आरोपियों ने पुलिस पूछताछ में जो ब्योरा पेश किया गया, वो हिला देने वाला है. आरोपियों ने बताया कि इस खौफनाक गैंगरेप से गुजरने के बाद गुड़िया काफी देर तक अपनी जान की भीख मांगती रही. उसने कहा था कि वो जिंदा रहना चाहती है. लेकिन आरोपियों ने उसकी एक ना सुनी और उसका गला घोंटना शुरू किया. करीब 10-12 मिनट छटपटाने के बाद उसने दम तोड़ दिया.
पुलिस ने इस बार भी ऐक्शन करने में देरी कर दी. इस बीच गुड़िया की क्षत-विक्षत लाश की तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल होने लगी और लोगों का गुस्सा फूट पड़ा. शिमला से शुरू हुए प्रदर्शन ने जल्द ही पूरे पहाड़ को अपनी गिरफ्त में ले लिया.
प्रदर्शन चल ही रहे थे. इस बीच मुख्यमंत्री के आधिकारिक फेसबुक एकाउंट से 11 तारीख की रात चार आरोपियों की फोटो पोस्ट की गई. पोस्ट में लिख गया कि शिमला गैंगरेप के मामले में आरोपियों से पुलिस पूछताछ कर रही है. हालांकि यह पोस्ट जल्द ही हटा ली गई लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी. पोस्ट के स्क्रीनशॉट कट चुके थे और सोशल मीडिया पर वायरल हो चुके थे.
सरकार पर आरोप क्यों लगे
इस बीच 10 तारीख को मामले की जांच एसआईटी के हवाले कर दी गई. हत्या के 9 दिन बाद 13 जुलाई को पुलिस ने 6 आरोपियों को गिरफ्तार किया. पुलिस ने इसे बड़ी कामयाबी बताया लेकिन ये वो मौका था, जहां जांच संदेह के दायरे में आ गई. मुख्यमंत्री के फेसबुक एकाउंट से जिन चार युवकों की तस्वीर शेयर की गई थी, वो रसूखदार घरों से आते हैं. सरकार पर आरोप लगा कि वो आरोपियों को बचाने के लिए बेगुनाह लोगों की बलि ले रही है.
ये हैं बड़े सवाल
पकड़े गए 6 आरोपी थे, राजेंद्र सिंह उर्फ राजू, सुभाष बिष्ट, दीपक, सूरज सिंह, लोकजन और आशीष. लेकिन पुलिस की तफ्तीश कई सवाल छोड़ जाती है. मसलन-
1. अगर गुड़िया की मौत 4 जुलाई को हुई थी, तो उसकी लाश पूरे दो दिन तक जंगली जानवरों से कैसे बची रही?
2. पुलिस का कहना है कि गुड़िया की लाश के पास से उसके कपड़े बरामद किए गए हैं. 5 तारीख को उस इलाके में भयंकर बारिश हुई थी. ऐसे में कपड़े मौका-ए- वारदात से सही-सलामत मिल जाएं, ये बात गले उतरनी मुश्किल है.
3. नेपाली मूल के दो आरोपियों के घर घटनास्थल से महज 200 मीटर की दूरी पर हैं. ऐसे में सवाल ये उठता है कि आरोपियों ने लाश को ठिकाने लगाने या शिमला से भाग जाने की कोशिश क्यों नहीं की?

वीरभद्र सिंह का फेसबुक पोस्ट
वीरभद्र सिंह के फेसबुक पोस्ट में शेयर की गई आरोपियों की फोटो के हटाए जाने के बाद लोग यह संदेह जता रहे थे कि इस मामले में जांच के नाम पर लीपापोती की जाएगी. जिस नाटकीय तरीके से छह आरोपियों की गिरफ्तारी हुई, उसने संदेह को और गहरा दिया. पूरे मामले को समझने के लिए 15 जुलाई को दिया गया गुड़िया की मां का बयान बहुत महत्वपूर्ण है. मीडिया से बात करते हुए उन्होंने कहा कि वो चाहती हैं कि उनकी बेटी के साथ दुष्कर्म करने वालों को कड़ी से कड़ी सजा मिले लेकिन वो ये नहीं चाहती हैं कि कोई बेगुनाह इस मामले में बलि चढ़ जाए.
ये सवाल उठ ही रहे थे कि 18 और 19 जुलाई की दरम्यानी रात नेपाली मूल के एक आरोपी सूरज सिंह की उसके साथी राजेंद्र ने हिरासत में हत्या कर दी. ये खबर जैसे ही बाहर आई लोगों का गुस्सा फूट पड़ा. लोग पहले से ही मामले की जांच को संदिग्ध मान रहे थे. सुबह से ही लोग थाने के बाहर जुटने लगे. दोपहर तक लोगों की संख्या हजारों में पहुंच गई. भीड़ बेकाबू हो गई. 19 जुलाई को करीब 3.15PM पर भीड़ थाने में घुसी और उसे आग के हवाले कर दिया. आईजी जहूर जैदी को पुलिस थाने में बंधक बना लिया गया. जैसे-तैसे करके बलवा शांत हुआ.
देर शाम शिमला के आईजी, एसपी और एएसपी बदल चुके थे. एसआईटी टीम में भी बदलाव किए जा चुके थे. राज्य सरकार की तरफ मामला सीबीआई जांच के लिए जा चुका था. मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह मामले के राजनीतिकरण का आरोप विपक्ष के मत्थे मढ़ चुके थे. प्रदर्शनकारियों ने मालघर से निकाल कर जब्त की गई अवैध शराब की कई पेटियां भी जला दी थी. इसे पुलिस लूट के खाते में दर्ज कर चुकी थी.
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