सोमवार को अखनूर में हुए आतंकी हमले के बाद शिवसेना के निशाने पर अब सेना आ गई है. उसने सेना के लिए नसीहत जारी कर दी है कि वो सत्ताधीशों की चमचागिरी ना किया करें. नोटबंदी के बाद हुए शहीदों की सही संख्या जारी करें. ‘हा हल्ला काय सांगतो?’ (ये हमला क्या कहता है?) टाइटल से ये लेख आया है.शिवसेना कह रही है कि नोटबंदी से पाकिस्तान पर रत्ती-भर भी फ़र्क नहीं पड़ा है और उसकी साजिशें लगातार जारी हैं. नोटबंदी से हुआ नफा-नुकसान तो आने वाला वक़्त बताएगा लेकिन ये राष्ट्रीय कम राजनीतिक विषय ज़्यादा है, इसलिए इस कीचड़ में सेना ना ही उतरे तो बेहतर. इससे उसकी ही जगहंसाई होगी. आगे शिवसेना ने मांग की है कि सेना कल के हमले में मारे गए तीन सैनिकों को मिलाकर कुल कितने जवान शहीद हुए हैं इसका सही सही आंकड़ा दे.
सेना ने जानकारी दी थी कि नोटबंदी के बाद कश्मीर में आतंकी हमलों में 60 से 70 प्रतिशत की कमी आई है. इस स्टेटमेंट के आने के 24 घंटों के अंदर ही अखनूर में बड़ा आतंकी हमला हुआ. तीन जवान शहीद हुए.
शिवसेना लिखती है कि पहले आतंकवादी सार्वजनिक जगहों पर हमलें किया करते थे. लेकिन अब वो सीधे सैनिक ठिकानों को निशाने बना रहे हैं. क्या इसे नोटबंदी के बाद आया हुआ बदलाव माना जाए? नोटबंदी के प्रचार में जो सबसे बड़ा फ़ायदा गिनाया जा रहा था वो ये था कि आतंकियों पर लगाम कसी जा सकेगी. उनकी फंडिंग रुक जायेगी. लेकिन ऐसा होता हुआ दिख नहीं रहा. 8 नवंबर के बाद मणिपुर जैसे राज्यों में भी आतंकी घटनाओं में बढ़ोतरी हुई है. क्या ये नोटबंदी का उल्टा असर है?शिवसेना प्रधानमंत्री मोदी पर निशाना साधने से भी नहीं चुकी है. बकौल शिवसेना नोटबंदी का अगर कोई फायदा नज़र आ रहा है तो वो ये कि प्रधानमंत्री ने कोई बड़ा विदेशी दौरा नहीं किया है. इसके अलावा तो और कुछ ढंग का हुआ हो ऐसा नहीं नज़र आ रहा. सोमवार को कश्मीर में हुआ हमला क्या कहता है! पाकिस्तान की मस्ती कम नहीं हुई है बल्कि उसकी साजिशों में इज़ाफा ही हुआ है. अगर पिछले सालभर के आंकड़ों पर गौर किया जाए तो अब तक 60 जवान शहीद हुए हैं. 2014 और 2015 की तुलना में लगभग दोगुना. अगर नोटबंदी से पाकिस्तान पर असर हुआ है तो चीन की दादागिरी का सेना के पास क्या जवाब है? उसकी जो अरुणाचल, लेह, लद्दाख में घुसपैठ जारी है उसके लिए ज़िम्मेदार कौन?
अपनी तल्खी को और धार देते हुए आगे ये ‘अग्रलेख’ कहता है:
“सेना पर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप करने की हमारी मंशा नहीं है. हम तो खुद चाहते हैं इस कीचड़ में सेना को ना खींचा जाए. लेकिन सेना को भी इस बात की फ़िक्र करनी होगी कि इस गंदगी के छींटे उसकी वर्दी तक ना पहुंचे. अगर सत्ताधारी लोग अपने मतलब के लिए सेना को इस गंदे पानी के नाले में खींच रहे हैं तो सेनाप्रमुख को सावधान रहने की ज़रूरत है. पाकिस्तान पर हुई सर्जिकल स्ट्राइक का श्रेय रक्षामंत्री मनोहर पर्रीकर ने संघ की झोली में डाला और यूपी चुनावों में बीजेपी के लोग खुद ही बधाइयां बटोर रहे हैं. ये पूरा सिलसिला ही हैरान करने वाला है. अगर इतनी ही हिम्मत है तो भाजपा वाले देश में समान नागरिक क़ानून ले आएं. राममंदिर बांध कर दिखाएं. कश्मीर के आर्टिकल 370 में आग लगाकर उसकी राख़ धर्मांधों के मुंह पर मल कर दिखाएं. अगर ये हो पाया तभी देश का भविष्य निर्माण होगा. नोटबंदी के गुण-दोष तो आनेवाला समय बताएगा लेकिन इससे जुडी राजनीति में हिस्सा लेकर सेना अपनी हंसी ना उड़वाए इतना ही हमें कहना है."गौरतलब है कि शिवसेना भारतीय जनता पार्टी की वैचारिक सहयोगी है. महाराष्ट्र सरकार में उसकी पार्टनर तो है ही, साथ ही विचारधारा के फ्रंट पर भी दोनों ही पार्टियां प्रखर हिंदुत्व की झंडाबरदार है. लेकिन इधर कुछ दिनों से शिवसेना में एक बात को लेकर हडबडाहट साफ़ दिखाई दे रही है.
हिंदुत्व के संरक्षक के रूप में उसकी मेहनत से बनाई छवि को भाजपा ने हाईजैक कर लिया है. महाराष्ट्र में शिवसेना जो हमेशा ड्राइविंग सीट पर रही है, अब बैकसीट पर बैठने को मजबूर हो गई है. ऐसे में उपजी बौखलाहट उसे भाजपा पर हमलावर होने को उकसाती है.ताज़ा मामला भी इसी सिलसिले की एक कड़ी मालूम पड़ता है. जिस कहानी में सेना और मोदी दोनों तत्व हो उसका मसालेदार होना तो लाज़मी है ही.
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