भारतीय संविधान का आर्टिकल 19(1)(e):
“All citizens shall have the right — to reside and settle in any part of the territory of India.”
कलर में:
17 नवम्बर 2012, शिवाजी पार्क, मुंबई
लाखों लोग इकठ्ठा हुए हैं. सबकी नसें तनी हुईं. भौंहें फड़क रही हैं. चेहरा लाल. आंखें दुख-संताप से भरी. कुछ लगातार रोए जा रहे हैं. पर मुंह से आवाज न निकालने की कसम खा रखी है. लकड़ियां सजाई गई हैं. उन पर एक मृत शरीर रखा हुआ है. ऐसा प्रतीत होता है कि लोग आसमान से आने वाले यमराज के दूतों से लड़ने के लिए तैयार हैं. और दूत सहमे हुए दूर खड़े हैं. पूरा वातावरण डरा हुआ है.
एक आवाज उठती है: बाला साहेब.... लाखों चिल्लाते हैं: अमर रहें.

ये बाल ठाकरे की जीवन-यात्रा का आखिरी पड़ाव था. उस दिन मुंबई शहर चुप था. ऑफिस, मार्केट सब कुछ बंद था. कभी न रुकनेवाला 2 करोड़ की आबादी का शहर घर में दुबका था. सिर्फ यही 5-7 लाख लोग बाहर थे. ऐसा लगता था किसी ने मुंबई का अपहरण कर लिया है. पूरे देश के न्यूज़ चैनलों के एंकर इस शहर पर आंखें गड़ाए थे. दिल में एक डर था कि कहीं कुछ हो हवा ना जाए. ये पांच लाख लोगों की उत्तेजनाएं कहीं शहर को आग ना लगा दें. एक खुशी भी थी कि आग लगे तो ऐसा रोमांच कभी देखने को नहीं मिलेगा. एक साथ आकर इस डर और खुशी ने शहर को भयावह बना दिया था.
लोगों का यही डर और रोमांच बाल ठाकरे की जीवन-यात्रा रही है. मुंबई में:
1.जहां शहर में आनेवालों को जय महाराष्ट्र बोलने को मजबूर किया गया.
2.जहां से गुजराती, मद्रासी और बिहारी मार के भगाए गए थे.
3.जहां ठाकरे के मरने के अगले दिन दो लड़कियां गिरफ्तार कर ली गयीं क्योंकि उन्होंने फेसबुक पर शहर बंद होने के बारे में लिखा था.

बाल ठाकरे ना तो मुख्यमंत्री थे ना सांसद. कुछ भी नहीं. उन्होंने जिंदगी भर पॉलिटिक्स और नेताओं को गालियां दी. बाल ठाकरे को '21 तोपों की सलामी' दी गई जो राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री को मिलती है.
बाल ठाकरे
23 जनवरी 1927 को पुणे में जन्म हुआ था. पिता का नाम केशव सीताराम ठाकरे. पर पिताजी ने अपना नाम प्रबोधंकर रख लिया था. ठाकरे टाइटल भी एक ब्रिटिश राइटर के नाम से लिया गया था. माताजी का नाम रमाबाई था. बाद में पूरा परिवार मुंबई के पास भिवंडी आ गया. प्रबोधंकर बहुत टैलेंटेड थे. एडिटर, स्टेज-कलाकार, स्क्रीनप्ले-डायलॉग राइटर, इतिहासकार और समाज सुधारक. 'चार बेटियों के पैदा होने के बाद' बाल का जन्म हुआ था. इसलिए घर में जरूरत से ज्यादा मान था. प्रबोधंकर को अपने बेटे पर बहुत गर्व था. बाल ठाकरे के और भी भाई थे. पर बाल ठाकरे की बात और थी. जो दिल में आये करने का अधिकार था. सरकारी नौकरी करने की सख्त मनाही थी. जी में आये तो कार्टूनिस्ट की नौकरी तुरंत छोड़ देने का भी जुगाड़ था. ठाकरे कुछ समय तक आरएसएस शाखा में भी जाते थे.
बाल ठाकरे और कार्टून
बाल ठाकरे एक कार्टूनिस्ट थे. पिताजी ने अच्छे-अच्छे कार्टूनिस्टों से परिचय कराया था. 1950 के आस-पास बाल ठाकरे को क्रांतिकारी कार्टूनिस्ट माना जाता था. चर्चिल से लेकर आइजनहावर तक के कार्टून बनाते थे. उस समय टाइम्स ऑफ़ इंडिया के सन्डे एडिशन में इनके कार्टून छपते थे. मीनू मसानी जैसे नेताओं पर कार्टून बनाने के कारण 'फ्री प्रेस जर्नल' के मालिक से झंझट हो गयी. नौकरी छोड़ दिए. तीन बार पकड़े-छोड़े. दिल नहीं भरता था. हर नेता पर कार्टून बनाने को नहीं मिलता था. बाद में अपने भाई श्रीकांत के साथ मिलकर खुद का मराठी अखबार 'मार्मिक' शुरू कर दिया. मार्मिक मतलब स्ट्रैट फ्रॉम हार्ट.

कार्टून बनाने के क्रम में एक बार कम्युनिस्ट नेताओं से झंझट हो गयी. नेताओं ने अपने गुंडे ठाकरे के घर पर भेज दिए. पिताजी ने किसी तरह बात कर के मामला सलटा दिया. उस समय कम्युनिस्ट नेताओं को अंदाजा नहीं था कि आगे क्या होने वाला है.
उस समय का बम्बई
बम्बई को अंग्रेजों ने बसाया था. छोटे-छोटे सात आइलैंड थे वहां. उनको पाटकर बम्बई बसाया गया. उस समय साउथ बम्बई ही बम्बई था. मतलब दादर से चर्चगेट का एरिया. पर देश के सारे पैसों का लेन-देन वहीं से होता था. मालाबार हिल में सारे बड़े-बड़े व्यापारी रहते थे. नेहरू की सरकार कन्फ्यूज़न में थी कि बम्बई का क्या किया जाए. केंद्र शासित बना दें या किसी राज्य के साथ डाल दें. क्योंकि बम्बई किसी की नहीं थी. अंग्रेजों ने व्यापार शुरू किया. जिसको व्यापार करना था, सारे देश से लोग पहुंच गए. साउथ इंडिया के लोग उस वक़्त ज्यादा पढ़े-लिखे थे. नौकरियों पर काबिज हो गए. गुजराती व्यापार में आ गए. नार्थ इंडिया के माइग्रेंट शहर में हाथ बंटाने पहुंच गए थे.

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उसी समय देश में भाषा-आधारित राज्य बनाने का दौरा पड़ा था लोगों को. मराठी लोगों की डिमांड थी महाराष्ट्र बनाने की. गुजरात और कर्नाटक से काट के. कुछ एरिया कॉमन थे जिसको लेकर टेंशन था. उसके लिए संयुक्त महाराष्ट्र मूवमेंट चलाया गया. 1960 में महाराष्ट्र बन भी गया. पर बॉर्डर एरियाज को लेकर टेंशन ख़त्म नहीं हुआ. पर कोहिनूर मिल गया था. बम्बई महाराष्ट्र की राजधानी बन गयी थी.
मराठी-मानुस और नौकरियां
मराठी लोगों का लिटरेसी रेट साउथ इंडियन लोगों की तुलना में पहले कम था. 1950 के बाद ज्यादा संख्या में मराठी लोग भी हायर एजुकेशन ले रहे थे. पर नौकरियां नहीं मिल रही थीं. बम्बई में. क्योंकि नौकरियां वहीं थी. आज भी तो वहीं हैं.
बाल ठाकरे ने मार्मिक में इसका जिक्र करना शुरू किया. बोलने में बेलाग थे. पहले मजाक में लिख रहे थे. कुछ लोग पढ़ते थे. फिर बहुत तंज कसने लगे. थोड़े लोग और बढ़े. फिर जहर उगलते हुए खुलेआम जंग छेड़ दिए.

बाल ठाकरे के बनाये कार्टून
अब लोग इनके पास अपनी बातें लेकर आने लगे. इनमें ज्यादातर वो लड़के थे जो 1940 के बाद जन्मे थे. उनको स्वतंत्रता संग्राम और नॉस्टैल्जिया से ज्यादा वास्ता नहीं था. उनको जो चाहिए था वो चाहिए था. पढ़े-लिखे थे. नौकरी नहीं थी. जो थीं उन पर साउथ इंडिया के लोग जमे थे. उनके लिए पूरा साउथ इंडिया 'मद्रासी' था. क्योंकि महाराष्ट्र का कुछ हिस्सा उस समय के मद्रास स्टेट से कटकर आया था. अब होने लगा कि हमारे राज्य की राजधानी में मद्रासी सारी नौकरियां लेंगे तो हम क्या झाल बजायेंगे? अब सिर्फ लिखने से काम नहीं चलेगा.
शिवसेना
1966 में बाल ठाकरे ने शिवाजी पार्क में एक नारियल फोड़कर अपने मित्रों के साथ 'शिवसेना' बना ली. शंकर भगवान की नहीं शिवाजी की. बाल ठाकरे की नजर में मराठी ठंडे पड़ गए थे. शिवाजी का वीर मराठा स्वरूप चाहिए था. बाहर के लोगों से निपटने के लिए.
फिर एक मीटिंग बुलाई गई लोगों की. संदेसा सब तक पहुंचना जरूरी था. डर था कि कहीं लोग ना आएं. 50,000 लोगों का इंतजाम था. 2 लाख पहुंचे. बाल ठाकरे ने अपना पहला भाषण दिया. इसी में क्लियर कर दिया कि 'लोकशाही' नहीं 'ठोकशाही' चलेगी.
उस साल भयानक अकाल पड़ा था. लोग भूखे मर रहे थे.
उस साल बम्बई के लिए 'शिवसेना' आ चुकी थी. और उससे ऊपर थे बाल ठाकरे. शिव सैनिकों के लिए अब वो बाला साहेब ठाकरे बन चुके थे.
ये स्टोरी 'दी लल्लनटॉप' के लिए ऋषभ ने की थी.
पढ़िए:
बाल ठाकरे और शिवसेना की कहानी: पार्ट 2
बाल ठाकरे और शिवसेना की कहानी: पार्ट 3
''हिंदुओं ने दिखा दिया. अब वो मारते हैं, मरते नहीं'' : पार्ट 4
क्या हुआ जब बाल ठाकरे के हाथ में मुंबई का रिमोट आया?: पार्ट 5