
यूपी में 2017 में जब विधानसभा चुनाव होने थे, तो बीजेपी ने अपने चुनावी घोषणापत्र में कहा था कि अगर बीजेपी चुनाव जीत जाती है, तो प्राथमिक और उच्च प्राथमिक स्कूलों के बच्चों को सर्दियों से बचाने के लिए स्वेटर बांटे जाएंगे. मार्च में हुए चुनाव में बीजेपी को जीत मिली और योगी आदित्यनाथ प्रदेश के मुख्यमंत्री बन गए. गर्मी बीती और ठंड आ गई. दिसंबर और जनवरी प्रदेश में सबसे ज्यादा ठंड का महीना होता है. दिसंबर बीत गया और जनवरी बीतने को है, लेकिन बच्चों को स्वेटर नहीं मिल पाया.
चुनाव में वादा कर दिया था, जब बजट पेश किया तो पैसे ही नहीं दिए

मुख्यमंत्री योगी ने जब पहला बजट पेश किया, तो उसमें स्वेटर के लिए पैसे का आवंटन नहीं किया गया था.
सरकार बनने के बाद जब अक्टूबर 2017 में कैबिनेट की बैठक हुई तो तय किया गया कि स्वेटर बांटा जाएगा. जुलाई में बजट पेश करने के दौरान स्वेटर बांटने के लिए सरकार ने कोई फंड नहीं रखा था. जब कैबिनेट ने प्रस्ताव पास कर दिया, तो दिसंबर में अनुपूरक बजट के दौरान स्वेटर का फंड रखा गया. ये पूरा फंड 390 करोड़ रुपये का था. इस पैसे में यूपी के 1.59 लाख सरकारी प्राथमिक और उच्च प्राथमिक स्कूलों के 1.54 करोड़ बच्चों को स्वेटर बांटे जाने थे. इस लिहाज से एक स्वेटर पर सरकार करीब 200 रुपये खर्च करने वाली थी.
पैसे ज्यादा लग रहे थे, तो टेंडर रद कर दिया
सरकार ने स्वेटर बांटने के लिए हर जिले से पोर्टल के जरिए आवेदन मंगाए गए. हर जिले में स्वेटर के रेट अलग-अलग थे, लिहाजा सरकार ने पूरी प्रक्रिया रद कर दी. अभी सरकार कोई नई प्रक्रिया अपनाती, उससे पहले प्रदेश में निकाय चुनाव की अधिसूचना लागू हो गई. सरकार ने निर्वाचन आयोग से स्वेटर बांटने की योजना को पुराना बताते हुए मंजूरी मांगी. 19 नवंबर को निर्वाचन आयोग ने यूपी सरकार से कहा कि वो स्वेटर बांट सकती है. इसके बाद नए सिरे से प्रक्रिया शुरू हुई. प्रदेश स्तर पर ई-टेंडर का फैसला लिया गया. इस टेंडर में और भी ज्यादा पैसे खर्च हो रहे थे, तो सरकार ने इसे भी निरस्त कर दिया.शिक्षा मंत्री ने कहा था- मैं भी नहीं पहनूंगी स्वेटर

बेसिक शिक्षा मंत्री अनुपमा जायसवाल ने कहा था कि जब तक बच्चों को स्वेटर नहीं मिल जाते, वो खुद भी स्वेटर नहीं पहनेंगी.
प्रदेश की बेसिक शिक्षा मंत्री हैं अनुपमा जायसवाल. 25 दिसंबर को पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के जन्मदिन पर वो अम्बेडकरनगर में थीं. इस दौरान उनसे सवाल हुए कि बच्चों को स्वेटर नहीं दिया गया, जबकि कड़ाके की ठंड पड़ रही है. इसपर शिक्षामंत्री ने कहा था कि स्वेटर का टेंडर हो गया है और जल्द ही सारे बच्चों को स्वेटर बांट दिया जाएगा. अनुपमा जायसवाल ने ये भी कहा था कि जब तक बच्चों को स्वेटर मिल नहीं जाता, वो खुद भी स्वेटर नहीं पहनेंगी. इस दौरान यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने भी सवाल उठाए थे. उन्होंने ट्वीट कर कहा था-
हालांकि इसके दो दिन बाद ही 28 दिसंबर को नए सिरे से आवेदन मांगे गए. दो कंपनियों ने आवेदन किया, लेकिन सरकार ने रेट ज्यादा होने का तर्क देते हुए इसे भी खारिज कर दिया.
फिर स्कूलों को दे दी स्वेटर बांटने की जिम्मेदारी

सरकार ने स्वेटर बांटने के लिए कई बार टेंडर निकाले, लेकिन अधिक पैसे लगने का हवाला देकर हर बार उन्हें रद कर दिया गया.
टेंडर के जरिए जब सरकार स्वेटर बांटने में नाकाम हो गई, तो इसका जिम्मा विद्यालय प्रबंध समिति को सौंप दिया गया. जो बड़ी-बड़ी कंपनियां 200 रुपये में बच्चों को स्वेटर देने में नाकाम रही थीं, वहीं अब हर स्कूल के जिम्मे था कि वो 200 रुपये में अपने बच्चों को स्वेटर बांटे. सरकार ने आदेश दिया कि 6 जनवरी से स्कूलों में स्वेटर बांटे जाएंगे. एक स्वेटर की कीमत 200 रुपये होगी और हर स्वेटर का रंग मरून होगा. स्कूलों में स्वेटर बांटने के लिए सरकार की ओर से अपर मुख्य सचिव (बेसिक शिक्षा) ने सभी डीएम को आदेश दिया कि डीएम की निगरानी में समिति बनेगी. सांसद, विधायक या फिर और किसी जनप्रतिनिधि की मौजूदगी में स्वेटर बांटे जाएंगे.
शिक्षकों से कहा गया-180 रुपये में ही बांट दो स्वेटर

जब कोई कंपनी 200 रुपये में स्वेटर बांटने को तैयार नहीं हुई तो शिक्षकों से ही कहा गया कि वो 200 रुपये में स्वेटर बांट दें.
जिस स्वेटर को कंपनियां बच्चों को 200 रुपये में भी नहीं बांट पा रही थीं, उसे कहा गया कि स्कूलों के शिक्षक 200 रुपये में बांट दें. सरकारी आदेश था, तो शिक्षकों को मानना ही था. किसी तरह से कुछ शिक्षकों ने थोड़े-बहुत बच्चों को स्वेटर खरीदकर दिए. एक शिक्षक ने बताया कि उन्हें भी स्वेटर खरीदना पड़ा है. सरकार 200 रुपये दे रही है, लेकिन बाजार में स्वेटर 268 रुपये का पड़ा है. जो अतिरिक्त पैसा है, वो हमें अपनी जेब से देना होगा. अभी शिक्षक स्वेटर बांट ही पाते कि हर जिले के जिलाधिकारियों के लिए नया आदेश जारी हो गया. उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले में डीएम की अध्यक्षता में हुई कमिटी में स्वेटर का दाम और भी घटा दिया गया. इस कमिटी ने पाया कि वो अधिकतम 180 रुपये में ही स्वेटर बांट देंगे. इसके अलावा हर स्वेटर पर एक कदम शिक्षा की ओर का लोगो भी लगा होगा. अब शिक्षक इस फैसले से परेशान हैं. वो पहले ही 200 रुपये में स्वेटर नहीं बांट पा रहे थे, अब उन्हें 180 रुपये में ही स्वेटर बांटना है. ऐसे में उन्हें अपनी जेब से पैसे खर्च करने पड़ेंगे. फैसला डीएम की अध्यक्षता में बनी कमिटी ने लिया है, तो फिर शिक्षकों को तो उसे हर हाल में पूरा करना ही होगा. बस एक बात तय है कि जब तक स्वेटर बांटे जाएंगे, प्रदेश में इस साल की ठंड का नामोनिशान भी नहीं रह जाएगा.
सात साल के बच्चे को दे दिया था 7 नंबर का जूता

प्राइमरी स्कूल के बच्चों को जूते और दो जोड़ी मोजे भी दिए जाने थे, लेकिन बिना नाप लिए उन्हें जूते दे दिए गए.
प्रदेश सरकार ने इस साल कक्षा 1 से 8 तक के बच्चों को जूते-मोजे देने का भी प्रस्ताव रखा था. जूते-मोजे बांटे भी जाने लगे, लेकिन किसी भी स्कूल में बच्चों के जूतों का नाप तक नहीं लिया गया. प्राथमिक और उच्च प्राथमिक स्कूलों में आम तौर पर चार साल से लेकर 12 साल तक के बच्चे पढ़ते हैं. जूता बांटने के लिए जो टेंडर निकला था, उसमें बच्चों के पैरों के नाप का जिक्र नहीं था. ऐसे में थोक के भाव में जूते स्कूलों में रख दिए गए और शिक्षकों से कहा गया कि उन्हें बांट दो. प्राइमरी स्कूल के एक टीचर ने तो कहा कि अब शिक्षकों के पास पढ़ाने के अलावा सारे काम आ गए हैं. बच्चों के स्वेटर की माप से लेकर उनके पैरों के जूतों को मापने तक का काम शिक्षकों के जिम्मे है. जब टेंडर हो रहे थे, तो जूतों की नाप नहीं ली गई. अब कई अलग-अलग नाप के जूते स्कूलों में रख दिए गए हैं और शिक्षकों से कहा जा रहा है कि वो बच्चों के पैर का नाम लेकर उन्हें जूते बांट दें.

यूपी के तराई इलाकों जैसे बहराइच, गोंडा, बलरामपुर, लखीमपुर-खीरी जैसे जिलों में और भी ज्यादा ठंड पड़ती है, जहां स्वेटर और जूते बांटे जाने हैं.
यूपी में ठंड कड़ाके की पड़ती है. यूपी में तराई के भी इलाके हैं, जहां ठंड जानलेवा पड़ती है. ऐसे में प्राइमरी स्कूल के बच्चों के लिए सरकार की स्वेटर और जूते-मोजे देने की योजना अच्छी है. लेकिन ठंड रहते ही बच्चों को ये चीजें नहीं मिलीं, तो फिर इस योजना का कोई फायदा नहीं होगा. कुछ लोग तर्क दे रहे हैं कि इस साल नहीं, तो अगले साल तक सब ठीक हो जाएगा. लेकिन ये स्वेटर और जूते बच्चों को दिए जा रहे हैं. बच्चे इस उम्र में जल्दी बड़े हो जाते हैं, ऐसे में अगले साल बहुत से स्वेटर और जूते किसी काम के नहीं रह जाएंगे. बेहतर यही है कि सरकार वक्त रहते बच्चों को स्वेटर-जूते मुहैया करवा दे, जिससे कि बच्चों को इस योजना का फायदा मिल सके.
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