तारीख 17 जुलाई 2019 . दिन का समय. राजेश वापस मुंबई जाने की तैयारी कर रहे थे. घर से निकल रहे थे तो उनकी पत्नी प्रतिभा ने ज़िद की कि भूखे पेट बाहर न निकलें. बहुत ज़िद के बाद राजेश ने दाल-चावल के कुछ कौर खाए. और घर से बाहर निकल गए.
कुछ देर बाद गांव में पुलिस आई तो प्रतिभा को पता चला कि गांव में जामुन के पेड़ के पास से राजेश की लाश उठाकर गाड़ी में रखी जा रही है. राजेश को गोली लगी थी. सीने पर और पेट में. राजेश के साथ और आठ लोग थे, जिनकी लाशों को उठाकर गाड़ी में रखा जा रहा था.
सोनभद्र के जिला मुख्यालय रॉबर्ट्सगंज से लगभग 75 किलोमीटर दूर है उम्भा गांव. थाना क्षेत्र है घोरावल. सड़कें खराब हैं. गांव की ज़मीन थोड़ी पथरीली, थोड़ी जंगली और थोड़ी बंजर है. कहीं दूर-दूर तक पत्थर हैं, तो कहीं दूर-दूर तक खेती की ज़मीन. उम्भा में मूलतः गोंड समुदाय के लोग रहते हैं. जिनकी गिनती आदिवासियों या अनुसूचित जनजातियों में होती है.
17 जुलाई के दिन इस गांव में जो हुआ, वैसा सोनभद्र में पहले कभी नहीं हुआ. उम्भा से सटे सपही और मूरतिया गांव के लोगों ने उम्भा के लोगों पर हमला किया. 12 बोर की बंदूकों और लाठियों से. 9 आदिवासी मौके पर ही मारे गए. एक अन्य ने इलाज के दौरान दम तोड़ दिया. 25 से ज्यादा आदिवासी घायल हुए. कुछ गंभीर रूप से, तो कुछ कम गंभीर रूप से.
जिन आदिवासियों ने इस नरसंहार में जान गंवाई, उनके नाम हैं रामधारी गोंड, राजेश गोंड, बासमती देवी, दुर्गावती देवी, रामचंदर गोंड, जवाहिर गोंड, रामसुंदर गोंड, अशोक गोंड, अशोक कुमार, और सुखवंती देवी. तीन महिलाएं और सात पुरुष. और जामुन का एक पेड़.

सोनभद्र के उम्भा में मौजूद जामुन का पेड़ जिसके नीचे नरसंहार हुआ.
सपही, मूरतिया और उम्भा तीनों गांव 6 किलोमीटर के दायरे में फैले हुए हैं. आरोप है कि सपही और उम्भा के ग्राम प्रधान यज्ञदत्त भुरतिया और उनके भाई-सहयोगी कोमल सिंह ने सपही और मूरतिया गांव से लोगों को जमा किया. 32 ट्रैक्टरों और 200-300 लोग सपही और मूरतिया से उम्भा की ओर बढ़ने लगे. जैसे ही लोग उम्भा में दाखिल हुए, तो उम्भा के लोगों को पता चला. उम्भा गांव के लोग दूसरी ओर से जामुन के पेड़ के पास पहुंचे. दोनों पक्षों के बीच मुलाक़ात हुई.
कहानी बताते हैं अम्मर सिंह. 38 साल की उम्र. उम्भा गांव के निवासी. वारदात के समय थोड़ी दूर खड़े होकर पूरी घटना देख रहे थे. पूरा घटनास्थल घुमाते हुए कहते हैं,
“एक तरफ से यज्ञदत्त और उनके लोग आए थे. और दूसरी तरफ से गांव के लोग पहुंचे थे. मैं खेत में अपनी गईया-गोरु चरा रहा था. उम्भा की तरफ से 35 लोग पहुंचा था. लोगों की भीड़ देखी तो पहुंचा.”वे आगे बताते हैं,
“भीड़ जुटी तो उम्भा के लोगों ने कहा कि बातचीत कर ली जाए, लेकिन बातचीत नहीं हो सकी. उधर से 30-32 ट्रैक्टर आए थे. सभी ट्रैक्टर खेत जोतने के इरादे से उतर गए और खेत जोतने लगे. उतने में ही लोगों ने पहली फायरिंग हवा में की, उससे जामुन के पेड़ की एक डाल टूटकर नीचे गिर गई. उसके बाद दूसरी गोली एक महिला पर चली. जिसने गोली चलाई थी, उम्भा के लोग ने मारा उसको. बंदूक छीन ली. तो जवाब में यज्ञदत्त के लोगों ने गोली चलाना शुरू कर दिया.”गोलियों से नहीं मरे तो लाठियों से मारा गया
इसके साथ ही लोगों पर लाठियां भी चलाई गईं. लोग बताते हैं कि पहले लोगों को गोली मारी गई. जब गोली मारे जाने के बाद भी कुछ लोग नहीं मरे तो उन्हें लाठियों से तब तक पीटा गया जब तक उनकी मौत नहीं हो गई. घटनास्थल पर एक पुलिया है. लोग भागकर पुलिया के नीछे छिप गए, वहां पर भी घेरकर उन्हें गोली मारी गई. ऐसा लोग कहते हैं.

घटना में मारे गए रामधारी. उनकी पत्नी अतवरिया के हाथों में उनकी फोटो.
घटना में जो गम्भीर रूप से घायल हुए, उन्हें बनारस में BHU के ट्रॉमा सेंटर में इलाज के लिए भर्ती किया गया है. जिन लोगों को कुछ कम गंभीर चोटें आई हैं, वे सोनभद्र के जिला मुख्यालय रॉबर्ट्सगंज के सरकारी अस्पताल में भर्ती हैं.
ट्रॉमा सेंटर में अजय कुमार मिले. उम्भा से अपनी मौसी सुखवंती और अपने भाई किशन को लेकर आए हैं. सुखवंती के दाहिने पैर में तीन जगह गोलियां लगी हैं, लाठियों की चोट से दाहिना हाथ टूट गया है और बायीं तरफ सीने के नीचे गोलियां लगी हैं. किशन को भी बांह पर गोलियां लगी हैं.
अजय कुमार बताते हैं,
“कुछ समझ में नहीं आया. लोगों को सीधे गोली मार दी गई. लोग जान बचाकर भाग रहे थे. इसी में मेरे भाई और मौसी को गोली लगी.”

रामकुमार गोंड जिन्होंने मरने का नाटक करके अपनी जान बचाई.
कई लोग तो मौके पर ही मारे गए. लेकिन कई लोगों ने जान बचाने की भरसक कोशिश की. रामलाल गोंड रॉबर्ट्सगंज के जिला अस्पताल में भर्ती हैं. उनका माथा लाठी के वार से फूट गया है और उनका बायां हाथ टूट गया है. कहते हैं,
“मेरा हाथ टूटा और सिर फूट गया तो हम थोड़ा-सा दिमाग लगाए. हम वहीं पड़ गए. आंख बंद करके और सांस रोककर पड़े रहे. उन लोगों को लगा कि हम मर गए. तो हम को छोड़ दिए, वरना वहीं मार दिए होते.”बनारस के ट्रॉमा सेंटर में हमें रामकुंवर गोंड मिलते हैं, जो अस्पताल में अपने पड़ोसी नागेन्द्र की तीमारदारी करते हुए मिलते हैं. उनकी मां और उनका भतीजा भी इसी घटना में घायल हुए हैं. मां के सिर में गोली लगी है, स्थिति गंभीर है और आईसीयू में भर्ती हैं.

रामकुंवर गोंड, जिनकी मां और भतीजे को गोली मारी गई.
रामकुंवर बताते हैं,
“लोग पहले आए तो बिना देखे-ताखे गलत खेत जोतने लगे. उनके साथ-साथ आगे-आगे प्रधान यज्ञदत्त और उनके दो भाई चल रहे हैं. जो खेत जोत रहे थे वो उन लोगों की ज़मीन भी नहीं थी. वो गांव के आदमी कैलाशनाथ की पुश्तैनी ज़मीन थी. खेत में धान का बीज पड़ा हुआ था तो सब बर्बाद हो गया. हम लोग विरोध किए तो पहले पैर के पास गोली मारे. फिर हम लोग भी खेत से पत्थर निकालकर मारे तो हम लोगों को सीधा गोली मारने लगे.”रामकुंवर बताते हैं कि उन्होंने खुद गोली नहीं चलाई, बल्कि खुद भीड़ में छिपे रहे और बाकी लोगों को बोला कि गोली चलाओ.
क्या है मसला?
सोनभद्र के लोगों और पत्रकारों के लिए ये पहली घटना है, जिसमें जंगल की ज़मीन पर रह रहे दो गुटों के बीच इतना बड़ा और हिंसक टकराव हुआ है. इसके पहले भी टकराव हुए हैं, लेकिन स्थानीय लोगों और पुलिस-प्रशासन के बीच हुआ. तो क्या था ऐसा, जो इतना बढ़ गया? बात की शुरुआत रामकुंवर से करते हैं. राम कुंवर गोंड कहते हैं,
“सारा मसला ज़मीन का है. हम लोगों के बाप-दादा बताते थे कि ये ट्रस्ट की ज़मीन है. इसमें कुछ लगान दिया जाता है. उसी में अपना घर बनाकर हम लोग अपना जुताई-गुड़ाई कर रहे थे. 2017 में प्रधान ने ट्रस्ट की ज़मीन का बैनामा लिया (मतलब खरीद लिया). हम लोगों ने अपील की कि अगर ये ट्रस्ट की ज़मीन है तो बिक कैसे रही है. इसकी प्रक्रिया क्या है? हमने सिविल कोर्ट में मामला भी दायर किया कि अगर ज़मीन का हस्तांतरण होना है तो सही तरीके से हो, फर्जी तरीके से न हो”रामकुंवर आगे बताते हैं,
“इसके बाद प्रधान यज्ञदत्त हम लोगों से मिले. बोले कि ये जमीन वो ले लिए हैं, और ये ज़मीन तुम लोग छोड़ दो. हम लोगों ने बोला कि आपका जहां होगा, आप नपवा लीजिए. लेकिन कोर्ट या सरकार हम लोग को हटाएगी तो हम लोग हट जाएंगे. आपके कहने से हटेंगे नहीं.”

जामुन के पेड़ के नीचे सड़क पर मौजूद खून के दाग.
और इसके बाद आती है 17 जुलाई, 2019 की तारीख. जब उम्भा में गोलियां चल जाती हैं. जहां उम्भा में मूलतः गोंड आदिवासियों की रिहाईश है, वहीं सपही और मूरतिया में अधिकतर भुरतिया और अग्रहरी रहते हैं. भुरतिया खुद को गुर्जर कहते हैं. और यूपी की पिछड़ी जातियों में गिने जाते हैं. उम्भा के गोंड समुदाय पर हमला करने वालों में मूलतः भुरतिया समुदाय के लोग शामिल थे. इसलिए इस मामले में जातीय संघर्ष का भी एंगल उभरकर सामने आ रहा है. क्योंकि गुर्जर समुदाय के लोगों ने आदिवासियों का नरसंहार किया है.
लेकिन मामला इस बात से कई दशक पीछे जाता है
साल 1955. उस समय सोनभद्र कोई अलग जिला नहीं हुआ करता था. जिला था मिर्ज़ापुर. नयी-नयी ज़मीनदारी ख़त्म हुई थी. तत्कालीन मिर्ज़ापुर के उम्भा गांव में बिहार के माहेश्वर प्रसाद नारायण सिंह ने 465 बीघा ज़मीन खरीदी. सपही गांव में पंजीकृत आदर्श सहकारी समिति के नाम. माहेश्वर प्रसाद नारायण सिंह का नाम रसूख वाला. खुद थे आदर्श सहकारी समिति उर्फ़ आदर्श कोआपरेटिव सोसायटी के चेयरमैन.

कागज़ जो बताते हैं कि माहेश्वर प्रसाद नारायण सिंह ने आदर्श सहकारी समिति के नाम ज़मीन खरीदी.
आधिकारिक दस्तावेज़ों में नाम लिखा मिलता है माहेश्वर प्रसाद नारायण ‘सिन्हा’, जबकि लोग बातचीत में ‘सिंह’ कहते हैं. कांग्रेसी नेता चंद्रेश्वर प्रसाद नारायण सिंह या कहें सीपीएन सिंह के बड़े भाई. सीपीएन सिंह जो पंजाब और उत्तर प्रदेश के राज्यपाल रहे. कहा जाता है कि नेहरू के बड़े करीबी थे. राजीव गांधी के भी.

आदिवासियों की ओर से केस लड़ने वाले नित्यानंद द्विवेदी
बहरहाल, आरोप है कि माहेश्वर प्रसाद नारायण सिंह ने सहकारी समिति के नाम ज़मीन खरीदी. ये ज़मीन कागजों में दीगर बंजर के नाम से दर्ज है. ज़मीन पर खेती नहीं हो सकती है. 1951 में देश में ज़मीनदारी ख़त्म हुई. कहा जाता है कि बड़हर की रियासत की ज़मीन ग्रामसभा में तब्दील हो गई. इसमें से 463 बीघे की एमपीएन सिंह ने आदर्श सहकारी समिति के नाम से खरीद ली.
मामले से जुड़े वकील नित्यानंद द्विवेदी बताते हैं,
“ज़मीन उन लोगों ने खरीद ली. आदिवासियों को तो इतना ही बताया गया कि वे सब भी सोसायटी में मेंबर हैं. और वे लोग ज़मीन में अपनी खेती कर सकते हैं. आदिवासी भी खेती करते रहे. साल 1987 तक सब ठीक था.”सब कुछ ऐसे ही चलता रहा. आदिवासी सहकारी समिति के तहत खेतीबाड़ी करते रहे. लेकिन माहेश्वर प्रसाद नारायण सिंह की मौत हो गई 1978 में.

आदर्श कोऑपरेटिव सोसायटी के खिलाफ दायर किया गया मुक़दमा.
अब कागज़ कहते हैं कि उनकी बेटी आशा मिश्रा और आशा मिश्रा की बेटी विनीता शर्मा ने सोनभद्र जिला न्यायालय में आदर्श सहकारी समिति के खिलाफ केस दायर किया. 1987 में. केस ये कि आशा मिश्रा और विनीता शर्मा दोनों ही समिति की ज़मीन के कुछ हिस्से अपने नाम करने की बात कर रही थीं.
मामला न्यायालय में था. तहसीलदार से रिपोर्ट मांगी गयी. पूछा गया कि ऐसा हो सकता है या नहीं? तहसीलदार ने दो रिपोर्टें लगाईं. पहली रिपोर्ट में कहा कि ऐसा नहीं हो सकता है. दूसरी रिपोर्ट में कहा कि ऐसा कर सकते हैं. और आशा मिश्रा और विनीता शर्मा के नाम 75-75 बीघे ज़मीन कर दी गई.

तहसीलदार द्वारा दायर की गयी पहली रिपोर्ट
नित्यानंद द्विवेदी कहते हैं,
“ये सोचने का विषय है कि एक ही मामले में एक ही तहसीलदार ने दो रिपोर्टें कैसे लगा दीं? या तो तहसीलदार ने दबाव में किया या भ्रष्टाचार के तहत, ये कहा नहीं जा सकता. लेकिन एक ही तहसीलदार की दो रिपोर्टें सवाल उठाती हैं.”

इसी मामले में तहसीलदार द्वारा लगाई गई दूसरी रिपोर्ट, जिसके बाद सारे ऑब्जेक्शन साफ़ हो गए
मामला आगे बढ़ता है. फिर इस मामले में दो हाई-प्रोफाइल नाम आते हैं दो अधिकारियों के. एक का नाम प्रभात कुमार मिश्रा. आशा मिश्रा के पति. बिहार कैडर के पूर्व आईएएस. बैच 1959. और दूसरा नाम भानु प्रताप शर्मा वो भी बिहार कैडर के आईएएस. बैच 1981. आशा मिश्रा और प्रभात मिश्रा की बेटी विनीता शर्मा के पति. प्रभात मिश्रा और भानु प्रताप शर्मा दोनों ही सेवानिवृत्त हो चुके हैं. दोनों ससुर-दामाद. भानु प्रताप शर्मा को पिछले साल मोदी सरकार ने बैंक बोर्ड ब्यूरो का चेयरमैन नियुक्त किया.
कहा जा रहा है कि दोनों आईएएस अधिकारियों ने अपने रसूख़ का इस्तेमाल किया. साल 2017. कागज़ कहते हैं कि 1989 में मिली अपनी ज़मीन की पॉवर ऑफ़ अटॉर्नी विनीता शर्मा ने अपने पिता प्रभात मिश्रा के नाम कर दी. अब आशा मिश्रा के पास भी 1989 में मिली ज़मीन थी, और प्रभात कुमार मिश्रा के पास अपनी बेटी विनीता शर्मा से पॉवर ऑफ़ अटॉर्नी के तहत मिले ज़मीन को बेचने या पट्टे पर देने के अधिकार.
अक्टूबर 2017 में प्रभात मिश्रा और आशा मिश्रा ने अपनी ज़मीन से 145 बीघा बेच दी यज्ञदत्त भुरतिया समेत ग्यारह लोगों को. वकील नित्यानंद द्विवेदी कहते हैं कि एक ही दिन में ज़मीन के 11 कागज़ साइन हुए. उस दिन सोनभद्र के रजिस्ट्री ऑफिस में और कोई काम नहीं हुआ. और यज्ञदत्त द्वारा ज़मीन खरीदे जाने के बाद आदिवासियों से कहा हुआ कि वे अपनी ज़मीनें खाली कर दें.

प्रभात मिश्रा के सहयोगियों को ज़मीन बेचने के कागज़
नित्यानंद द्विवेदी कहते हैं,
“आदिवासियों को पता नहीं था कि उनकी ज़मीन पर इतना खेल हो रहा है. अब तक तो वे खुद को सहकारी समिति का सदस्य मानकर खेती करते आ रहे थे.”यज्ञदत्त को ज़मीन बेचे जाने के खिलाफ़ नित्यानंद द्विवेदी ने मामला भी दायर किया. 2018 में. जिस पर फैसला आना अभी बाकी है. लेकिन इस सबके बीच 17 जुलाई की तारीख आती है. और गोलियां चलाई जाती हैं.
क्या कहते हैं जिन पर भ्रष्टाचार के आरोप हैं?
मामले का दूसरा पक्ष जानने के लिए हमें भानु प्रताप शर्मा से बात की. IAS भानु प्रताप शर्मा ने कहा कि उन्होंने और उनकी पत्नी विनीता शर्मा ने ऐसा कुछ भी नहीं किया है, जैसे उन पर आरोप लग रहे हैं. उन्होंने कहा,
“मैं और मेरी पत्नी आजतक कभी सोनभद्र गए ही नहीं. और मुझे तो उस ज़मीन के बारे में ख़ास जानकारी भी नहीं है. हम पर लगाए जा रहे आरोप बेबुनियाद हैं. मेरा रिकॉर्ड हमेशा से अच्छा रहा है. इन आरोपों से हमें दुःख पहुंचा है.”प्रभात कुमार मिश्रा ने भी बात करते हुए बताया ज़मीन की सारी खरीदफ़रोख्त नियमों के तहत हुई.
"हम पर सोसायटी की ज़मीन खुद के नाम कराने का आरोप लगाया जा रहा है. हमने नहीं किया. मेरी पत्नी आशा मिश्रा और हमारी बेटी विनीता शर्मा ने अपने नाम ज़मीन नहीं की, बल्कि वसीयत से मिली ज़मीन पर उनका नाम चढ़ाया गया. और ज़मीन खरीदने में मेरे ससुर ने कोई गलती नहीं की. उन्हें ज़मीन बड़हर की रियासत से ज़मींदारी ख़त्म होने के बाद मिली थी.”अपना पक्ष साफ़ करते हुए उन्होंने “टाइम्स ऑफ़ इंडिया” को पत्र भी लिखा है और कहा है कि मीडिया में उन पर चलने वाले आरोपों से उनकी छवि को नुकसान पहुंचा है.

सोनभद्र के पूरे मामले में प्रभात कुमार मिश्रा की सफाई.
और प्रशासन को ये अनदेखी भारी पड़ गयी
इस सबके साथ यूपी की राजनीति अपना काम करती है. योगी आदित्यनाथ ने उम्भा का दौरा किया. योगी आदित्यनाथ को दिक्कत न हो इसलिए उम्भा की सड़क बनी. उम्भा में हेलीपैड बनाया गया. लेकिन ज़रूरी ये कि जिस जामुन के पेड़ के नीचे सारी घटना हुई, उसे समतल करने के लिए मिट्टी से पाट दिया गया. योगी मिले पीड़ितों से और मुआवज़े का ऐलान कर दिया. पुलिस चौकी और बाकी सारी सुविधाएं देने का वायदा किया गया.

उम्भा में योगी के आने के पहले की तैयारियां.
अब उम्भा शांत है. चाक-चौबंद है. पुलिस पूछती है कि आप उम्भा क्यों जाना चाहते हैं. मामले में कार्रवाई होते हुए लगभग 40 लोग गिरफ्तार किए जा चुके हैं. और लोगों की धरपकड़ के लिए छानबीन और दबिश दी जा रही है. घटना में इस्तेमाल हुए ट्रैक्टरों को ज़ब्त किया जा रहा है. सपही और मूरतिया गांव के लोग कहते हैं कि ट्रैक्टर ज़ब्त किये जाने में पुलिस मनमानी कर रही है, जिससे सदमें लोगों की जान तक चली जा रही है. प्रधान और मुख्य आरोपी यज्ञदत्त भुरतिया का घर खुला-खाली पड़ा है. घर में अनाज की बोरियां पड़ी हुई हैं, और पास ही मौजूद पानी की बंधी से पानी खींचने के लिए पाइप पड़े हैं. आरोप है कि यज्ञदत्त भुरतिया ने साफ़ पानी के तालाब पर भी कब्ज़ा कर लिया, और बाकायदे पाइप बिछाकर पानी खींचने का काम किया.

दुद्धी के विधायक हरिराम चेरो का योगी आदित्यनाथ को लिख पत्र. चेरो ने कहा था कि उम्भा में कभी भी कोई भी घटना हो सकती है.
लेकिन ‘सोता पुलिस प्रशासन’ की कहावत करवट लेते हुए दिखती है, और पता चलता है कि सोनभद्र के दुद्धी के विधायक हरिराम चेरो ने इस साल जनवरी में ही मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को चिठ्ठी लिखी थी और कहा था कि सोनभद्र में कुछ भी हो सकता है. कोई कार्रवाई नहीं हुई और न ही कोई सुध नहीं ली जा सकी. सोनभद्र के डीएम अंकित कुमार अग्रवाल ने भी हमसे बातचीत में कहा कि इस मामले में इंटेलिजेंस फेल्योर हुआ, नहीं पता लग सका कि ऐसी घटना भी हो सकती है.

सोनभद्र के जिलाधिकारी अंकित अग्रवाल
नहीं पता चला कि एक घर से पांच बंदूकें निकलेंगी और दस आदिवासियों को शांत कर दिया जाएगा.
तमाम लोगों के अपने पक्ष हैं. अपने तर्क हैं. कहा जा रहा है कि भ्रष्टाचार हुआ है, लेकिन जिन नौकरशाहों पर आरोप हैं, वे कहते हैं कि उन्होंने कुछ गलत नहीं किया. कहते हैं कि सभी नियमों का पालन किया. और ज़मीन बेचीं तो उन्हें पता नहीं था कि ज़मीन खरीदने के बाद ग्राम प्रधान कब्ज़े के लिए इस स्थिति तक आ जाएगा. और दस घर होंगे, जहां सिर्फ बच्चों का खाना बन रहा होगा.
























