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टूटे मिट्टी के टुकड़ों वाली, दड़ी-बल्ले वाली, तार की बनी गाड़ियों वाली गर्मी की छुट्टी

मैंने जिंदगी भर एक ही काम किया, ढींढीं खेलते हुए जाल की ऊंची डाल पर पीलू खाकर नाबाद नीचे उतरा.

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फोटो - thelallantop
“गरमी में प्रात:काल पवन
कलियों को चूम सिहरता जब
तब याद तुम्हारी आती है.”
हरिवंश राय बच्चन की ये वाली कविता गूगल करके पढ लेता हूं. जब सुबह-सुबह मन में बहुत उथल-पुथल होती है, गर्मियों की छुट्टियों वाला गांव याद आ रहा होता है. गूगल करके इसलिए कि इस मचलते दिमाग में कुछ ठहरता ही नहीं. बात कहां से शुरू करूं. याद तो गर्मी की छुट्टियों की आ रही है. अभी इस नौकरी वाली लाइफ को बताऊं. या स्कूल की शुरूआत के दिनों का चिट्ठा खोलूं. या स्कूल खुलने के दिनों वाली बारिशों से नहलाऊं आपको.
Photo: Sumer Singh Rathore
Photo: Sumer Singh Rathore

चलो अभी से शुरू करता हूं. स्कूलों की छुट्टियां खत्म हो गई. बहुत सारे लोग अपना-अपना नॉस्टेल्जिया लिख रहे हैं. ये सब पढकर छुट्टियों की सारी मस्तियां बारिश की तरह झरने लगती हैं. बरगद से उतरकर घर से फरारी. भरी दोपहर चुभती धूप में खेलना, नदियों में नहाना और ना जाने कितने किस्से हैं. ऐसे ही कुछ किस्से जो अभी भी दिमाग में अटके रह गये वो सुनाता हूं.
मैं राजस्थान से हूं. धोरों वाले तपते रेगिस्तान से. गर्मी की छुट्टियों के दिनों में माने मई-जून के महीने में यहां की गर्मी खबरों में होती है. सारे पेड़-पौधे सूख जाते हैं. कोई टूरिस्ट गलती से अगर इन दिनों में दोपहर को घूमने निकल जाए तो शायद ज़िंदगी में कभी वो वापिस इस तरफ झांके भी ना. इतनी गर्मी पड़ती है यहां. इस गर्मी में भी हम सड़कों-पगडंडियों पर धमाचौकड़ी मचाए रहते थे. खूब ठंडी छाछ पीते, टपकते शहद की बूंदों को जुबान से कैच करते और कूदते रहते.
Photo: Sumer Singh Rathore
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गर्मी के दिनों में घर से निकलने की पाबंदी होती है. इस गर्मी में बच्चे तपती रेत में नंगे पांव घूमेंगे तो बीमार ही पड़ेंगे. कौन मां-बाप निकलने देगा घर से. मुझे भी दोपहर में पंखे के नीचे सुला दिया जाता था. पर मुझे तो याद नहीं आज तक कभी दोपहर में सोया होऊंगा. जब सबको नींद आ जाती दबे-पांव निकल जाता. दरवाजे से निकल नहीं सकते थे. लोहे का था. आवाज़ करेगा तो घरवाले जाग जाएंगे और डांट पड़ जाएगी. घर से सटा बरगद का पेड़ है. छत पर जाकर उसकी डालियों में लटककर उतरते और रफ्फूचक्कर. दिन भर खेलते रहते फिर लौटते वापिस जब सूरज छोटी वाली पहाड़ी के पीछे छिप रहा होता. गायें अपनी घंटियां बजाती लौट रही होती. तब हम भी उनके खुरों के निशानों पर उछलते धूल के गुबार से निकलकर थके-मैले घर लौट आते.
Photo: Sumer Singh Rathore
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इन दोपहरों में जो खेल खेलते थे उनके बारे में भी जान लीजिए-
सतोलिया: गर्मियों में सबसे ज्यादा ये वाला खेल खेलते थे. किसी के घर के आगे से चुराई पतली पत्थर की पट्टियों से बने गोल सतोलिए. पुरानी जुराब में चीथड़े भरकर सूतली से गूंथी दड़ी. ये दड़ी जब हवा में लहराती किसी की पीठ पर अच्छे से लगती थी ना. तो पांच मिनट तक बच्चा आसमान तकता रहता था अपने आंसुओं को छिपाते हुए.
खेलने के लिए ढूंढते थे कोई हल्की सी छांव वाला पेड़. हमारे खेलने के लिए एक परमानेंट नीम का पेड़ था. खेलते भी और नीम से लटककर निंबोली भी खाते रहते. रास्ते से गुजरते कुछ चाचा लोग भी खेलने के लिए साथ हो जाते फिर तो खूब मजा आता.
Photo: Sumer Singh Rathore
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थपी: ये छाया में खेला जाने वाला खेल था. खंडहरों में खेलते थे. एक लड़के पर डाई होती वो ढूंढता था बाकी सब छुप जाते. कौन ढूंढेगा यह तय करने के लिए चप्पल उछाली जाती थी. जिसकी चप्पल सबसे पहले उल्टी गिरती वो ढूंढता था. उन दिनों एक ही शर्ट में दस-दस दिन निकाल देते थे हम. तो सबको याद हो जाती किसने कैसी शर्ट पहन रखी है. कुछ लड़के चकमा देने के लिए एक-दूसरे की शर्ट चेंज कर देते थे. ढूंढने वाला शर्ट वाले की थपी करता निकलता कोई और. थपी मतलब एक जगह तय होती थी वहां जाकर थाप मार के नाम लेते थे कि फलाने की थपी.
ढींढीं: ये खूब मजेदार गेम था. हमारे यहां जाल के खूब पेड़ है. जिनपर आसानी से चढ उतर सकते है. इसमें एक लड़का पेड़ के नीचे खड़ा रहता. बाकी पेड़ पर चढ जाते. कौन नीचे खड़ा रहेगा ये जाल के पत्तों से तय होता था. मान लो आठ लड़के हैं तो आठ जाल की पत्ते लेते उनमें से एक आधा कटा होता था. उन पत्तों को आधा हाथ में छिपा दिया जाता. जिसके हिस्से कटा पत्ता आता वो नीचे खड़ा रहता. इस खेल में एक लकड़ी का टुकड़ा होता है. एक लड़का टांग के नीचे से वो टुकड़ा फेंकता. जो नीचे खड़ा होता है. वो भागकर ले आता तब तक सब जाल पर चढ जाते. फिर नीचे वाला लड़का ऊपर वाले लड़कों को छूकर लकड़ी पेड़ के तने से मारता और बोलता ढीं ढीं. जाल के पेड़ इस वक्त पीलुओं से भरे होते हैं. मैं सबसे ऊंची डाल पर चढ जाता और पीलू खाता रहता. और लास्ट में नाबाद नीचे उतरता.
Photo: Sumer Singh Rathore
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इटी-डकर: ये वही वाला खेल है जिसे सब गुल्ली-डंडा कहते हैं. ये वाला खेल शाम को खेलते थे. जब गायों को घास डालने का वक्त होता है. घास डालने के बाद गायों के पास बैठना होता है. तो वहीं आस-पास खेलते रहते. गायों की रखवाली करते हुए.
ताश: पत्ते छिपकर खेलने पड़ते थे. नहीं तो डांट पड़ती कि ताश घर का नाश. इसलिए थोड़ा डरकर खेलते थे. दोपहर में जब धूप चुभने लगती तब बरगद की छांव में बैठ जाते थे दरी बिछाकर. पता ही नहीं चलता था कि कब खेलते-खेलते रात हो गई. पता भी तभी चलता जब कोई बुलाने आता. कई बार बड़े खेल रहे होते और एक आदमी कम पड़ रहा होता तो हमें भी मौका मिल जाता था उनके साथ खेलने का.
Photo: Sumer Singh Rathore
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और भी जाने कितने खेल थे. टूटे मिट्टी के टुकड़ों वाले, दड़ी-बल्ले वाले, तार की बनी गाड़ियों वाले. फिर किसी और याद के बहाने इन खेलों की कहानियां. खेलने के अलावा इन दिनों एक और अच्छा जुगाड़ होता था. गर्मी में चिल्ल करने का. गांव के पास एक नदी है. बरसात के दिनों में उसमें पानी आ जाता था. बारिश रुकते ही नदी सूख जाती लेकिन नदी के कुछ गहरे भागों में पानी ठहरा रहता. इन्हें लोकल बोली में भे कहते हैं. नेचुरल स्वीमिंग पुल. बारिश के बाद की सारी दोपहरें वहीं काटते थे. छई-छपा-छई करते.
Photo: Sumer Singh Rathore
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रेत के बड़े-बड़े धोरे बारिश में भीगकर मुस्करा रहे होते तब उनपर खूब फिसलते थे. फिर उसी मिट्टी से बड़ी मेहनत से पूरा गांव बनाते. गीली रेत से कंगूरे और लड्डू बनाते. तब तक मिट्टी खोदते रहते जब-तक शरीर में झुरझुरी ना उठती.
काले-काले बादलों से गांव ढंका हो और बारिश ना हो रही हो तो बच्चे मिलकर डेरूं-डेरूं डेडरिया करते थे. एक अंगोछा लेते और सारे घरों से अनाज इकट्ठा करते. एक बच्चा डेडर बन जाता. डेडर माने मेढक. हर घर में उस पर पानी उड़ेल देते. और जोर-जोर से चिल्लाते कूदते रहते. डेरूं-डेरूं डेडरिया ठाला कोठा भरिज्या. मतलब टर्र-टर्र मेढक बोलने लगे हैं, अब बरखा बरसेगी. फिर उस अनाज को पानी में उबालकर चारों दिशाओं में फेंक देते. वैसे फेंकते नहीं थे. गुड़ डालकर मीठा करके खा जाते थे.
Photo: Dinesh Singh Rathore
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अब तो बस शहर में बैठे गांव को याद करते हैं. गांव चले भी जाएं तो अब वो मस्ती कहां. ये सब खेल तो अब गांव में भी नहीं होते हैं. मैं तो गांव जाता हूं तो एक-एक को खींचकर घर से बाहर निकालता हूं खेलने के लिए. बच्चों को फुरसत ही नहीं होती टीवी और मोबाइल से. अब ना तो नदी किनारे दाल-बाटी और चुरमा वाली पार्टी होती है. और ना ही चौकीदार को छेड़ते हुए छिपकर मंदिर की घंटी बजाते हैं. बस ताकते रहते हैं आसमान. कि कहीं किसी अंधेरे कोने से नज़र आ जाएं चमकते तारे.

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