आपकी एक फिल्म का गाना याद आ रहा है. मेरे हाथ में बीड़ी है जलती हुई. अग्नि देवता हाथ में हैं इसलिए झूठ नहीं बोलूंगा. बड़ा वाहियात गाना था. बहुतै डबल मीन. और टोटली मीनिंगलेस. अंदाज फिल्म का. अमा ये खड़ा है खड़ा है खड़ा है गाना सुनते ही दिमाग में विजुअल्स चलने लगते हैं. जो कतई उस गाने के नहीं होते. हम जानते हैं कि आपका इरादा कतई हमारी भावनाएं आहत करने का नहीं था. लेकिन आज ये गाना आप नहीं रिलीज करते इसका भरोसा है. https://www.youtube.com/watch?v=9pDOSg2IBGs आपको एक सीन दिखाते हैं आपकी ही फिल्म का. आग का गोला थी ये फिल्म. सीन भी पूरा गर्मी वाला. तब बेवकूफ सेंसर बोर्ड ने इसे नहीं काटा था. सनी देओल और अर्चना पूरण सिंह को भी कोई नोटिस नहीं मिला था. काश आप उस वक्त सेंसर बोर्ड के हेड होते. https://www.youtube.com/watch?v=q01cbR4JhmQ इनके अलावा आपने एक और फौलाद, आग ही आग, आग का गोला, आंधी तूफान, मिट्टी और सोना जैसी तूफानी फिल्में बनाई हैं. जिनके बारे में मरहूम एक्टर प्राण कह गए हैं "ये दिन देखने से पहले मैं मर क्यों नहीं गया." सच है. इन फिल्मों में एक्शन, इमोशन, वाहियात रोमांस, कॉमेडी सब कुछ था. बस कॉमन सेंस की कमी थी. आपकी फिल्में उस दौर की कहानी कहती हैं जब फिल्में समाज की आइना नहीं सरकारी राशन की दुकान हुआ करती थीं. जिसमें जो भी मोटा झोंटा मिले वो लेने को आदमी मजबूर था. अफसोस कि अब ऐसा नहीं है. अब लोगों की समझ विकसित हुई है. और अच्छी समझ वाले, रिस्क लेने वाले, अच्छा सिनेमा बनाने वाले प्रोड्यूसर डायरेक्टर अस्तित्व में आ गए हैं. तो अब वो आग ही आग और आग का गोला देखने तो कोई जाएगा नहीं. आपको फिल्मों में गालियों से प्रॉब्लम है. तो आप कभी कानपुर बनारस मत जाना. लखनऊ तो कतई नहीं. वहां बहुत सलीके से गालियां खानी पड़ती हैं. लोग घर आए मेहमान से पूछते हैं "भाईसाब चाय पानी भी लेंगे या गाली से काम चल जाएगा." और वहां के नाम पर कभी फिल्म बने तो हम कभी सेंसर करने की मांग नहीं करेंगे. पक्का वाला प्रॉमिस. आपने सख्त निर्देश दे रखे हैं कि विवादित विषयों पर फिल्म नहीं बनानी हैं. तो किस विषय पर बना लें ये भी सजेस्ट कर दीजिए. सिर्फ जय संतोषी मां, गंगा जमना सरस्वती जैसी फिल्में बनाते हैं. यही ठीक रहेगा. लेकिन उसमें भी लव और किस सीन नहीं रखने हैं. नहीं तो भावना बेन आहत हो जाएंगी. तो ऑप्शन क्या बचता है फिर? आई थिंक फिर सेंसर बोर्ड की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है. कि वो सिर्फ ओ माई फ्रेंड गणेशा और बाल हनुमान जैसी फिल्में रिलीज होने दे बाकी सिनेमा जिसे देखना है वो पाकिस्तान चला जाए.निहलानी जी, टाइम मशीन में बैठ कर अपनी फिल्में सेंसर कर आइए
लल्लन ने सेंसर बोर्ड के हेड पहलाज निहलानी की फिल्में देखी हैं. उनको देखने वाले उड़ता पंजाब आने से 20 साल पहले आहत हो चुके हैं.
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फोटो - thelallantop
सेंसर बोर्ड के हेड पहलाज निहलानी जी फिल्म 'उड़ता पंजाब' की उड़ान पर ब्रेक लगाने का बहुत बहुत शुक्रिया. उसमें पंजाब के साथ जो वर्ल्ड प्ले करने की कोशिश की गई है वो नाकाबिले बर्दाश्त है. पता नहीं उस फिल्म को आपने देखा या नहीं. लेकिन फिल्म से जुड़े लोग बता रहे हैं कि फिल्म में भी पंजाब का सिर्फ ट्रेलर है. असल में पंजाब की हालत इससे भी बुरी है. वहां पाकिस्तान से ड्रग्स सप्लाई हो रही है. बॉर्डर पार से ड्रग्स लेकर उनको यहां की खुफिया जानकारी मुहैया करा देते हैं चंद लालची लोग. लेकिन ड्रग्स वग्स पर रोक लगाना फिलिम वालों का काम नहीं है. उनको बस नाच गाना लैला मजनू की लव स्टोरी में खर्च हो जाना चाहिए. यही आज के वक्त में सिनेमा की डिमांड है. उनको पता नहीं किसने बता दिया है कि फिल्में समाज का आइना हैं. तब से कुछ फिल्मकार उसमें सच्चाई दिखाने को पिले पड़े हैं. उनको पता नहीं कि हम ब्यूटी फेस और फोटो एडिटर ऐप यूज करने वाली जनरेशन में हैं. अपना असली चेहरा देख घिना जाते हैं. मत दिखाओ असलियत प्लीज. उन फिल्मकारों को सबक सिखाना आपकी जिम्मेदारी है पहलाज जी. फिल्म में सिर्फ 83 कट नहीं लगने चाहिए. बल्कि उनको बता दो जो ट्रेलर रिलीज कर दिया है वही काफी है. लेकिन उससे पहले एक रिक्वेस्ट है. आपने मनोरंजन के भूखे इंडिया को कुछ ऐसे अनमोल नगीने भेंट किए हैं अपने जमाने में कि उनको राष्ट्रीय त्रासदी कहा जा सकता है. प्लीज उनको वापस ले लो. उनको किसी भी कीमत पर सेंसर कर दो. चाहिए उसके लिए हॉलीवुड वालों से टाइम मशीन उधार लेकर आपको वापस अतीत में जाना पड़े. अभी लेटेस्ट जो हमारी आंखों से गुजरा था आपका कारनामा वो था एक इंकलाबी वीडियो. जो आपने पीएम नरेंद्र मोदी को डेडीकेट किया था. हम लोग प्यार से उसे 'मोदी काका' वीडियो कहते हैं. उसमें जो आपने फैक्चुअल एरर किए थे. जिसमें आपकी बाद में बड़ी भद्द पिटी थी वो तो याद ही होगी. स्पेस सेंटर को इंडियन सैटेलाइट बना दिया था. कहीं का ईंट कहीं का रोड़ा जोड़ कर 6 मिनट 42 सेकेंड का वीडियो पब्लिक को थोप दिया था.
आपकी एक फिल्म का गाना याद आ रहा है. मेरे हाथ में बीड़ी है जलती हुई. अग्नि देवता हाथ में हैं इसलिए झूठ नहीं बोलूंगा. बड़ा वाहियात गाना था. बहुतै डबल मीन. और टोटली मीनिंगलेस. अंदाज फिल्म का. अमा ये खड़ा है खड़ा है खड़ा है गाना सुनते ही दिमाग में विजुअल्स चलने लगते हैं. जो कतई उस गाने के नहीं होते. हम जानते हैं कि आपका इरादा कतई हमारी भावनाएं आहत करने का नहीं था. लेकिन आज ये गाना आप नहीं रिलीज करते इसका भरोसा है. https://www.youtube.com/watch?v=9pDOSg2IBGs आपको एक सीन दिखाते हैं आपकी ही फिल्म का. आग का गोला थी ये फिल्म. सीन भी पूरा गर्मी वाला. तब बेवकूफ सेंसर बोर्ड ने इसे नहीं काटा था. सनी देओल और अर्चना पूरण सिंह को भी कोई नोटिस नहीं मिला था. काश आप उस वक्त सेंसर बोर्ड के हेड होते. https://www.youtube.com/watch?v=q01cbR4JhmQ इनके अलावा आपने एक और फौलाद, आग ही आग, आग का गोला, आंधी तूफान, मिट्टी और सोना जैसी तूफानी फिल्में बनाई हैं. जिनके बारे में मरहूम एक्टर प्राण कह गए हैं "ये दिन देखने से पहले मैं मर क्यों नहीं गया." सच है. इन फिल्मों में एक्शन, इमोशन, वाहियात रोमांस, कॉमेडी सब कुछ था. बस कॉमन सेंस की कमी थी. आपकी फिल्में उस दौर की कहानी कहती हैं जब फिल्में समाज की आइना नहीं सरकारी राशन की दुकान हुआ करती थीं. जिसमें जो भी मोटा झोंटा मिले वो लेने को आदमी मजबूर था. अफसोस कि अब ऐसा नहीं है. अब लोगों की समझ विकसित हुई है. और अच्छी समझ वाले, रिस्क लेने वाले, अच्छा सिनेमा बनाने वाले प्रोड्यूसर डायरेक्टर अस्तित्व में आ गए हैं. तो अब वो आग ही आग और आग का गोला देखने तो कोई जाएगा नहीं. आपको फिल्मों में गालियों से प्रॉब्लम है. तो आप कभी कानपुर बनारस मत जाना. लखनऊ तो कतई नहीं. वहां बहुत सलीके से गालियां खानी पड़ती हैं. लोग घर आए मेहमान से पूछते हैं "भाईसाब चाय पानी भी लेंगे या गाली से काम चल जाएगा." और वहां के नाम पर कभी फिल्म बने तो हम कभी सेंसर करने की मांग नहीं करेंगे. पक्का वाला प्रॉमिस. आपने सख्त निर्देश दे रखे हैं कि विवादित विषयों पर फिल्म नहीं बनानी हैं. तो किस विषय पर बना लें ये भी सजेस्ट कर दीजिए. सिर्फ जय संतोषी मां, गंगा जमना सरस्वती जैसी फिल्में बनाते हैं. यही ठीक रहेगा. लेकिन उसमें भी लव और किस सीन नहीं रखने हैं. नहीं तो भावना बेन आहत हो जाएंगी. तो ऑप्शन क्या बचता है फिर? आई थिंक फिर सेंसर बोर्ड की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है. कि वो सिर्फ ओ माई फ्रेंड गणेशा और बाल हनुमान जैसी फिल्में रिलीज होने दे बाकी सिनेमा जिसे देखना है वो पाकिस्तान चला जाए.
आपकी एक फिल्म का गाना याद आ रहा है. मेरे हाथ में बीड़ी है जलती हुई. अग्नि देवता हाथ में हैं इसलिए झूठ नहीं बोलूंगा. बड़ा वाहियात गाना था. बहुतै डबल मीन. और टोटली मीनिंगलेस. अंदाज फिल्म का. अमा ये खड़ा है खड़ा है खड़ा है गाना सुनते ही दिमाग में विजुअल्स चलने लगते हैं. जो कतई उस गाने के नहीं होते. हम जानते हैं कि आपका इरादा कतई हमारी भावनाएं आहत करने का नहीं था. लेकिन आज ये गाना आप नहीं रिलीज करते इसका भरोसा है. https://www.youtube.com/watch?v=9pDOSg2IBGs आपको एक सीन दिखाते हैं आपकी ही फिल्म का. आग का गोला थी ये फिल्म. सीन भी पूरा गर्मी वाला. तब बेवकूफ सेंसर बोर्ड ने इसे नहीं काटा था. सनी देओल और अर्चना पूरण सिंह को भी कोई नोटिस नहीं मिला था. काश आप उस वक्त सेंसर बोर्ड के हेड होते. https://www.youtube.com/watch?v=q01cbR4JhmQ इनके अलावा आपने एक और फौलाद, आग ही आग, आग का गोला, आंधी तूफान, मिट्टी और सोना जैसी तूफानी फिल्में बनाई हैं. जिनके बारे में मरहूम एक्टर प्राण कह गए हैं "ये दिन देखने से पहले मैं मर क्यों नहीं गया." सच है. इन फिल्मों में एक्शन, इमोशन, वाहियात रोमांस, कॉमेडी सब कुछ था. बस कॉमन सेंस की कमी थी. आपकी फिल्में उस दौर की कहानी कहती हैं जब फिल्में समाज की आइना नहीं सरकारी राशन की दुकान हुआ करती थीं. जिसमें जो भी मोटा झोंटा मिले वो लेने को आदमी मजबूर था. अफसोस कि अब ऐसा नहीं है. अब लोगों की समझ विकसित हुई है. और अच्छी समझ वाले, रिस्क लेने वाले, अच्छा सिनेमा बनाने वाले प्रोड्यूसर डायरेक्टर अस्तित्व में आ गए हैं. तो अब वो आग ही आग और आग का गोला देखने तो कोई जाएगा नहीं. आपको फिल्मों में गालियों से प्रॉब्लम है. तो आप कभी कानपुर बनारस मत जाना. लखनऊ तो कतई नहीं. वहां बहुत सलीके से गालियां खानी पड़ती हैं. लोग घर आए मेहमान से पूछते हैं "भाईसाब चाय पानी भी लेंगे या गाली से काम चल जाएगा." और वहां के नाम पर कभी फिल्म बने तो हम कभी सेंसर करने की मांग नहीं करेंगे. पक्का वाला प्रॉमिस. आपने सख्त निर्देश दे रखे हैं कि विवादित विषयों पर फिल्म नहीं बनानी हैं. तो किस विषय पर बना लें ये भी सजेस्ट कर दीजिए. सिर्फ जय संतोषी मां, गंगा जमना सरस्वती जैसी फिल्में बनाते हैं. यही ठीक रहेगा. लेकिन उसमें भी लव और किस सीन नहीं रखने हैं. नहीं तो भावना बेन आहत हो जाएंगी. तो ऑप्शन क्या बचता है फिर? आई थिंक फिर सेंसर बोर्ड की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है. कि वो सिर्फ ओ माई फ्रेंड गणेशा और बाल हनुमान जैसी फिल्में रिलीज होने दे बाकी सिनेमा जिसे देखना है वो पाकिस्तान चला जाए.Add Lallantop as a Trusted Source

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