के नाम पर या किसी और वजह से आरोपियों के पैरों में गोली चलाने के लिए कोई मौखिक या लिखित निर्देश दिए गए थे?
कोर्ट ने यह भी माना कि पुलिसकर्मियों को आत्मरक्षा का अधिकार है. वे जरूरत पड़ने पर फोर्स का इस्तेमाल कर सकते हैं. लेकिन यह तय है कि जहां आरोपी की मौत होती है या उसे गंभीर चोटें आती हैं, वहां माननीय सुप्रीम कोर्ट द्वारा बताए गए प्रोसीजर का सख्ती से पालन किया जाना चाहिए. साथ ही कोर्ट ने मौत के मामलों में पुलिस एनकाउंटर्स की स्वतंत्र जांच के लिए एक स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOPs) की लिस्ट भी जारी की है. इस लिस्ट के मुताबिक-
- जब भी पुलिस को किसी अपराधी की गतिविधि या 'गंभीर अपराध' करने से जुड़ी गतिविधियों के बारे में कोई खुफिया जानकारी या टिप मिलती है, तो उसे लिखित रूप में, हो सके तो केस डायरी में या इलेक्ट्रॉनिक रूप में दर्ज किया जाएगा.
- घटना/एनकाउंटर की स्वतंत्र जांच CID या किसी दूसरे पुलिस स्टेशन की टीम द्वारा एक सीनियर अधिकारी की देखरेख में की जाएगी. अधिकारी एनकाउंटर में शामिल पुलिस पार्टी के हेड से कम से कम एक लेवल ऊपर होगा.
- NHRC की भागीदारी तब तक जरूरी नहीं है जब तक स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच पर कोई गंभीर संदेह न हो. हालांकि, घटना की जानकारी बिना किसी देरी के NHRC या राज्य मानवाधिकार आयोग को भेजी जानी चाहिए.
- घायल अपराधी/पीड़ित को मेडिकल सहायता दी जानी चाहिए और उनका बयान एक मजिस्ट्रेट या मेडिकल ऑफिसर द्वारा फिटनेस सर्टिफिकेट के साथ रिकॉर्ड किया जाना चाहिए.
- पुलिस फायरिंग में हुई सभी मौतों के मामलों के छह महीने के बयान DGPs द्वारा NHRC को भेजे जाने चाहिए. यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि छह महीने के बयान क्रमशः जनवरी और जुलाई के 15वें दिन तक NHRC तक पहुंच जाएं.
- यदि जांच पूरी होने पर रिकॉर्ड में आए सबूतों से पता चलता है कि मौत IPC के तहत अपराध माने जाने वाले हथियार के इस्तेमाल से हुई है, तो ऐसे अधिकारी के खिलाफ तुरंत अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू की जानी चाहिए और उसे सस्पेंड कर दिया जाना चाहिए.
- पुलिस एनकाउंटर में मारे गए पीड़ित के आश्रितों को मुआवजा दिया जाएगा.
- ऐसी घटना के तुरंत बाद संबंधित अधिकारियों को कोई आउट-ऑफ-टर्न प्रमोशन या वीरता पुरस्कार नहीं दिए जाएंगे. यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि ऐसे पुरस्कार तभी दिए जाएं जब संबंधित अधिकारियों की वीरता बिना किसी संदेह के साबित हो जाए.
- यदि पीड़ित का परिवार पाता है कि प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया है या दुर्व्यवहार का कोई पैटर्न है या स्वतंत्र जांच या निष्पक्षता की कमी है, तो वे संबंधित सेशन जज के पास शिकायत दर्ज कर सकते हैं. सेशन जज शिकायत को देखेंगे और शिकायतों का समाधान करेंगे.
बता दें कि 28 जनवरी को कोर्ट के आदेश के बाद 30 जनवरी को DGP राजीव कृष्णा और ACS-होम संजय प्रसाद वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए कोर्ट के सामने पेश हुए. इसके बाद कोर्ट ने तीनों आरोपियों को जमानत दे दी.
वीडियो: इलाहाबाद हाई कोर्ट के रेप केस में किस फैसले से नाराज़ हुआ सुप्रीम कोर्ट?












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