केशव मौर्य ने कहा बीजेपी यूपी में जीती तो राम मंदिर बनेगा. क्योंकि ये बड़ा बयान था इसलिए मीडिया ने इसे बड़े में बताया.
एक ने लिखा, भाजपा नेता केशव मौर्य का बयान, सरकार बनी तो बनेगा राम मंदिर.
दूसरे ने लिखा, यूपी के बीजेपी नेता केशव मौर्य का बड़ा बयान, कहा, बहुमत मिला तो बनेगा राम मंदिर
तीसरे ने लिखा, यूपी भाजपा के अध्यक्ष केशव मौर्य का बड़ा बयान, कहा पूर्ण बहुमत मिला तो बनेगा राम मंदिर.
चौथे को लगा कि बयान में कुछ छोटा न रह जाए.
सो उसने लिखा उत्तर प्रदेश भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्या का बहुत बड़ा बयान, पूर्ण बहुमत मिला तो बनेगा राम मंदिर. आखिरी वाले ने मौर्य को मौर्या कर डाला. इस बात पर तसल्ली से चर्चा हो सकती है कि मौर्य होता है या मौर्या जैसे मैंने एक बार कुछ भाषाविदों को बहस करते देखा कि नेताजी लिखा जाए या नेता जी. बहस मेरे इस कथन के बाद खत्म हुई कि कुछ भी लिखिए, नेताजी को करप्शन तो उतना ही करना है.
एक्चुअली उनने कहा . "राम मंदिर आस्था का सवाल है. दो महीने में इसका निर्माण होने नहीं जा रहा है. मंदिर का निर्माण चुनावों के बाद किया जाएगा. भाजपा पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आएगी."
पर इससे पहले कि ये खबर वेब पोर्टलों पर लग के फैल पाती, इस खबर के राजनैतिक मायने निकाले जा सकते. बीजेपी की लानत-मलानत पर डेढ़ सौ से ज्यादा शब्द लिखे जाते. टेंट तले बैठे रामलला ठंडी में फीलगुड महसूसते. मीम बनते, लंतरानी होती. केशव प्रसाद मौर्या पलट गए. जैसे एक कविता में चंकी पांडे मुकर गया था. जैसे मिस्टीक मैग्नेटो की टीम में मिल जाती है. वैसे जैसे एजेंट वार्ड हाइड्रा निकल जाता है. लेकिन जिस वक़्त वो अपने बयान से पलट रहे थे, बस एक बात वैसी ही थी. मोदी जी को पता था कैमरा कहां है. मोदी जी को हमेशा पता होता है.
अब बोले, 'यूपी चुनाव में मुख्य मुद्दा सुशासन और भ्रष्टाचार हैं. हम यूपी को गुंडागर्दी से मुक्त कराएंगे. हम 300 से ज्यादा सीटें जीतकर उत्तर प्रदेश में भाजपा की सरकार बनाएंगे.' राम मंदिर पर क्या कहे कि मैंने इस तरह का कोई बयान नहीं दिया है. मैंने जो कुछ भी कहा, उसे गलत ढंग से पेश किया गया.
वैसे केशव प्रसाद मौर्य ठीक कह रहे हैं. उनकी बात को तोड़-मरोड़कर ही पेश किया गया है. जैसा कि हर नेता के हर बयान के साथ हर तीसरे दिन होता है. जितना इनके बयान तोड़े-मरोड़े जाते हैं. बयान को इलास्टिक कहना चाहिए. बयान जितना गलत ढंग से पेश किए जाते हैं, बयानों का नाम इमोशनल अत्याचार या बिग बॉस होना चाहिए. जैसे बूमरैंग की प्रवृत्ति होती है, वो लौटकर आता है. वैसे ही बयान की प्रवृत्ति है. वो जाते-जाते मुड़ ही जाता है.
केशव प्रसाद मौर्य का कहना सही है. उनके बयान को तोड़ा-मरोड़ा ही गया होगा. वजहें गिनें.
केशव प्रसाद मौर्य ने ये कहा था कि राम मंदिर बनाएंगे. ये नहीं कहा कि कहां बनाएंगे. खैर उसका जवाब बीजेपी के पुराने नेताओं के पास है. मंदिर कहां बनाएंगे? '
मंदिर वहीं बनाएंगे.' केशव प्रसाद मौर्य भी वही कर सकते हैं, चुनाव खत्म हो तो घर के अगाड़े में राम मंदिर बनवा लें. केशव प्रसाद मौर्य की बातों पर आपत्ति हो भी क्यों? आज उन्होंने कहा कि यूपी में 300 से ज्यादा सीटें जीतेंगे. ये तय थोड़े ही है? पर कोई ये नहीं पूछ रहा है कि कैसे जीत लेओगे? हलवा-पूरी है क्या. वैसे ही सेम मुंह से निकले इस बयान कि मंदिर बनाएंगे पर आपत्ति कैसे हो सकती है? या तो आप ये न मानो कि वो राम मंदिर न बना पाएंगे, या ये मान लेओ कि 300 सीट आ रही हैं. तीसरी बात वो केशव प्रसाद मौर्य हैं ही नहीं, वो तो ताहेर शाह हैं. जो शांति के मिशन पर आए हैं और ये शांतिप्रिय बयान दे गए हैं. यही हुआ है. यही सच है. यही लॉजिक है, यही वजह थी, बयान देने की भी और बाद के बयान पर भी. इससे ज्यादा लॉजिकल तो उनका बयान भी नहीं था :)