‘अस्पतालों में जगह नहीं बची है. एंबुलेंस की कतारें बाहर खड़ी हैं. मरीज़ पांव पकड़कर गिड़गिड़ाते हैं. जान बचाने की गुहार लगाते हैं. और, फिर फ़र्श पर तड़पते हुए जान छोड़ देते हैं. इस बेबसी पर हमें ख़ूब रोना आता है. मगर हमारे हाथ में कुछ नहीं है. अब तो हमारे आंसू भी सूख गए हैं.’ये डॉक्टरों के बयान हैं. उन डॉक्टरों के, जो कोरोना महामारी के ख़िलाफ़ जंग लड़ रहे हैं. उस देश में, जहां संक्रमण का ग्राफ़ लगातार ऊंचा हो रहा है. लोग बेमौत मर रहे हैं. एंबुलेंस, बिस्तर, दवा के इंतज़ार में. ऐसा ही हश्र कई नर्सों और डॉक्टरों का भी हुआ. जो लोग खोखले हो चुके हेल्थ सिस्टम में हवा भर रहे थे, उन्हें अपने हिस्से का इलाज तक नसीब नहीं हो सका.
जब देश में हालात इस कदर तक बिगड़ चुके थे, तब वहां का सत्ताधीश क्या कर रहा था? अपने लोगों को बचाने के लिए क्या कदम उठा रहा था? वो लोगों की नज़रों से ओझल हो चुका था. पूरे दो हफ़्ते तक उसकी कोई खोज-ख़बर तक नहीं आई. बस कुछ अफ़वाहें उड़ीं.
कि उसे दिल का दौरा पड़ा है. और, उसका इलाज चल रहा है. कि सिंगापुर में है. वहां उसकी मौत हो गई. कि वो कोरोना वायरस से लड़ाई के लिए कोई बड़ा प्लान तैयार कर रहा है.
ये सारी अफ़वाहें झूठी थीं. ये बताने के लिए नुमाइंदों ने तस्वीरें जारी की. जिनमें सत्ताधीश बीमार जनता को मुंह चिढ़ा रहा था. वो गोल्फ़ खेल रहा था. बाइक चला रहा था. बड़े सुकून से जॉगिंग के मज़े ले रहा था. मानो देश में बहारें आईं हो.

फ़िलीपींस में संक्रमण का ग्राफ़ लगातार ऊंचा हो रहा है. (तस्वीर: एपी)
जनता ने दिल पर पत्थर रखकर उम्मीदें बांधीं. उन्हें लगा छुट्टी से वापस लौटने के बाद वो सब ठीक कर देगा. लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ. वापस आकर उसने कहा,
‘हम इस मामले में कुछ नहीं कर सकते, इस बीमारी से अभी और लोग मरेंगे.’ये सब किस देश में हो रहा है?
फ़िलीपींस में इन दिनों एक ऑनलाइन पिटीशन चल रहा है. हज़ारों लोग इसपर साइन कर चुके हैं. इन लोगों की मांग है कि राष्ट्रपति रोड्रिगो दुतेर्ते अपने पद से इस्तीफा दें. क्यों? लोगों का कहना है कि फ़िलीपींस बर्बादी के मुहाने पर खड़ा है. जिस दौर में उनकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी, उसी मौके पर वो असफ़ल रहे. दुतेर्ते ने देश को फ़ेल किया है.
इन आरोपों में काफी हद तक सच्चाई भी है. राष्ट्रपति दुतेर्ते महामारी के बीच में कई बार छुट्टियां मनाने निकले. जानकार बताते हैं कि राष्ट्रपति ने कभी कोरोना को गंभीरता से लिया ही नहीं. न तो उन्होंने टेस्टिंग पर ध्यान दिया और न ही कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग पर. उनकी कोविड रिस्पॉन्स टीम में ऐसे लोग रखे गए, जिन्हें विषय की कोई जानकारी नहीं थी. उदाहरण के लिए, कोविड टेस्टिंग के मुखिया पेशे से अर्थशास्त्री हैं. उनका मानना है कि ज्यादा लोगों की टेस्टिंग करने का कोई फायदा नहीं है. जिन्होंने सरकार की ख़राब नीतियों का विरोध किया, उन्हें टीम से बाहर निकाल दिया गया.
पिछले साल उनके पास इंफ़्रास्ट्रक्चर पर काम करने का मौका था. लेकिन उसे भी गंवा दिया गया. इसका असर अब देखने को मिल रहा है. कोरोना की दूसरी लहर ने फिलीपींस को ज़मीन पर पटक दिया है. पूरा हेल्थ सिस्टम ईश्वर के भरोसे पर है. हालत यहां तक पहुंच गई है कि नए बेड तैयार करने की संभावना भी नहीं के बराबर है. वजह है, नर्सों और डॉक्टरों का पलायन. अल जज़ीरा की रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले साल जनवरी से अक्टूबर के बीच लगभग 10 हज़ार नर्सों ने देश छोड़ दिया. कम सैलरी और बेसिक सुविधाओं की कमी के कारण. सरकार इन्हें रोकने में असफ़ल रही. अगर आज के दिन मरीज़ों के लिए नए बेड बना भी दिए गए तो उनकी देखभाल के लिए नर्सें नहीं होंगी.
अब जबकि पूरी दुनिया वैक्सीन के दौर में पहुंच चुकी है. फ़िलीपींस यहां पर भी पीछे छूट चुका है. रोज़ाना संक्रमण के दस हज़ार से अधिक मामले सामने आ रहे हैं. अस्पतालों पर भयानक दबाव है.

फ़िलीपींस के राष्ट्रपति रोड्रिगो दुतेर्ते. (तस्वीर: एपी)
मेडिकल एक्सपर्ट्स बार-बार वैक्सिनेशन की रफ़्तार बढ़ाने पर ज़ोर दे रहे हैं. लेकिन फ़िलीपींस को अभी शून्य से शुरुआत करनी है. अभी तक बस एक फ़ीसदी आबादी को वैक्सीन की कम-से-कम एक डोज लगाई जा सकी है. फ़िलीपींस की निर्भरता चीनी वैक्सीन सिनोवैक पर है. हालांकि, साउथ चाइना सी में दोनों देशों के बीच तनाव चल रहा है. ऐसे में सिनोवैक की सप्लाई धीमी पड़ सकती है. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, दुतेर्ते ने रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से संपर्क साधा है. फ़िलीपींस स्पूतनिक-फ़ाइव वैक्सीन के आयात पर विचार कर रहा है.
ये तो हुई वैक्सीन डिप्लोमैसी की बात. जब बात बनेगी तब बनेगी. फिलहाल, बहुत कुछ बिगड़ रहा है. जिसे संभालना सरकार के हाथ में है. ज़रूरत है एक ऐसी सरकार की, जिसके सीने में असली वाला दिल धड़कता हो.

साउथ चाइना सी. (गूगल मैप्स)
फ़िलीपींस के बाद हम चलते हैं अफ़्रीका की तरफ
यहां एक देश है साउथ सूडान. दुनिया के सबसे ग़रीब मुल्क़ों में से एक. यहां से कोरोना वैक्सीन की 60 हज़ार डोज़ की बर्बादी की ख़बर आई है. ऐसा क्यों हुआ? क्योंकि जब तक इन वैक्सीन्स का इस्तेमाल किया जाता, तब तक ये एक्स्पायर हो चुकी थीं. ऑक्सफ़ोर्ड-एस्ट्राज़ेनेका वैक्सीन की एक्सपायरी की डेडलाइन छह महीने की है. मार्च 2021 में साउथ सूडान को अफ़्रीकन यूनियन की तरफ से 60 हज़ार खुराक दी गई थी. उस वक़्त इसकी एकस्पायरी में दो हफ़्तों का वक़्त बचा था.
सरकार के पास लॉजिस्टिक्स की कमी थी. कहा गया कि एक महीने बाद वैक्सिनेशन ड्राइव शुरू किया जाएगा. ऐसे में पहले से पहुंची वैक्सीन का कोई मतलब नहीं रह गया. अब खराब हो गई वैक्सीन्स को डिस्पोज़ करने की तैयारी चल रही है. अभी तक साउथ सूडान में कोरोना संक्रमण के 10,475 मामले सामने आए हैं. इनमें से 114 लोगों की मौत हो चुकी है. एक तरफ वैक्सीन की बर्बादी, वहीं दूसरी तरफ वैक्सीन की कमी ने हालात बिगाड़ रखे हैं.

साउथ सूडान में कोविड से अब तक 114 लोगों की मौत हो चुकी है. (तस्वीर: एपी)
कनाडा कोरोना संक्रमण की तीसरी दौर का सामना कर रहा
यहां सबसे ज़्यादा प्रभावित प्रांत है ओन्टारियो. सबसे अधिक आबादी वाला भी. वायरस का नया स्टेन अधिक तेज़ी से फैल रहा है. नए संक्रमण में लगभग 70 फीसदी हिस्सेदारी नए स्ट्रेन की है.
ओन्टारियो तीसरी लहर में हॉटस्पॉट बनकर उभरा है. 17 अप्रैल तक, औसतन 1 लाख में से 2,841 लोग कोरोना से संक्रमित हो चुके थे. इस बार वाली लहर में मरीज़ों को आईसीयू की ज़्यादा ज़रूरत पड़ रही है. अस्पतालों पर अचानक से दबाव बढ़ गया है. स्टाफ़्स मेंटल ट्रॉमा से जूझ रहे हैं. उन्होंने ऐसी स्थिति की कल्पना भी नहीं की थी.
कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने कहा है कि बाकी प्रांतों से हेल्थ वर्कर्स को ओन्टारियो भेजा जा रहा है. ताकि पहले से परेशान स्टाफ़्स का भार हल्का किया जा सके. इसके अलावा, वैक्सीन लगाने की उम्रसीमा भी घटाई गई है. अब 40 साल या उससे ऊपर की उम्र के लोगों को वैक्सीन लगाई जा सकेगी. इससे पहले ये लिमिट 55 वर्ष की थी.
एक्सपर्ट्स का कहना है कि अगर अभी स्थिति को काबू नहीं किया गया तो पूरा हेल्थ सिस्टम ढह जाएगा. मई तक आईसीयू में जगह नहीं बचेगी. डॉक्टर्स को ये तय करना पड़ेगा कि किसको पहले इलाज दिया जाए. इतना ही नहीं, जून तक एक दिन में 30 हज़ार तक संक्रमण के मामले सामने आ सकते हैं. अभी ये आंकड़ा लगभग पांच हज़ार प्रतिदिन का है.

कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो. (तस्वीर: एपी)
अब एक उम्मीदों वाली न्यूज़
ये ख़बर है ग्रीस से. सरकार ने कुछ देशों से आने वाले टूरिस्टों के लिए अपने दरवाज़े खोल दिए हैं. ये देश हैं- यूरोपियन यूनियन, अमेरिका, यूके, सर्बिया, सर्बिया, इजरायल और यूएई. इन देशों से आने वाले ऐसे पर्यटक, जिन्होंने वैक्सीन की डोज लगा चुकी है या जिनकी कोरोना रिपोर्ट नेगेटिव आई है, उन्हें अब क़्वारंटीन होने की ज़रूरत नहीं होगी.

ग्रीस के पर्यटन मंत्री हैरी थियोहैरिस. (तस्वीर: एपी)
11 मार्च 2021 को पर्यटन मंत्री हैरी थियोहैरिस ने इस बाबत ऐलान किया था. उन्होंने कहा था कि 14 मई से ग्रीस को पूरी दुनिया के लिए खोल दिया जाएगा. एंट्री के लिए नेगेटिव रिपोर्ट दिखानी होगी या फिर वैक्सिनेशन का प्रूफ़ देना होगा.

ग्रीस ने कुछ देशों से आने वाले टूरिस्टों के लिए अपने दरवाज़े खोल दिए हैं. (तस्वीर: एपी)
19 अप्रैल से पहले चरण में दुनिया के एक हिस्से के लिए ग्रीस को खोल दिया गया है. ग्रीस की इकोनॉमी मेें टूरिज़्म सेक्टर बहुत अहम है. देश की जीडीपी का बीस फ़ीसदी हिस्सा इसी सेक्टर से आता है. जबकि हर पांच में से एक जॉब टूरिज़्म में है. पिछले साल महामारी और सीमाबंदी की वजह से ग्रीस को भारी नुकसान उठाना पड़ा था. उम्मीद जताई जा रही है कि इस साल उस हानि को पाटने की कोशिश होगी. ऐलान के बाद होटलों की बुकिंग बढ़ गई. कई होटलों में मई और जून महीने के लिए 70 फीसदी तक की बुकिंग हो चुकी है.



















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