लोकसभा चुनाव के आखिरी चरण का प्रचार खत्म होने के बाद प्रधानमंत्री मोदी कन्याकुमारी में हैं. उनके शेड्यूल के मुताबिक प्रधानमंत्री कन्याकुमारी के विवेकानंद रॉक मेमोरियल में दो दिन ध्यान करेंगे. उनके इस पूरे कार्यक्रम पर विपक्ष ने आपत्ति जताई है. कांग्रेस के प्रतिनिधिमंडल ने निर्वाचन आयोग से शिकायत की है. उसका कहना है कि PM मोदी के मौन व्रत की घोषणा करना प्रचार या खुद को प्रसारित करने का तरीका है. और ये आदर्श आचार संहिता का 'उल्लंघन' है.
क्या पीएम मोदी का ध्यान लगाना आचार संहिता का उल्लंघन है? नियम क्या कहते हैं?
प्रधानमंत्री मोदी के ध्यान कार्यक्रम पर विपक्ष ने आपत्ति जताई है. कांग्रेस के प्रतिनिधिमंडल ने निर्वाचन आयोग से शिकायत की है. कांग्रेस का कहना है कि PM के मौन व्रत की घोषणा करना प्रचार या खुद को प्रसारित करने का तरीका है. और ये आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन है.

CPI(M) ने मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार को एक पत्र लिखा है. उन्होंने PM के मेडिटेशन के दौरान इससे जुड़ी खबरों के प्रसारण पर रोक लगाने की मांग की है. इससे पहले राजद के राज्यसभा सांसद मनोज झा भी ये बात कह चुके हैं कि प्रधानमंत्री को ध्यान करना है तो करें, मगर कैमरे साथ लेकर ना जाएं.
दरअसल, 1 जून को होने वाले सातवें और आखिरी चरण के लिए चुनाव प्रचार 30 जून की शाम को थम गया. अब वोटिंग तक किसी भी पार्टी का कोई नेता प्रचार नहीं कर सकता. चाहे वह प्रधानमंत्री हों या कोई सामान्य कार्यकर्ता. मॉडल कोड ऑफ कंडक्ट के हिसाब से मतदान के दिन से 48 घंटे पहले चुनाव प्रचार बंद हो जाता है. तो आज चुनाव प्रचार खत्म करके प्रधानमंत्री कन्याकुमारी चले गए. अब इसी बात को लेकर राजनीति गर्म है कि प्रधानमंत्री ध्यान करें लेकिन मतदान होने से पहले उन्हें मीडिया में दिखाया ना जाए.
इलेक्शन कमीशन की वेबसाइट पर चुनाव को लेकर मॉडल कोड ऑफ कंडक्ट जारी किया जाता है. इसका पहला सेक्शन है जनरल कंडक्ट. इस सेक्शन में उन नियमों को बताया गया है जिनका राजनीतिक पार्टियों, नेताओं और उम्मीदवारों को चुनाव प्रचार के दौरान पालन करना होता है. इसी में चौथा बिंदु कहता है,
“सभी दलों और उम्मीदवारों को पूरी इमानदारी से उन सभी कृत्यों को नहीं करना चाहिए जो कानून के मुताबिक भ्रष्ट आचरण या अपराध माने जाते हैं. जैसे मतदाताओं को रिश्वत देना, डराना-धमकाना, किसी और के बदले मतदान करवाना, मतदान केंद्रों के 100 मीटर के भीतर प्रचार करना, मतदान खत्म होने से 48 घंटों की अवधि के दौरान सार्वजनिक बैठकें आयोजित करना, और मतदाताओं को पोलिंग बूथ तक लाना-ले जाना.”
ध्यान लगा कर प्रधानमंत्री किसी तरह के चुनाव प्रचार में तो भाग नहीं ले रहे. ना ही ऐसा कुछ करने जा रहे जो मॉडल कोड ऑफ कंडक्ट का उल्लंघन हो. लेकिन इस बात में संदेह नहीं है कि उनकी हर गतिविधि को टेलीविज़न चैनलों पर दिखाने की होड़ जरूर रहेगी. और विपक्ष इसी बात का आरोप लगा रहा है कि अगर प्रधानमंत्री मोदी टीवी पर दिखेंगे तो चुनाव पर इसका असर पड़ेगा.
मॉडल कोड ऑफ कंडक्ट में जो 48 घंटे पहले चुनाव प्रचार खत्म करने की बात कही गई है वो दरअसल, रिप्रज़ेंटेशन ऑफ द पीपल एक्ट (RPA), 1951 के सेक्शन 126 का अनुपालन है. RPA का सेक्शन 126 कहता है कि मतदान समाप्ति के लिए निर्धारित समय से लेकर 48 घंटे की अवधि के दौरान सार्वजनिक सभाओं पर प्रतिबंध रहेगा. इस सेक्शन के सब-सेक्शन (1) में राजनीतिक दल और उम्मीदवार इस 48 घंटे की अवधि में क्या नहीं कर सकते, इसे विस्तार से बताया गया है.
सेक्शन 126(1) के मुताबिक, कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं कर सकता-
- चुनाव के संबंध में कोई सार्वजनिक बैठक करना या जुलूस निकालना, उसमें भाग लेना, उसे संबोधित करना.
- सिनेमा, टेलीविजन या अन्य उपकरणों के माध्यम से जनता के समक्ष कोई चुनाव संबंधी सामग्री प्रदर्शित करना.
- किसी मतदान क्षेत्र में वोटिंग से पहले 48 घंटे की अवधि के दौरान जनता को आकर्षित करने के इरादे से कोई संगीत समारोह या नाट्य प्रदर्शन या अन्य मनोरंजन कार्यक्रम आयोजित करके या उसके आयोजन की व्यवस्था करके जनता के बीच कोई चुनाव संबंधी सामग्री का प्रचार करना.
सेक्शन 126 के सब-सेक्शन (2) के मुताबिक इसका उल्लंघन करने पर दो साल की सजा, जुर्माना या दोनों हो सकता है.
लेकिन ये कानून बने थे 1951 में. तब इंटरनेट छोड़िए, मोबाइल फोन तक नहीं होता था. तब से अब तक राजनीतिक, सामााजिक, आर्थिक और तकनीकी तौर पर देश में बड़े बदलाव हो चुके हैं. यहां सबसे महत्वपूर्ण तकनीकी क्षेत्र है. खासतौर पर पिछले एक दशक में टेलीविजन और सोशल मीडिया ने चुनाव और चुनाव प्रचार दोनों को कई मायनों में बदल दिया है.
लोकसभा चुनाव हो या बड़े राज्यों में विधानसभा चुनाव, मतदान कई चरणों में होता है. हर चरण के मतदान से कुछ घंटे पहले चुनाव प्रचार खत्म हो जाता है. लेकिन उस क्षेत्र में जहां मतदान होना है, जहां अगले चरणों में मतदान होने हैं, वहां चुनाव प्रचार चलता रहता है. जिसका लाइव टेलीकास्ट टीवी और सोशल मीडिया पर भी होता है. यहां तक कि वोटिंग के दौरान भी नेताओं की रैलियों का सीधा प्रसारण चलता रहता है. इंटरव्यू चलते रहते हैं.
ऐसी परिस्थिति में क्या किया जाए, इसको लेकर चुनाव आयोग ने साल 2018 में उमेश सिन्हा कमेटी बनाई. कमेटी ने 10 जनवरी, 2019 को अपनी रिपोर्ट निर्वाचन आयोग को सौंपीं. 15 मार्च, 2019 को निर्वाचन आयोग ने रिपोर्ट के आधार पर कुछ दिशा निर्देश जारी किए. जिनमें कहा गया-
- सभी नेता और प्रचारक RPA के सेक्शन 126 के मुताबिक साइलेंस पीरियड का पूरा ध्यान रेखेंगे. इस बात का भी पूरा ध्यान रखा जाए कि नेता और कार्यकर्ता किसी भी गतिविधि से सेक्शन 126 के किसी भी सेक्शन का उल्लंघन ना करें.
- कई चरणों वाले मतदान में ऐसा होगा कि कुछ सीटों पर चुनाव प्रचार थम जाएगा जबकि कुछ पर चलता रहेगा. ऐसी स्थिति में इस अवधि के दौरान जहां चुनाव प्रचार रुक गया है वहां के उम्मीदवारों के लिए प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष के तौर पर प्रचार नहीं किया जाएगा.
- चुनाव प्रचार थमने के बाद स्टार प्रचारक और नेता न तो रैली को संबोधित करेंगे न ही प्रेस कॉन्फ्रेंस और न ही चुनाव को लेकर इंटरव्यू देंगे.
अब सवाल ये है कि उमेश सिन्हा कमेटी की सिफारिश के आधार पर निर्वाचन आयोग ने जो दिशा-निर्देश जारी किए हैं उनमें से प्रधानमंत्री किसी का उल्लंघन कर रहे हैं या नहीं.
इसका जवाब हर पक्ष अपने हिसाब से देगा. यहां गौरतलब है कि पीएम मोदी ऐसा पहली बार नहीं कर रहे हैं. 2019 के लोकसभा चुनाव खत्म होने के बाद भी वह केदारनाथ में ध्यान करने गए थे. इस बार कन्याकुमारी में ध्यान कर रहे हैं. पिछली बार भी उनकी ध्यान करते हुए तस्वीरें सामने आई थीं. हालांकि, खबर लिखे जाने तक कन्याकुमारी से ध्यान करते हुए पीएम मोदी की तस्वीर नहीं आई है.
लेकिन इस पूरे विवाद में 2022 की निर्वाचन आयोग की एक टिप्पणी पर गौर करने की जरूरत है. 14 फरवरी, 2022 को द प्रिंट पर छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक निर्वाचन आयोग ने इस 48 घंटे के साइलेंस पीरियड पर राजनीतिक पार्टियों को प्रतिबद्धताएं याद दिलाई थीं. तब यूपी, उत्तराखंड, पंजाब समेत देश के पांच राज्यों में चुनाव चल रहे थे. चुनाव आयोग ने कहा था,
"टीवी/रेडियो चैनल और केबल नेटवर्क/इंटरनेट वेबसाइट/सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि 48 घंटे की अवधि के दौरान उनके द्वारा प्रसारित सामग्री में किसी उम्मीदवार के विचार या अपील सहित कोई भी सामग्री शामिल न हो, जिससे किसी विशेष पार्टी या उम्मीदवार(ओं) की संभावना को बढ़ावा मिले/पूर्वाग्रहित करने या चुनाव के परिणाम प्रभावित हों."
तो कन्याकुमारी में प्रधानमंत्री मोदी का ध्यान और उसका प्रसारण किया जाना निर्वाचन आयोग की इन गाइडलाइन्स का उल्लंघन है या नहीं ये तो आयोग ही तय करेगा. लेकिन यह स्थिति महाभारत के अश्वथामा जैसी जरूर लगती है-
‘अश्वत्थामा हतः इति नरो वा कुंजरो वा’.
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