प्रणब मुखर्जी संघ के मंच पर थे लेकिन उन्होंने भगवा ध्वज को प्रणाम नहीं किया.
वसुन्धरा परिवार हमारा हिन्दु का यह विशाल चिन्तन,
इस वैश्विक जीवन दर्शन से मानव जाती होगी पावन.
संघ शिक्षावर्ग के तीसरे वर्ष के समापन पर नागपुर में कार्यक्रम के मंच पर जब प्रणव मुखर्जी खड़े थे और बगल से यह गाना गाया जा रहा था. गाने सुनने में बहुत सुरीला था लेकिन क्या यह प्रणब मुखर्जी को भी उतना ही सुरीला लगा होगा? प्रणब मुखर्जी ने अपनी जिंदगी आरएसएस की 'हिंदुत्व' की विचारधारा के खिलाफ खपा दी. आज वो उसी संघ के मंच पर खड़े थे. इधर उनकी पेरेंट पार्टी की जान मानों हलक में अटकी हुई थी. भाषण शुरू होने से पहले टीवी पर चल रही तमाम बहसों में से कांग्रेस प्रवक्ता गायब थे.
प्रणब मुखर्जी के बारे में एक बार इंदिरा गांधी ने कहा था कि प्रणब के मुंह से सिर्फ पाइप का धुंआ निकल सकता है, मेरा कोई राज नहीं.' यह बयान बतौर राजनेता उनके व्यक्तित्व को समझने की सबसे बढ़िया खिड़की है. प्रणब पांच दशक के अपने सियासी जीवन में कभी भी बहुत बड़े जननेता नहीं रहे. सियासी गलियारों में उनकी पहचान हमेशा से एक शातिर रणनीतिकार की रही है. वो बेहद सधे हुए अंदाज में बोलते हैं. कई बार तो उनकी चुप्पी ने कांग्रेस को बड़े संकट से बचाया है. शाह कमीशन की सुनवाई के दौरान उनकी चुप्पी को 'ऐतिहासिक' करार दिया जाना चाहिए.
इंदिरा कहा करती थीं कि प्रणब के मुंह से पाइप का धुंआ तो निकल सकता है लेकिन मेरा कोई राज नहीं.
अंग्रेजी में मुहावरा है, 'टंग इन चीक अप्रोच'. माने गाल में जीभ फंसाकर बोलना और खुद को बोलने की जिम्मेदारी से मुक्त कर लेना. प्रणब मुखर्जी आज संघ के मंच से यही करते हुए दिखाई दिए थे. संघ जिस 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' की बात करता है, दरअसल उनकी जड़े जर्मनी के राष्ट्रवाद तक जाती हैं. हिटलर जिस महान जर्मनी की नींव रख रहा था, वो एक नस्ल, एक भाषा और एक संस्कृति पर टिका हुआ था. प्रणब मुखर्जी ने राष्ट्रवाद की इस विचारधारा को अपने भाषण में लीरा-लीरा कर रहे थे. वो पश्चिम के इसी राष्ट्रवाद के खिलाफ राष्ट्रवाद के देसी संस्करण को खड़ा कर रहे थे. उन्होंने कहा-
"यूरोपियन नेशन-स्टेट की अवधारणा से बहुत पहले से भारत एक स्टेट था. यूरोप में नेशन स्टेट का विचार 1648 की 'ट्रीटी ऑफ़ वेस्टफेलिया' से शुरू हुआ. राष्ट्र के बारे में पश्चिम का मॉडल एक तय भू-भाग, एक जबान, एक धर्म और एक साझा दुश्मन की बात करता है. इस मॉडल के चलते यूरोप में कई सारे नेशन-स्टेट खड़े हुए.
दूसरी तरफ पश्चिम के राष्ट्रवाद के उलट भारतीय राष्ट्रवाद 'वसुधैव कुटुम्बकम' के दर्शन में विश्वास रखता है. एक लंबी प्रकिया से निकलकर हमारी राष्ट्रीय पहचान बनी है. कई संस्कृतियों के संगम और एक सहअस्तित्व ने इस पहचान को गढ़ा है. धर्म, भाषा और संस्कृति की विविधता ही भारत को स्पेशल बनती है. हमारी सहिष्णुता हमें ताकत देती है. हम अपनी बहुलता का सम्मान करते हैं. हम अपनी विविधता का जश्न मनाते हैं. ये सदियों से हमारी साझी चेतना का हिस्सा है. अगर रूढ़ियों,धर्म क्षेत्र,भाषा की पहचान के आधार पर हमारे नेशनहुड को परिभाषित करने का कोई प्रयास होता है तो यह हमारी राष्ट्रीय पहचान को खात्मे की तरफ ले जाएगा."
प्रणब मुखर्जी ने आरएसएस के मंच पर चढ़कर राष्ट्रवाद की जो अवधारणा सबके सामने रखी, वो हमारी आज़ादी, हमारे आन्दोलन की देन है. आगे चलकर कांग्रेस ने कागजों पर ही सही 'राष्ट्रवाद' के इसी सिद्धांत पर भरोसा कायम रखा. संघ और बीजेपी का राष्ट्रवाद प्रणब के बताए राष्ट्रवाद से मेल नहीं खाता है. आरएसएस की पूरी विचारधारा 'हिन्दू राष्ट्र' के इर्द-गिर्द खड़ी है.
मंच से बोलते प्रणब दा.
प्रणब मुखर्जी से पहले सरसंघ चालक मोहन भागवत भी इसी मंच पर बोल रहे थे. यह उनका घरेलु मैदान था. वो मौके की नज़ाकत के लिहाज़ से राष्ट्रवाद के मुद्दे पर थोड़ी नरमी दिखा रहे थे. उन्होंने संघ को हिन्दुओं का नहीं, सभी भारतवासियों का संगठन बताया. सार्वजनिक मंच पर संघ के कई नेता भारत में रहने वाले इंसान को 'हिंदू' कहते आए हैं. यह मंच पर कहने की बात है. संघ के लिए हिंदू हमेशा से धार्मिक पहचान रहा है.
1977 में आपातकाल के बाद संघ की प्रतिनिधि सभा की बैठक हुई थी. बाला साहेब देवरस उस समय सरसंघ चालक हुआ करते थे. उन्होंने प्रतिनिधि सभा में यह प्रस्ताव दिया कि संघ का दरवाजा मुस्लिम समुदाय के लोगों के लिए भी खोला जाना चाहिए. यादवराव जोशी, मोरोपंत पिंगले, दत्तोपंत ठेंगड़ी जैसे कई कद्दावर नेताओं ने इस बात का जमकर विरोध किया था. आखिरकार देवरस को अपने पैर पीछे खींचने पड़े थे. उन्होंने समापन भाषण में इस अध्याय को हमेशा के लिए बंद कर दिया.
बालासाहब देवरस जिन्होंने आपातकाल के दौरान संघ के राजनीतक चरित्र को गढ़ा.
इस लिहाज़ से देखें तो प्रणब ने बड़े मजबूत तरीके से अपना पक्ष रखा. राष्ट्रपति बनने के बाद उनकी पिछली राजनीतिक वफादारियां निरस्त हो जाती हैं. वो किसी भी मंच पर जा सकते हैं. यह उनकी पसंद का मसला है. अपने भाषण से उन्होंने संघ के कार्यक्रम में जाने के सारे विवादों को आइना दिखाने की कोशिश की.
उनके पूरे भाषण में एक बात बहुत मार्के की रही. जब वो भारत के इतिहास के जरिए यहां के राष्ट्रवाद को समझाने की कोशिश कर रहे थे, तो कुछ सेकंड के लिए उनकी काल गणना बिगड़ गई. मौर्य-गुप्त राजवंश के जिक्र के बाद उन्होंने मुस्लिम आक्रमणकारियों का जिक्र किया. इसके बाद वो सीधे प्लासी के युद्ध और अग्रेजों की हुकूमत पर कूद गए. वो इस नाजुक मौके पर अकबर और जहांगीर का जिक्र करना भूल गए. लेकिन उनके इस पैंतरे ने उन्हें अपनी बाकि बात को खुलकर रखने का मौका भी दिया. बतौर राजनेता यही उनकी खासियत है. प्रणब मुखर्जी की चुप्पी उनके बोले गए शब्दों से ज्यादा मानीखेज़ होती है.
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