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साइप्रस में क्या खोज रहे हैं पीएम मोदी? 6 पॉइंट में समझिए तुर्की की नींद उड़ाने वाली इंडियन चाल

PM Modi Cyprus Visit: PM मोदी की इस यात्रा के कई कूटनीतिक मायने निकाले जा रहे हैं. साइप्रस हमेशा से भारत का समर्थक रहा है. इसके इतर साइप्रस भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है? और Turkey का इससे क्या रिलेशन है? आइए जानते हैं.

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साइप्रस कई मायनों में भारत के लिए भरोसेमंद साबित हुआ है (फोटो: इंडिया टुडे)

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की साइप्रस यात्रा सुर्खियों में है. पिछले 20 सालों में किसी भारतीय प्रधानमंत्री की ये पहली साइप्रस यात्रा है (PM Modi Cyprus Visit). जिसके कई कूटनीतिक मायने निकाले जा रहे हैं. राजनीतिक विशेषज्ञ इसे तुर्किए पर कूटनीतिक दबाव बनाने की रणनीति बता रहे हैं. जिसने पिछले महीने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान का समर्थन किया था (India-Turkey Relations). इसके इतर साइप्रस भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है? और तुर्किए का इससे क्या रिलेशन है? बताते हैं.

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1. भारत के प्रति दोस्ताना नीति

PM मोदी साइप्रस के राष्ट्रपति निकोस क्रिस्टोडौलिडेस के निमंत्रण पर साइप्रस की यात्रा पर हैं. पिछले 40 सालों में साइप्रस की केवल दो यात्राएं हुई हैं. 1982 में इंदिरा गांधी की और 2002 में अटल बिहारी वाजपेयी की. प्रधानमंत्री की ये यात्रा दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने की एक कोशिश है. साइप्रस हमेशा से भारत का समर्थक रहा है. खासकर कश्मीर मुद्दे पर. साइप्रस पाकिस्तानी और इस्लामी संगठनों के भारत-विरोधी प्रस्तावों का समर्थन नहीं करता. तुर्किए के उलट, साइप्रस ने भारत के सुरक्षा-हितों को हमेशा स्वीकार किया है.

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2006 में लेबनान युद्ध के दौरान साइप्रस ने वहां फंसे भारतीयों को निकालने में अहम भूमिका निभाई थी. इसे 'ऑपरेशन सुकून' नाम दिया गया था. इसके बाद 2011 में लीबिया गृहयुद्ध के दौरान भारतीयों को बाहर निकालने में मदद की थी. जिसे 'ऑपरेशन सेफ होमकमिंग' नाम दिया था.

2. तुर्किए-साइप्रस संघर्ष 

साइप्रस पूर्वी भूमध्य सागर में एक द्वीप है. जो तुर्किए और सीरिया के करीब है. भौगोलिक रूप से देखा जाए तो एशिया में होने के बावजूद यह यूरोपीय संघ (EU) का सदस्य है. तुर्किए-साइप्रस के बीच संघर्ष को समझने के लिए हमें इसके इतिहास पर एक नजर डालनी होगी. इस द्वीप को 1960 में ब्रिटिश शासन से स्वतंत्रता मिली. इसके दो प्रमुख समुदायों, ग्रीक साइप्रस और तुर्किए साइप्रस ने एक साझेदारी में एक सत्ता स्थापित की. जो मात्र तीन साल बाद ही हिंसा में बदल गई और संयुक्त राष्ट्र शांति सेना बुलानी पड़ी.

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इसके बाद 1974 में, ग्रीक साइप्रस ने इस द्वीप को ग्रीस में विलय करने के लिए तख्तापलट किया. फिर तुर्किए ने आक्रमण किया. तुर्किये ने 1974 में साइप्रस के एक भाग पर अवैध कब्जा करके नॉर्थ साइप्रस नाम दिया था. जिसके बाद से वह पाकिस्तान की मदद से ‘नॉर्थ साइप्रस’ को मान्यता दिलाने की कोशिश कर रहा है. पाकिस्तान ने भी हाल ही में कश्मीर के मुद्दे पर ‘नॉर्थ साइप्रस’ का जिक्र भी किया था.

3. दोनों देशों के साथ भारत के संबंध

भारत-साइप्रस संबंधों पर विदेश मंत्रालय की विज्ञप्ति में कहा गया है कि साइप्रस "भारत के भरोसेमंद मित्रों में से एक है." विदेश मंत्रालय की तरफ से जारी किए गए बयान में कहा गया है, 

साइप्रस, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) के स्थायी सदस्य के रूप में भारत की उम्मीदवारी का समर्थन करता है. इसने NSG और IAEA के भीतर भारत-अमेरिका सिविल न्यूक्लियर एग्रीमेंट के लिए भी अपना पूरा समर्थन दिया है. जो भारत को अपनी बढ़ती ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में मदद करता है.

दूसरी तरफ, तुर्किए ने न केवल कश्मीर मामले पर पाकिस्तान का समर्थन किया है, बल्कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान, पाकिस्तान ने भारत पर जिन ड्रोनों से हमला किया, उनमें से कई ड्रोन्स तुर्किए के थे. इसके अलावा, तुर्किए ने हमेशा से भारत को UNSC का स्थायी सदस्य बनने को लेकर विरोध किया है.

4. IMEC का एक महत्वपूर्ण पड़ाव

तुर्की वाला पहलू एक घड़ी छोड़ भी दें. तब भी साइप्रस कई मायनों में भारत के लिए भरोसेमंद साबित हुआ है. साइप्रस, भूमध्य सागर और यूरोप का एंट्री गेट है. भूमध्य सागर में साइप्रस की पकड़ मजबूत है. इसलिए इसकी भौगोलिक स्थिति इसे भारत-मिडिल-ईस्ट-यूरोप-आर्थिक गलियारे (IMEC) का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनाती है. इस आर्थिक गलियारे से भारत को कई लाभ मिलने की उम्मीद है. मिडिल ईस्ट के माध्यम से भारत और यूरोप के बीच व्यापार और संपर्क को बढ़ावा मिलेगा. 

ये भी पढ़ें: कश्मीर पर भारत के खिलाफ बोलने वाले तुर्किए की कहानी

5. यूरोपीय संघ में भारत की वकालत

साइप्रस, यूरोपीय संघ (EU) का सदस्य है और 2026 में वह यूरोपीय संघ की परिषद की अध्यक्षता करने वाला है. चूंकि भारत यूरोप के साथ मजबूत व्यापार और सुरक्षा संबंध बनाना चाहता है. इसलिए साइप्रस, भारत का एक महत्वपूर्ण सहयोगी हो सकता है. इसके अलावा राष्ट्रपति निकोस यूरोपीय संघ के भीतर भारत के हितों की वकालत करने में अहम रोल निभा सकते हैं. चाहें वो कश्मीर का मुद्दा हो या सीमा पर आतंकवाद का मुद्दा .

6. भू-राजनीतिक दबाव और संतुलन

साइप्रस यात्रा के जरिए भारत ने यह संकेत दिया कि वह तुर्किए-विरोधी गुट, खासकर ग्रीस, इज़राइल, मिस्र और साइप्रस के साथ निकटता बढ़ा सकता है. साथ ही भारत, ईस्ट भूमध्यसागर के ऊर्जा हितों में भी भागीदार बनना चाहता है. ये वही क्षेत्र है जहां तुर्किए के साइप्रस से समुद्री अधिकार को लेकर गंभीर विवाद हैं.

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