आगे बढ़ते हैं. सर्विस टैक्स 14.5 से बढ़ाकर 15 फीसदी हो गया. जिससे ये सब होगा महंगा. अच्छा महंगा होगा तो ठेंगे से. खाना तो खैर घर पर भी मिलता है यार. लेकिन मोबाइल पर बतियाना. तौबा तौबा. अगर इस पर कोई आंच आई तो इन्कलाब आएगा.
लल्लन खामोशी अख्तियार कर ले ऐसे हालात में. अगर सिर्फ अपनी बात करनी हो. लेकिन फर्ज भी तो बनता है कि दोस्तों-मितरों के गम में शरीक हो. डीजल महंगा, डाजल कार महंगी. बंदा साइकिल से दफ्तर आए जाए. लेकिन अगला निशाना जो है. वो नाकाबिले बर्दाश्त है.
पहली जीन्स पापा दिलाए थे. बहुब्बढ़िया कपड़े पहने. ठेले वाले भी खरीदे. लेकिन इस मामले में हम बजट के साथ खड़े हैं. बनाने वाले ने क्या खूब बनाया है. अगर डेढ़ सौ की जीन्स 6 सौ में मिल रही है तो बुरा क्या है. कंधे उचका कर कह सकते हैं. 'सस्ते कपड़े अपने से पहने नहीं जाते. सो ऑड यू नो.'
उप्परवाला न जाने कौन से जन्मों का बदला ले रहा है. जिससे उम्मीद करो कि गरीबी में हमारा हाथ थामेगा वो आटे में पानी घोल के पनारे पर उलट आता है. गरीब की हाय से दुनिया डरती है. मिडिल क्लास की हाय जैसे फोकट में आती है. कोई पूछता नहीं. लेकिन फिकर नॉट. कभी न कभी ये भी लगेगी. बस इसमें मिलावट करने का थर्ड क्लास बंद करें मिडिल क्लासिए.
लल्लन बजट से पहले क्या सोच रहा था















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