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जब अंधविश्वास के नाम पर 25 हजार दलित, ब्राह्मणों की जूठी पत्तलों पर लोटे

मंदिर का वीआईपी एंगल भी है. केंद्र से लेकर राज्य सरकार ने जब खड़े किए इस मैटर पर हाथ.

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फोटो - thelallantop
ऊल-जुलूल परंपराओं और अंधविश्वास का गढ़ है अपना देश. जितनी मान्यताएं उतनी मुश्किलें. चाहे कह लें पुराना रिश्ता सा है परंपराओं और अंधविश्वासों से. हमारे देश में कुछ भी हो सकता है, गाय की पूजा से लेकर बैल से नृशंसता तक. ऐसा ही कुछ होता है, कर्नाटक के एक जिले में. कर्नाटक के दक्षिण कनारा जिले में कुक्के सुब्रमन्या मंदिर है. जहां हर साल नवंबर-दिसंबर में चंपा शास्ती या सुब्रमन्या शास्ती का भव्य आयोजन होता है. इस मंदिर में नौ सिरों वाले सांप की मूर्ति है. जिसे सुब्रमन्या भगवान मानकर पूजा की जाती है.

अब जान लो शर्मनाक क्या है

हर साल जब ये आयोजन होता है तो ब्राह्मण केले के पत्ते पर खाना खाते हैं. उसके बाद दलित समाज का एक तबका उस जूठे पत्ते पर लोटता है. जिसे 'मडे स्नाना'  कहा जाता है. 2011 में 29 नवंबर के दिन 25,000 दलित, ब्राह्मणों की जूठन पर लेटे थे  और जिला प्रशासन लाचारी से देखता रहा. क्योंकि जब जिला प्रशासन ने इसे बंद कराने की कोशिश की तो उन्हें असफलता हाथ लगी थी.

अब पूछोगे भला क्यों

क्योंकि धन्ना सेठों का मानना है कि ब्राह्मण की जूठन पर लेटने से दलितों की सारी समस्याएं और बीमारियां दूर हो जाएंगी. ऐसा माना जाता है कि ब्राह्मण जब वहां खाते हैं तो वो भगवान सुब्रमन्या के प्रतिनिधि होते हैं. उनका जूठन माने भगवान का जूठन.

इस रस्म के समर्थकों का तर्क पढ़ लो

2012 में सरकार के वरिष्ठ मंत्री रहे वी.एस. आचार्य ने कहा थे कि इसे जातियों के टकराव की समस्या के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए. यह एक धार्मिक प्रथा है. जिसमें दलित के साथ ब्राह्मण भी जूठन पर लोटते हैं. सरकार को इन चीजों में दखल नहीं देना चाहिए. इस परंपरा के घनघोर समर्थक ज्योतिषशास्त्री काव्यादी जयराम आचार्य का कहना था, "जब मैं 16 साल का था, मैंने भी इस रस्म को किया था और जूठन पर लोटकर अपनी त्वचा संबंधी बीमारी को ठीक किया था."

ऐसा नहीं है कि विरोध न हुआ

2012 में सरकार के ही समाज कल्याण मंत्री  ए. नारायणस्वामी जो दलित बैकग्राउंड से आते हैं. उन्होंने कहा था, "ब्राह्मणों की जूठन पर लोटने वाले किसी जाति से हों, चाहे ब्राह्मण ही क्यों न हों. मैं इसका विरोध करता हूं क्योंकि ये छुआछूत को बढ़ावा देता है. बहुत ही बेहूदा और अवैज्ञानिक हैं." उसी साल 30 नवंबर को मैसूर के एक सामाजिक कार्यकर्ता के. एच. शिवराम को इसलिए पीटा गया था क्योंकि वो इसके विरोध में प्रदर्शन कर रहे थे. उस साल दक्षिण किनारा जिले के डिप्टी कमिश्नर एन. एस. चेनप्पा गौड़ा थे जिन्होंने कार्यकर्ताओं और साहित्यकारों के विरोध के बाद इस रस्म को प्रतिबंधित कर दिया था. लेकिन सरकार, संघ परिवार और दलितों के भारी दबाव के कारण प्रतिबंध हटाना पड़ा. तब बीजेपी की सरकार थी कर्नाटक में और दक्षिण कनारा भाजपा का गढ़ माना जाता था. मुख्यमंत्री डी. वी. सदानंद गौड़ा उस समय कर्नाटक के सीएम थे और दक्षिण कनारा से ही ताल्लुक रखते हैं. वो चाह कर भी इस परंपरा पर बैन नहीं लगा सकते थे क्योंकि मडे स्नाना के लेकर उनके मंत्रियों के अलग-अलग विचार थे. समर्थक बैन के पक्षधर न थे और विपक्षी पार्टियों की अपनी अलग डिमांड थी. गौड़ा ने कहा था - "मैं खुद भी इस रिवाज पर प्रतिबंध लगाने का पक्षधर हूं लेकिन उससे पहले इस मुद्दे पर कई लोगों के विश्वास में लेने की जरूरत है."

मंदिर का वीआईपी एंगल भी है

मंदिर का महत्व इस बात से जाना जा सकता है कि बालीवुड अभिनेत्री ऐश्वर्या राय बच्चन से लेकर क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर तक यहां दर्शन के लिए आ चुके हैं.

वैज्ञानिक आधार

साहित्यकार और एक्टिविस्ट के वाई. नारायणस्वामी कहते हैं कि सदियों पहले यह तीर्थस्थल सांपों का बसेरा हुआ करता था. और माना जाता था सांपों की बांबियों से निकलने वाले कीचड़ से बीमारी दूर होती है. तो ऐसे हुई होगी परंपरा की शुरुआत लेकिन धीरे-धीरे अगड़ी जाति के लोगों ने इस रिवाज को बदल दिया. इस मुद्दे में सिर्फ ब्राह्मणों को दोष देना गलत होगा. क्योंकि जब डिप्टी कमिश्नर एन. एस. चेनप्पा ने प्रतिबंध लगाया था. तब सरकार दबाव के साथ मलेकुडिया नाम की एक जनजाति ने भी जोर देकर बैन हटवाया था. इनका कहना था कि अगर बैन नहीं हटा तो मंदिर की तरफ से आयोजित किसी भी पूजा में इस जाति के लोग भाग नहीं लेंगे. माना जाता है कि भगवान सुब्रमन्या की मूर्ति की खोज इन्होंने ही की थी. बैंगलोर मिरर में छपी एक न्यूज के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट मडे स्नाना या थूक स्नान को खत्म करना चाहती है. लेकिन कुछ पिछड़े समुदाय के लोग इसे चलते रहने देना चाहते हैं. बी. के. भास्कर बेंडोडी जो कर्नाटक के आदिवासी बुडाकट्टू हितरक्षण वैदिक के राज्य अध्यक्ष हैं. 2016 की शुरुआत में इन्होंने राष्ट्रपति को चिट्ठी लिखकर पंरपरा को जारी रखने की अनुमति मांगी थी. अपनी चिट्ठी में भास्कर ने कहा था कि भक्त अपनी मर्जी से बिना किसी जाति के इस रिवाज को करते हैं. 2012 में कर्नाटक हाईकोर्ट ने चीफ जस्टिस विक्रमजीत सिंह और बी.वी नागराथन की अध्यक्षता में 'मडे स्नाना' रिवाज के मॉडीफाइड वर्जन मतलब 'येदे स्नान' की अनुमति दी है. जिसमें भक्त प्रसाद पर लोट सकते हैं. ये परंपरा जारी है.
(खबर इंडिया टुडे की रिपोर्ट के आधार पर.)

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