यहमारे देश में अच्छी से अच्छी लोकैलिटी में भी एक जगह फिक्स होती है, जहां लोग आकर अपने घरों का कचरा डाल जाते हैं. इन्हीं जगहों पर हम अक्सर कुछ लोगों को कूड़ा बीनते देखते हैं, जो कूड़े में से बोतल, सिक्के और न जाने क्या-क्या खोज रहे होते हैं. इन कूड़ा उठाने वालों को हम ऐसे देखते हैं, जैसे वो कूड़ा उठाते-उठाते हमारे घरों का सामान उठाकर ले जाएंगे. लेकिन एक इंसान है, जिसके बारे में जानकर आप इन कूड़े उठाने वालों को इज़्जत भरी निगाह से देखना शुरू कर देंगे.
कचरे को पैसे में बदलने का हुनर सिखाता है ये आदमी
कभी खुद कूड़ा बीनता था, आज 160 आदमियों को नौकरी दे रहा है.



इनका नाम है जयप्रकाश चौधरी. 23 साल पहले बिहार के मुंगेर से दिल्ली आए थे. एक समय में यहां कूड़े के ढेर से ऐसी चीज़ें खोजा करते थे, जिन्हें रिसाइकल किया जा सकता हो. बदले में दिन के कुछ 150 रुपए कमा लिया करते थे. लेकिन आज जयप्रकाश इसी कूड़े के ढेर से हर महीने 11 लाख रुपए कमाते हैं. इनके अंडर में 160 लोग काम करते हैं. दिल्ली में जयप्रकाश के दो वेस्ट सैग्रीगेशन सेंटर हैं. वो जगह, जहां गीले और सूखे कचरे को अलग किया जाता है. ड्राई वेस्ट यानी सूखा कूड़ा. इसमें लकड़ी और मेटल जैसी चीज़ें आती हैं. इसे रिसाइकल के लिए भेजा जाता है. वहीं वेट वेस्ट यानी गीला कूड़ा, ऑर्गेनिक वेस्ट होता है, जो खाने वगैरह की चीज़ें होती हैं.
जयप्रकाश को पसंद है कि लोग उन्हें उनके निक नेम संतू से बुलाया करें. 40 साल के संतू ने दिल्ली आकर सबसे पहले फलों की एक दुकान पर काम करना शुरू किया था, जहां उन्हें दिन के 20 रुपए दिए जाते थे. इसके बाद उन्होंने कुछ समय तक मजदूरी भी की. लेकिन आज संतू हर कूड़ा बीनने वाले के रोल मॉडल हैं. वो डेनमार्क की राजधानी कोपनहेगन से लेकर यूरोपीय देश लक्ज़मबर्ग और ब्राज़ील जैसी जगहों पर जाकर रिसाइक्लिंग और वेस्ट पर कई भाषण दे चुके हैं. जो भी उनके बारे में जानता है, वो उन्हें सुनना चाहता है.
पहले जहां संतू के गांव वाले उन्हें इज़्जत नहीं देते थे, आज बड़े गर्व से बताते हैं कि वो संतू के गांव के हैं. संतू बताते हैं, 'गांव में जो मेरे टीचर थे, वो लोग कहते हैं कि मैंने पर्यावरण के लिए बहुत अच्छा काम किया है. कुछ ऐसा जो बहुत ज़्यादा पढ़े-लिखे लोग भी नहीं कर पाते.'

1994 में संतू पीठ पर बोरा टांगे दिल्ली के कनॉट प्लेस के आस-पास घूमा करते थे. वो कूड़ा बीनते और उसे बेचा करते. लोग उन्हें अच्छी निगाहों से नहीं देखते थे. समाज का निचला हिस्सा समझते थे, जिसके जीने-मरने से भी किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता. इससे परेशान होकर उन्होंने महीनेभर में ही ये काम छोड़ दिया. वापस बिहार में अपने गांव चले गए. वहां घर पर बहुत गरीबी थी. दो महीने ही रुक पाए और फिर ठान लिया कि वापस दिल्ली जाना है. आ भी गए. सोचा कि गरीबी से अच्छा तो लोगों का भेदभाव ही है.
1996 में राजा झुग्गी के बाहर सड़क पर एक दुकान खोली, जहां वो लोगों से ड्राई वेस्ट खरीदते और फिर उसे बेचा करते. वो बताते हैं उन्हें बहुत सालों तक पुलिस और सिविक बॉडी वालों ने परेशान करके रखा. साल 1999 उनके लिए टर्निंग पॉइन्ट था. उन्होंने चिंतन एनवायरमेंटल रिसर्च एंड ऐक्शन ग्रुप नाम के एक NGO की मदद से रैगपिकर्स यानी कूड़े बीनने वालों की एक ऑर्गनाइज़ेशन तैयार की. इस ऑर्गनाइज़ेशन का नाम 'सफ़ाई सेना' था. संतू का लक्ष्य था कि उनके जैसे लोगों को जो भेदभाव झेलना पड़ता है, वो रुक जाए.

साल 2000 में वो राजा बाज़ार से कोतला शिफ़्ट हो गए. वो जहां-जहां कचड़े का गोडाउन खड़ा करते, वहां-वहां बाद में कॉलोनियां बसने लगतीं. इस वजह से उनके गोडाउन भोरपुर, महिपालपुर जैसी जगहों पर भी रहे. ऐसे जगह बदलते रहने से उन्हें पैसों का भी काफी नुकसान उठाना पड़ता था.
2012 में संतू ने गाज़ियाबाद के सिंकदरपुर में अपना पहला वेस्ट सैग्रीगेशन सेंटर खोला, जो कि किसी भी कॉलोनी के पास नहीं था. लोगों की आवाजाही से दूर. इसके बाद उन्होंने नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के पास एक और सेंटर खोला, जिसमें उनके लिए 160 लोग काम करते हैं.
चिंतन NGO की मदद से सिकंदरपुर वाले सेंटर के लिए उन्हें दिल्ली के 10 मॉल, ऑफ़िस और होटल से कचरा मिलता है. वहीं दूसरे सेंटर को रेलवे स्टेशन से कचरा मिलता है. काम अच्छा चल रहा है. सिकंदरपुर में हर दिन 3 टन ड्राई वेस्ट की प्रॉसेसिंग होती है. संतू के अंडर काम करने वाले ये लोग लगभग दिल्ली के 25% वेस्ट को सैग्रीगेट करते हैं. नगर निगम वाले सिकंदरपुर आकर सीखते हैं कि कैसे पर्यावरण का ख्याल रखते हुए कूड़े को पैसे में बदला जा सकता है.
संतू ने अपनी मदद करते हुए कइयों की मदद की है. हाल ही में आए GST ने संतू को निराश किया है. जो वेस्ट रिसाइकल हो सकता है, उन पर 12-18% टैक्स है. उनका कहना है कि सरकार को ऐसा वेस्ट, जो रिसाइकल हो सकता है, उस पर से GST हटा देना चाहिए.
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