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जिस तरह इधरवाले गोडसे को पूजते हैं, उधरवाले इस लड़के को हीरो मानते हैं

इस क़ातिल लड़के को बचाने मुहम्मद अली जिन्ना उतरे. अपनी लाइफ का इकलौता केस हार गए.

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फोटो - thelallantop
दो साल पहले, 2017 में, जुलाई का ही महीना था. बंगाल में एक नाबालिग लड़के ने पैगंबर मुहम्मद साहब से जुड़ी एक फेसबुक पोस्ट डाली. जिसे उनका अपमान करती पोस्ट माना गया. इससे ऐसे दंगे भड़के कि कई दिनों तक बवाल रहा. लड़के को पुलिस द्वारा अरेस्ट करने के बावजूद, मुस्लिम समुदाय का गुस्सा कम होने का नाम नहीं ले रहा था.  तीन साल पहले ‘कमलेश तिवारी’ वाले इंसिडेंट में भी ऐसा ही कुछ हुआ था. उस वक़्त का एक नारा-

“गुस्ताख़-ए-नबी की यही सज़ा, सर तन से जुदा, सर तन से जुदा”

इतने ही ग्रैंड लेवल का एग्रेशन होता है मुस्लिम समाज में. जहां कहीं भी पैगंबर के अपमान का मसला आ जाता है, अति-भावुक हो जाते हैं. कई बार तो हिंसक भी. भावुक होने में कोई बुराई नहीं है. हिंसक होने में है. जहां तक मैं समझता हूं, खुद मुहम्मद साहब ऐसी हिंसा से खफ़ा ही होते. मुहम्मद साहब के नाम पर यूं आपे से बाहर हो जाना कोई नई बात नहीं है मुस्लिम समाज में. आज ऐसा ही किस्सा याद करेंगे, जो कई मायनों में भारत-पाकिस्तान के इतिहास में एक अहम घटना है.
आज से 88 साल पहले घटी इस घटना के बारे में कहा जाता है कि इसी से ट्रिगर होकर अलग पाकिस्तान का ख़याल पनपा.

‘रंगीला रसूल’ नाम से छपी वो किताब और उससे उपजा बवाल

साल था 1923. लाहौर के राजपाल प्रकाशन से एक किताब छपी. ‘रंगीला रसूल’. इसे चमूपति लाल के नकली नाम से लिखा गया था. ये आसानी से समझा जा सकता है कि जिस किताब के नाम में ही पैगंबर साहब के लिए भड़काऊ शब्द हो, उसका कंटेंट कितना भड़काऊ होगा. प्रकाशक राजपाल मल्होत्रा पर लेखक का नाम उजागर करने का दबाव डाला जाने लगा. उन्होंने सरासर इंकार कर दिया.
मामला कोर्ट पहुंचा. लाहौर के सेशन कोर्ट ने राजपाल को दोषी माना. लेकिन राजपाल ने हाईकोर्ट में अपील कर दी. हाईकोर्ट से उन्हें ये कह कर राहत मिली कि कानून में धार्मिक भावनाएं भड़काने के जुर्म के लिए कोई धारा ही नहीं है.
राजपाल बरी तो हो गए, लेकिन उन्हें नहीं पता था कि एक नौजवान के सीने में उनके लिए नफरत की आग धधक रही थी.
उस विवादित किताब को बाद में दिल्ली के कुछ प्रकाशकों ने भी छापा.
उस विवादित किताब को बाद में दिल्ली के कुछ प्रकाशकों ने भी छापा.

क्यों एक जवान लड़का इतनी गहरी नफरत का शिकार हो गया?

राजपाल के ऊपर से सारे चार्जेस खारिज हो जाने से मुस्लिम समाज भयंकर नाराज़ था. जगह-जगह प्रोटेस्ट किए जा रहे थे. मस्जिदों से तक़रीर हुआ करती थी. ऐसी ही एक तक़रीर एक लड़के के कानों में पड़ी. लड़के का नाम था इल्मुद्दीन. उमर यही कोई 20-21 साल.
इल्मुद्दीन लाहौर का एक अनपढ़ लड़का था. उसके पिता बढ़ई थे. एक दिन पास की मस्जिद में एक बड़ा हुजूम इकट्ठा होकर राजपाल के खिलाफ़ नारे लगा रहा था. तक़रीर में कहा गया कि राजपाल नाम के राक्षस ने प्यारे नबी की शान में गुस्ताखी की है. और फिर भी सज़ा से बचा हुआ है.
इल्मुद्दीन के दिल में ये बात घर कर गई. उसने कसम खाई कि वो हुज़ूर के अपमान का बदला लेगा.

वो दिन, जब एक जवान लड़का एक ख़ूनी में तब्दील हुआ

तारीख थी 6 अप्रैल 1929. इल्मुद्दीन ने एक रुपया खर्च कर के एक खंजर ख़रीदा. उसे लेकर वो राजपाल की दुकान पर पहुंचा. राजपाल अभी तक आए नहीं थे. इल्मुद्दीन उन्हें पहचानता तक नहीं था.
उसने आसपास के लोगों से उनके बारे में पूछा. थोड़ी देर बाद किसी ने उसे बताया कि राजपाल दुकान में आ चुके हैं. इशारे से बता भी दिया कि राजपाल कौन है. इल्मुद्दीन दुकान में जा घुसा. उसने पूरी ताकत से खंजर राजपाल के दिल में उतार दिया. उस वार में इतनी ताकत थी कि राजपाल का दिल बिंध गया. उनकी तत्काल मौत हो गई.
इल्मुद्दीन ने भागने की बिल्कुल भी कोशिश नहीं की. राजपाल के स्टाफ ने उसे पकड़ कर, पुलिस के हवाले कर दिया.

मुहम्मद अली जिन्ना की ज़िंदगी का इकलौता केस, जिसमें उन्हें हार मिली

गिरफ्तारी के बाद इल्मुद्दीन को मियांवली जेल में रखा गया. इल्मुदीन की तरफ से डिफेंस के लिए मुहम्मद अली जिन्ना खड़े हुए. वही जिन्ना जो बाद में पाकिस्तान के जनक बने. कहा जाता है कि जिन्ना को ये केस लड़ने के लिए क्रांतिकारी शायर अल्लामा इकबाल ने राज़ी किया था.
मुहम्मद अली जिन्ना.
मुहम्मद अली जिन्ना.

जिन्ना ने इल्मुद्दीन से कहा कि वो गुनाह कबूल कर ले और कहे कि भयंकर उकसावे में आकर उसने वो कदम उठाया था. कहते हैं कि इल्मुद्दीन ने इस डिफेंस से इंकार कर दिया. उसने कहा कि उसे अपने किए पर नाज़ है. इसके बाद जिन्ना के लिए केस में कुछ नहीं रखा था. ये जिन्ना की ज़िंदगी का अकेला केस था, जिसे वो हार गए.
कोर्ट ने इल्मुद्दीन को फांसी की सज़ा सुनाई.

सज़ा-ए-मौत और पब्लिक रिएक्शन

इल्मुद्दीन की फांसी के खिलाफ़ मुस्लिम समुदाय ने हायर कोर्ट में अपील की. रिजेक्ट कर दी गई. 31 अक्टूबर 1929 को उसे फांसी पर टांग दिया गया. कहते हैं कि मरने से पहले उससे जब आख़िरी ख्वाहिश पूछी गई, तो उसने सिर्फ 2 रकअत नमाज़ पढ़ने की इजाज़त मांगी. नमाज़ पढ़कर इल्मुद्दीन ख़ुशी-ख़ुशी फांसी चढ़ गया.
अधिकारियों ने उसे फ़ौरन दफना दिया. बिना जनाज़े की नमाज़ पढ़ाए. इस बात को लेकर लोगों में और भी आक्रोश फैला. अल्लामा इकबाल के नेतृत्व में प्रदर्शन होने लगे. तनाव बहुत ज़्यादा बढ़ गया.
ब्रिटिश गवर्नमेंट घबरा गई. अल्लामा इकबाल से इस बात की गारंटी लेकर कि कोई दंगा नहीं होगा, उन्होंने इल्मुद्दीन की कब्र खोदने की इजाज़त दे दी.

अल्लामा इकबाल के वो शब्द जिनपर यकीन करना मुश्किल है

इल्मुद्दीन की लाश को निकाला गया. उसकी मौत के 2 हफ़्तों बाद. इल्मुद्दीन के पिता ने अल्लामा इकबाल से रिक्वेस्ट की कि उसके जनाज़े की नमाज़ वो पढवाएं. डॉ. अल्लामा इकबाल बोले, “मैं एक गुनाहगार शख्स हूं, जो ऐसे योद्धा के जनाज़े की नमाज़ पढ़वाने के काबिल नहीं हूं.”
अल्लामा इकबाल.
अल्लामा इकबाल.

2 लाख से ज़्यादा लोगों ने इल्मुद्दीन के जनाज़े की नमाज में शिरकत की. कहा जाता है कि जब इकबाल ने इल्मुद्दीन के जिस्म को क़ब्र में रखा, तो कहा,

“इस अनपढ़ बंदे ने हम सब पढ़े-लिखे लोगों को पीछे छोड़ दिया.”

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पाकिस्तान की पैदाइश का बीज इन्हीं दिनों में बोया गया था

इल्मुद्दीन की फांसी दो मेजर तब्दीलियों की वजह बनी. एक तो क़ानून में संशोधन करके धार्मिक भावनाएं आहत करने के खिलाफ़ प्रावधान लाए गए.
और..
इस घटना के कुछ ही दिनों बाद अलग पाकिस्तान की मांग सर उठाने लगी. इन्हीं दिनों में जिन्ना, इकबाल और उनके बाकी साथियों ने मुस्लिम हुकूमत की ज़रूरत महसूस करनी शुरु की. मुसलमानों के लिए मुसलमानों का शासन. जिसका नतीजा था 1947 में एक अलग मुल्क का निर्माण.
और रही बात इल्मुद्दीन की, तो उस लड़के को पाकिस्तान में हीरो का दर्जा प्राप्त है. वहां आज भी इल्मुद्दीन के नाम पर सड़कें हैं, अस्पताल हैं, पार्क हैं. उसके नाम के आगे 'ग़ाज़ी' लिखा जाता है. उसके ऊपर किताबे लिखी गई हैं.
इल्मुद्दीन के ऊपर लिखी गई एक किताब.
इल्मुद्दीन के ऊपर लिखी गई एक किताब.

मज़हब के, आइडियोलॉजी के नाम पर क़त्ल करने वाले लोगों का महिमामंडन करना, शायद इन दोनों मुल्कों के लोगों का पसंदीदा शगल है. वहां इल्मुद्दीन है, इधर गोडसे है.


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