प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकसभा सीट वाराणसी में आख़िरी फेज़ में यानी 1 जून को वोट पड़ने हैं. प्रधानमंत्री ने तीसरी बार यहां से अपनी दावेदारी पेश की है. इन चुनावों में इस सीट की चर्चा कॉमिक और मिमिकरी आर्टिस्ट श्याम रंगीला के पर्चा भरने और पर्चा ख़ारिज होने की वजह से भी उठी थी. पर्चा से चर्चा उड़ी, तो ये भी जानकारी आई कि शुरुआत में कुल 41 प्रत्याशियों ने इस सीट पर अपना दावा ठोका था. इनमें से केवल सात उम्मीदवारों का नामांकन ही चुनाव आयोग की जांच प्रक्रिया से पास हो पाया. सात उम्मीदवार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को मिलाकर हैं.
कोई दिल्ली से तो कोई हैदराबाद से, वाराणसी में PM मोदी को चैलेंज करने वाले ये छह लोग कौन हैं?
Varanasi Loksabha Seat पर शुरुआत में कुल 41 प्रत्याशियों ने अपना दावा ठोका था. इनमें से केवल सात उम्मीदवारों का नामांकन ही चुनाव आयोग की जांच प्रक्रिया से पास हो पाया. सात उम्मीदवार, PM Narendra Modi को मिलाकर हैं. लेकिन वो छह कौन हैं? जो PM Modi को चैलेंज दे रहे हैं.
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1991 के बाद से भाजपा सात बार ये सीट जीत चुकी है. केवल 2004 में कांग्रेस के राजेश कुमार मिश्रा ने उनकी स्ट्रीक बिगाड़ दी थी. नरेंद्र मोदी की सीट कहे जाने से पहले भाजपा के दिग्गज नेता मुरली मनोहर जोशी ने ये सीट भाजपा के लिए जीती थी. साल 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पहली बार वाराणसी से चुनाव लड़ा और प्रधानमंत्री बने. उन्हें क़रीब 3.72 लाख वोट, 56.37% वोट शेयर मिला था. दूसरे नंबर आम आदमी पार्टी के टिकट से अरविंद केजरीवाल थे.
जब 2019 में मोदी फिर से इस सीट से जीते और उनकी सरकार वापस सत्ता में लौटी, तो उनकी जीत का अंतर बढ़ गया. 4.59 लाख वोट और 63.6% वोट शेयर. दूसरे नंबर पर समाजवादी पार्टी की शालिनी यादव थीं.
यहां अधिकांश वोटर अगड़ी जातियों के हैं. ब्राह्मण, भूमिहार और जायसवाल, ये सब. इसके बाद मुस्लिम और OBC समुदाय की तादाद है.
1. कांग्रेस (INDIA) - अजय रायक्षेत्र के पुराने नेता हैं. मज़बूत नेता की छवि है. पांच बार के विधायक हैं. चार बार कोलासला सीट से और एक बार पिंडरा से. कोलासला से तीन बार वो भाजपा के टिकट पर चुने गए थे, और एक बार निर्दलीय. कांग्रेस के हर प्रदेश कार्यक्रम में अगुवा रहते हैं. इस समय पार्टी के यूपी के चीफ हैं. राज्य में उनके ख़िलाफ़ कई मामले हैं. उनके एफ़िडेविट के मुताबिक़, कुल 18 केस.
अजय राय ने सपा के टिकट से 2009 में और कांग्रेस के टिकट से 2014 और 2019 के चुनाव भी इसी सीट से लड़ा था और बुरी तरह हारे थे. हर बार दोनों बार तीसरे नंबर पर रहे. लेकिन इस दौड़ में 'सेकेंड पोज़िशन' का सबसे प्रत्याशित चेहरा बन गए हैं.
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2. बसपा - अथर जमाल लारीवाराणसी के एक करघे के कारोबारी हैं. 60 के दशक से ही समाजवादी राजनीति से जुड़े हुए हैं. हालांकि, कोई चुनाव जीता नहीं.
इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक़, अथर छात्र जीवन के समय से ही राजनीति में सक्रिय थे. साल 1971 में गोरखपुर के DAV इंटर कॉलेज में यूनियन चुनाव जीता था. इमरजेंसी के दौरान अंडरग्राउंड हो गए थे. जब 1977 में जनता पार्टी बनी, तो पार्टी जॉइन कर ली और पार्टी में अलग-अलग पदों पर रहे.
साल 1984 में पहला लोकसभा चुनाव लड़ा. जनता पार्टी के टिकट पर. मगर हार गए. इसके बाद 1991 में उन्होंने जनता दल के टिकट से वाराणसी कैंट से चुनाव लड़ा और भाजपा की ज्योत्सना श्रीवास्तव से मात्र 5,000 वोटों से हार गए. जनता दल के विघटन के बाद लारी ने 1995 में सोने लाल पटेल के नेतृत्व वाली अपना दल जॉइन कर ली. वहां उन्हें राज्य प्रभारी बना दिया गया. साल 2004 में उन्होंने अपना दल के टिकट से वाराणसी से लोकसभा चुनाव लड़ा. हार गए. तीसरे नंबर पर रहे.
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इसके बाद 2012 में मुख़्तार अंसारी की 'कौमी एकता दल' से टिकट मिला और वाराणसी (दक्षिण) विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ा. फिर तीसरे नंबर पर रहे. 2022 के विधानसभा चुनाव में सपा का समर्थन किया. लेकिन चुनाव के बाद वो बसपा में शामिल हो गए.
3. अपना दल (कमेरावादी) - गगन प्रकाश यादवगगन प्रकाश यादव कई सालों से अपना दल में ही हैं. और उन्होंने हमेशा छात्रों और किसानों के हितों का प्रतिनिधित्व किया है. कुछ दिन पहले एक सड़क दुर्घटना में अपने भाई को खोने के बाद से उनका अभियान रुका हुआ है.
4. युग तुलसी पार्टी - कोलिसेट्टी शिव कुमारमूलतः हैदराबाद के रहने वाले. शिव कुमार तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम के पूर्व-बोर्ड सदस्य हैं. आंध्र प्रदेश का एक ट्रस्ट, जो तिरुमाला वेंकटेश्वर मंदिर का प्रबंधन करता है. शिव कुमार और युग तुलसी पार्टी कुछ महीने पहले ख़बरों में थे, क्योंकि भारत राष्ट्र समिति (BRS) ने इनके ख़िलाफ़ शिकायत दर्ज करवाई थी कि उनकी पार्टी के रंग-झंडे और सिम्बल्स काफ़ी मिलती-जुलते हैं.
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मीडिया को उन्होंने बताया कि उन्होंने जीवन भर गो संरक्षण पर काम किया है और हैदराबाद में तीन गौशालाओं के मालिक हैं. गाय को भारत का राष्ट्रीय पशु घोषित करो – ये उनके हिसाब से सबसे बड़ा मुद्दा है.
5. निर्दलीय - संजय कुमार तिवारीनई दिल्ली में रहने वाले एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं. उनका दावा है कि वो कामगारों और मज़दूरों के कल्याण के लिए आंदोलनों का हिस्सा रहे हैं. चुनाव लड़ने के अपने फैसले पर तिवारी ने कहा,
6. निर्दलीय - दिनेश कुमार यादवमैं गांधीवादी दर्शन का पालन करता हूं... मैंने वाराणसी से चुनाव लड़ने का फैसला किया क्योंकि मैं पीएम मोदी का आलोचक हूं.
सिकरौल से तीन बार के पार्षद रहे हैं. पिछले 15 सालों से राजनीति में सक्रिय हैं बताया जा रहा है कि दिनेश कुमार नामांकन दाख़िल करने तक भाजपा के साथ थे, और फिर देश के लोकतांत्रिक सिद्धांतों के तहत चुनाव लड़ने का फैसला किया.
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