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नेपाल चुनाव 2026: क्या 'Gen-Z क्रांति' के बाद हिमालय की गोद में सब कुछ बदलने वाला है?

Nepal Elections 2026: असल में नेपाल के चुनाव दिसंबर 2027 में होने थे. लेकिन सितंबर 2025 में नेपाल के युवाओं ने भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और सोशल मीडिया पर पाबंदियों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया. आंदोलन इतना बड़ा था कि ओली सरकार गिर गई और संसद भंग करनी पड़ी. अब सवाल ये है कि क्या बालेन शाह और Gen-Z क्रांति बदल देंगे नेपाल की राजनीति? और इसका भारत-चीन पर क्या असर पड़ेगा?

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नेपाल के आम चुनाव और भारत पर असर (फोटो- रॉयटर्स)

आज 5 मार्च 2026 है. नेपाल में वोट डाले जा रहे हैं. लेकिन ये कोई आम चुनाव नहीं है. ये चुनाव उस 'जन-आंदोलन III' की कोख से निकले हैं जिसने पिछले साल सितंबर 2025 में काठमांडू की सड़कों पर वो मंजर दिखाया जो शायद ही किसी ने सोचा था. 

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युवाओं के नेतृत्व वाली उस 'Gen-Z क्रांति' ने दिग्गज नेता के.पी. शर्मा ओली की सरकार को उखाड़ फेंका था. अब सवाल ये है कि क्या वोट की चोट से नेपाल अपनी तकदीर बदल पाएगा या फिर पुराने खिलाड़ी नए चेहरों को मात दे देंगे?

चुनाव क्यों हो रहे हैं? सितंबर 2025 का वो 'भूकंप'

असल में नेपाल के चुनाव दिसंबर 2027 में होने थे. लेकिन सितंबर 2025 में नेपाल के युवाओं ने भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और सोशल मीडिया पर पाबंदियों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया. आंदोलन इतना बड़ा था कि ओली सरकार गिर गई और संसद भंग करनी पड़ी. सुप्रीम कोर्ट की पूर्व मुख्य न्यायाधीश सुशीला कार्की को अंतरिम पीएम बनाया गया. 

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Nepali Gen Z
नेपाल का Gen Z प्रोटेस्ट (फोटो- आजतक)

मजे की बात ये है कि नेपाली मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक उनका नाम 'डिस्कॉर्ड' (Discord) जैसे गेमिंग प्लेटफॉर्म पर चर्चा के बाद उभरा था. अब 6 महीने के भीतर ये चुनाव कराए जा रहे हैं ताकि देश को एक स्थिर लोकतांत्रिक सरकार मिल सके.

मुख्य चेहरे: पुराने चावल बनाम नया 'रैपर'

इस बार मुकाबला बहुत दिलचस्प है. एक तरफ 74 साल के के.पी. शर्मा ओली (CPN-UML) हैं, जो अपनी वापसी की कोशिश कर रहे हैं. दूसरी तरफ युवाओं के पोस्टर बॉय बन चुके 35 साल के बालेन शाह (रैपर और काठमांडू के पूर्व मेयर) हैं, जो राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (RSP) से मैदान में हैं. 

बालेन शाह सीधे ओली के खिलाफ झापा-5 सीट से लड़ रहे हैं. इनके अलावा गगन थापा (नेपाली कांग्रेस) एक और युवा चेहरा हैं जिन्हें पीएम पद का दावेदार माना जा रहा है.

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नेतापार्टीयूएसपी (USP)
के.पी. शर्मा ओलीCPN-UMLतजुर्बा और राष्ट्रवादी छवि
बालेन शाहRSPयुवा जोश और एंटी-करप्शन चेहरा
गगन थापानेपाली कांग्रेससुधरा हुआ राजनीतिक विजन
पुष्प कमल दहल 'प्रचंड'NCPगठबंधन की राजनीति के मास्टर

स्रोत: लाइवमिंट, 'नेपाल इलेक्शन: रैपर बालेन शाह बनाम केपी ओली', 3 मार्च 2026

'इंडिया फैक्टर' और 'चाइना कार्ड': दिल्ली और बीजिंग की धड़कनें तेज

नेपाल की राजनीति में भारत और चीन हमेशा 'बैकग्राउंड म्यूजिक' की तरह रहते हैं. भारत चाहता है कि एक ऐसी सरकार आए जो द्विपक्षीय समझौतों का सम्मान करे और सीमा पर शांति बनाए रखे. वहीं, चीन की चिंता अपनी 'बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव' (BRI) परियोजनाओं को लेकर है. 

ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन’ (ORF) की रिपोर्ट के मुताबिक ओली को अक्सर चीन समर्थक माना जाता रहा है. जबकि नेपाली कांग्रेस का झुकाव भारत की ओर रहता है. लेकिन बालेन शाह जैसे नए नेता 'नेपाल फर्स्ट' की बात कर रहे हैं. जो दोनों देशों के लिए एक नई चुनौती हो सकती है.

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युवा वोटर क्या चाहते हैं? (The Gen-Z Factor)

नेपाल की 3 करोड़ आबादी में से लगभग आधी 30 साल से कम उम्र की है. इस चुनाव में करीब 1.89 करोड़ वोटर हैं, जिनमें 8 लाख से ज्यादा पहली बार वोट डाल रहे हैं. ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ की रिपोर्ट के मुताबिक, इनकी मांगें बहुत साफ हैं.

  • रोजगार: हर साल हजारों युवा काम के लिए खाड़ी देशों या भारत जाते हैं, वे इसे रोकना चाहते हैं.
  • डिजिटल आजादी: सोशल मीडिया पर किसी भी तरह का बैन उन्हें मंजूर नहीं.
  • भ्रष्टाचार मुक्ति: पोखरा एयरपोर्ट जैसे प्रोजेक्ट्स में भ्रष्टाचार के आरोपों ने युवाओं को नाराज कर दिया है.

क्या बदलेगा? नतीजा और उम्मीदें

नेपाल में 275 सीटों के लिए वोटिंग हो रही है. 165 सीटों पर सीधा चुनाव (FPTP) है और 110 पर आनुपातिक प्रतिनिधित्व. जानकारों का मानना है कि इस बार किसी एक पार्टी को बहुमत मिलना मुश्किल है, लेकिन बालेन शाह की पार्टी किंगमेकर की भूमिका में आ सकती है. 

अगर युवा चेहरों की जीत होती है, तो नेपाल की विदेश नीति और शासन व्यवस्था में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है.

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नेपाल में किसे मिलेगी सत्ता (फोटो- आजतक)
भारत के लिए इसके मायने क्या हैं?
नेपाल का चुनाव सिर्फ काठमांडू की कुर्सी का फैसला नहीं है, बल्कि यह दिल्ली के 'पड़ोसी पहले' (Neighbourhood First) मिशन का लिटमस टेस्ट भी है. भारत के लिए नेपाल सिर्फ एक देश नहीं, बल्कि 1,751 किमी लंबी खुली सीमा वाला एक 'रणनीतिक पार्टनर' है.

थिंक टैंक ‘अटलांटिक काउंसिल’ की रिपोर्ट के मुताबिक तीन वजहों से नेपाल के राजनीतिक भविष्य को लेकर भारत चिंतित है.

  • सुरक्षा की चिंता: भारत चाहता है कि नेपाल में एक ऐसी स्थिर सरकार बने जो भारत विरोधी तत्वों को अपनी जमीन इस्तेमाल न करने दे.
  • हाइड्रोपावर का खेल: भारत की दिलचस्पी नेपाल के जल विद्युत प्रोजेक्ट्स में है. अगर नई सरकार आती है, तो बिजली निर्यात के समझौतों में तेजी आ सकती है.
  • बफर स्टेट से 'ब्रिज' की ओर: युवा नेता बालेन शाह का विजन नेपाल को भारत और चीन के बीच एक 'वाइब्रेंट ब्रिज' बनाने का है.
चीन की चालें: क्या ‘बीआरआई’ को मिलेगी रफ्तार?
चीन ने हमेशा नेपाल में 'स्थिरता' के नाम पर कम्युनिस्ट पार्टियों के गठबंधन को बढ़ावा दिया है. ‘साउथ एशियन वायस’ के मुताबिक बीजिंग की नजरें इन दो चीजों पर टिकी हैं:
  1. BRI (बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव): चीन चाहता है कि उसके अटके हुए रेल और रोड प्रोजेक्ट्स को नई सरकार हरी झंडी दे.
  2. अमेरिकी प्रभाव: चीन को डर है कि नेपाल की नई युवा पीढ़ी अमेरिका की तरफ झुक सकती है, जो तिब्बत सीमा के पास बीजिंग के लिए सिरदर्द बन सकता है.

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क्या हिमालय में नया सूरज उगेगा?

नेपाल इस वक्त एक चौराहे पर खड़ा है. एक तरफ 70 साल के वो नेता हैं जिन्होंने दशकों तक राज किया, और दूसरी तरफ 'रैप' और 'सोशल मीडिया' से निकले वो युवा जो सिस्टम को रीबूट (Reboot) करना चाहते हैं. 

यदि बालेन शाह या गगन थापा जैसे नेता मजबूत होकर उभरते हैं, तो नेपाल की राजनीति में 'राष्ट्रवाद' की जगह 'परफॉरमेंस' ले लेगी. भारत के लिए यह एक मौका है कि वह पुरानी फाइलों को बंद कर नए नेपाल के साथ नए सिरे से रिश्ते बुने.

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