प्रभात रंजन लिखते हैं. हाल ही में किताब लिखी है ‘कोठागोई’. डीयू के जाकिर हुसैन कॉलेज में पढ़ाते भी हैं. एक ब्लॉग है लिटरेचर का, उसे भी संभालते हैं. नाम है जानकीपुल. भूसे को जैसे आग चाहिए होती है लिखने वालों को भी बस उसी की जरूरत होती है. इन्हें आग तो नहीं सिगरेट मिल गई. सिगरेट से कुछ याद आया, कमलेश्वर याद आए, किसी के स्निकर्स और जनकपुर याद आया. उस पर कुछ लिखा है . पढ़िए दी लल्लनटॉप पर .
जिसकी आंखों में बहुत पानी होता है, उसके दिल का कोई पानी नहीं होता
एक बार कमलेश्वर से पूछा कि आपकी आवाज इतनी अच्छी क्यों है? जवाब में उन्होंने अपनी डनहिल दिखा दी थी.
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फोटो - thelallantop
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समरहिल में डनहिल
कुछ देखते हैं, कुछ याद आता है, सुनाओ तो कहानी लगने लगती है! लिख दो तो अनजानी लगने लगती है. आज सिगरेट खरीदने गया. दुकान में सामने डनहिल का पैकेट दिखा. मैं मार्लबोरो लाईट पीता हूं. कहानी डनहिल सिगरेट की नहीं है लेकिन पूरी कहानी में किरदार वही है! बात 90 के दशक की है. तब विदेशी ब्रांड की चीजें भारत में ऐसे नहीं मिला करती थीं. तब ‘फॉरेन’ के माल का कुछ मतलब होता था. नेपाल के सीमावर्ती कस्बे सीतामढ़ी से दिल्ली आने से पहले ही कमलेश्वर के डनहिल सिगरेट के बारे में इतना पढ़ चुका था कि कमलेश्वर का एक अलग आकर्षण था. जी, वह पत्र-पत्रिकाओं का ज़माना था, लेखक लोग दूसरे लेखक लोगों के बारे में लिखा करते थे, होली विशेषांक में लेखकों के बारे में छपा करता था. कस्बों में बैठे हम पाठक उन्हीं को पढ़-पढ़कर अपने नायक बनाया करते थे. दिल्ली आने के बाद पहली बार मैं जिस लेखक से मिला वह कमलेश्वर ही थे. वे चेन स्मोकर थे, सामने डनहिल का पैकेट पड़ा रहता था, धुएं के पीछे से आती उनकी रूहानी आवाज का ऐसा जादू चढ़ा कि बार बार मैं उनके घर जाता था. डनहिल के ऐश्वर्यशाली लगने वाले धुएं के पीछे से जब वे अपने संघर्ष की कहानियां सुनाते थे तो मन वैसे ही संघर्ष करके डनहिल पीने का होने लगता था.एक बार मैंने पूछा कि आपकी आवाज इतनी अच्छी क्यों है? जवाब में उन्होंने अपनी डनहिल दिखा दी थी. मन में बड़ी हसरत थी कि एक दिन मैं भी इसी तरह से लेखक बनूंगा और डनहिल ही पिया करूंगा. कभी कभी एकाध डनहिल खरीद भी लेता था लेकिन उससे कई दिनों के सिगरेट का बजट बिगड़ जाता था. बहरहाल, मैं डनहिल के धुएं के पीछे छिपे उस जादुई लेखक से मिलने बहुत जाता था. ग्रीन पार्क में रहते थे. जब भी मिलते कहते, मैं मुंबई की उस नारकीय दुनिया को छोड़ आया हूं. कहकर एक डनहिल उठा लेते थे. मैं आज तक डनहिल को को कमलेश्वर से अलग करके नहीं देख पाता. मुझे याद है जब जब कॉलेज के पॉलिटिकल साइंस डिपार्टमेंट की ट्रिप पर मैं भी उनके साथ बस में लदकर शिमला चला गया था. वहीं समरहिल की ट्रेकिंग में मुझे पहली बार किसी से प्यार हुआ था. तीन दिन के उस ट्रिप के दूसरे दिन कुफरी से लौटते हुए मैंने अपने उस पहले प्यार को बस में डनहिल और कमलेश्वर का किस्सा सुनाया था. “मैं जब कमाउंगी तब तुम्हारे लिए डनहिल खरीद दिया करुंगी. वही पीना. जानते हो सिगरेट पीकर बहुत धीमी आवाज में बात करने वाले लड़के मुझे बहुत अच्छे लगते हैं. एकदम मैस्कुलिनफील होता है.” कहने के बाद वह बस की खिड़की के बाहर देखने लगी थी. उसने खिड़की से बाहर देखते हुए कहा था, “तुम भी वैसे ही हो- मैस्कुलिन.”उस समय मेरा यही बड़ा सपना था. एक के बाद एक डनहिल पीना और शत्रुघ्न सिन्हा की तरह धुएं के छल्ले उडाना. उसने सुनते ही पूरा करने का वादा कर दिया था. प्यार में ऐसे छोटे-छोटे वादे बड़े मायने रखते हैं.वह अपने जेबखर्च के पैसों से मेरे लिए महीने में कम से कम एक पैकेट डनहिल खरीद दिया करती थी. मुझे याद है जब उसने पहली बार पायनियर अखबार में लेख लिखा था और उसका पारिश्रमिक मिला तो उसने मेरे लिए डनहिल का एक बण्डल खरीद दिया था- दस पैकेट पूरे! कहती थी इसी तरह लेखक बनना. बहुत बड़े और डनहिल मैं पिलाया करुंगी. तुम पैसों के लिए मत लिखना, पैसा मैं कमाया करुंगी. एक दिन लव इन द टाइम ऑफ़ कॉलरा लिखना...
वह ज़माना ही और था. लोग प्यार करते थे, छोटे-छोटे वादों को लम्बे समय तक निभाने की बातें करते थे.उसको सुबह की जॉगिंग का शौक था. चाहे कुछ हो जाए. और नए-नए स्निकर्स (स्पोर्ट्स शूज) पहनने का. तब नाइके, रिबॉक के जूते भारत में नहीं मिलते थे. लेकिन नेपाल के पास रहने के कारण हम वही जूते पहनते थे क्योंकि वे हमें सस्ते और टशन मारने वाले लगते थे. मैं जब भी छुट्टियों में घर जाता तो नेपाल में जनकपुर जाता. अपने किसी सामान को कम करके उसके लिए एक जोड़ी जूता जरूर खरीदता था. “जानते हो अपने घर में एक बड़ा सा रैक सिर्फ मेरे जूते के लिए ही बनवाना पड़ेगा” “एक स्टोर रूम बनवा दूंगा...” मैं जवाब देता. हम जो थे उससे ऊपर उठाना चाहते थे- डनहिल, रिबॉक उसी दिशा के छोटे छोटे सपने थे. फिर सपनों और हकीकत की ऐसी मिक्सिंग हुई कि सब कुछ गड्डमड्ड हो गया. वह मुंबई चली गयी, मैं दिल्ली में.... जीवन के बड़े बड़े सपनों ने हमारे छोटे छोटे सपनों की मासूमियत का क़त्ल कर दिया था. कमलेश्वर ने एक बार कहा था- “जानते हो इंसान जो कुछ शिद्दत से पाना चाहता है उसे एक दिन मिल भी जाता है, लेकिन इंसान की मुश्किल यह है कि वह जब जो चाहता है उसको तब वह नहीं मिलता...” जब डनहिल पीने लायक पैसे आये तब तक डनहिल क्या डनहिल से जुड़ी हर याद दिल से जा चुकी थी. पता नहीं कैसे आज सिगरेट की दुकान में डनहिल का पैकेट रखा देखा तो इतना सब याद आ गया. वह लड़की याद आई जिसकी आंखें बहुत पनियाली थीं. ऐसे जैसे गुलाब की पंखुड़ी खुलते ही ओस की एक बूंद ढब से गिर जाए. कहते हैं जिसकी आंखों में बहुत पानी होता है उसके दिल का कोई पानी नहीं होता. डनहिल देखा तो वह लड़की याद आई जिसने समरहिल की ट्रेकिंग में मुझे जीवन में पहली बार आई लव यू बोला था. यह वादा किया था कि जीवन भर मुझे डनहिल पिलाएगी! मैंने एक पैकेट मार्लबोरो लाईट का खरीदा और लौट आया. हर बजट में दाम बढ़ जाता है!
पढ़िए प्रभात रंजन की कहानी - प्यार का अहसास ही तब होता है जब वह बाकी नहीं रह जाता
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