पत्रकार और राजनेता. सोशल मीडिया के टाइम में पत्रकारिता बुलेट ट्रेन. नेतागिरी टोयोटा रथ. नेताओं का घिरना तो तय है. पर देश में कुछ ऐसा हो रहा है कि बवंडर घूम रहा है. उसी में नेता भी हैं, अभिनेता भी. पत्रकार कौन है, पता नहीं चलता. कभी लगता है कि सभी पत्रकार हैं, कभी लगता है कि सभी नेता हैं. कभी लगता है कि पत्रकार ही नेता हैं. एकदम कंफ्यूजन की स्थिति है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी इसी जद्दोजहद की बातें कर रहे थे. पहुंचे थे रामनाथ गोयनका पत्रकारिता सम्मान समारोह में. नरेंद्र मोदी बोलने का कोई मौका छोड़ते नहीं. और यहां तो मौका ही था. ननद-भौजाई की तल्खी वाले संवादों की तरह. पहले एक पत्रकार ने मोदी के हाथ सम्मान लेने से इनकार कर दिया. वो आए ही नहीं. हालांकि विरोध करने के तरीके और भी थे. पर उनकी इच्छा. उसके बाद मोदी ने अपनी बातें कहीं. कई बातें कहीं. आइए आपके पढ़ाते हैं उनकी 5 बातें:
1.
पहले मोदी ने पत्रकारिता के उस दौर की बातें कीं, जब नेताओं के सामने पत्रकारों ने घुटने तोड़ दिए थे अपने. इमरजेंसी के दौर की. कांग्रेस की तरफ इशारा करते हुए कहा कि उस दौर में इस परिवार का हाथ जिसके सिर पर आ जाता था, वो कुछ भी कर लेता था. जिसके सिर पर नहीं था, उसका बंटाधार. फिर रामनाथ गोयनका की बात करते हुए कहा कि उस दौर में रामनाथ बेहद आक्रामक रहते थे. इमरजेंसी से खासे नाराज थे. उन पत्रकारों में से थे, जिन्होंने नेतागिरी के सामने हाथ नहीं जोड़े. ये भी कहा कि जनता के सामने मीडिया की छवि भी एक्सपोज हो गई. उसके पहले ऐसा माना जाता था कि मीडिया बहुत मजबूत है. पर ये पता चल गया कि ये लोग भी झुक सकते हैं.
फिर कहा कि इमरजेंसी के दौर को हमें देखना चाहिए. उस पर चिंतन मनन करना चाहिए. ताकि फिर देश में कोई ऐसा ना कर सके. उस दौर से हमें सीखना चाहिए. ध्यान रहे कि मौजूदा सरकार पर हमेशा आरोप लगते रहे हैं कि ये सरकार इमरजेंसी की तरफ जा रही है. मार्गदर्शक मंडल के मुखिया लाल कृष्ण आडवाणी ने भी इस पर चिंता जताई थी.
2.
नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया और इंटरनेट के बारे में भी बात की. बताया कि कैसे एक बार उनके काफिले का वीडियो एक लड़के ने उनके सामने ही बनाया और मिनटों में वो मोदी के पास आ गया. तो मोदी को उस वक्त पहली बार अहसास हुआ था सोशल मीडिया की ताकत का. बोलते हैं कि मैं भी सोचता था कि जब इनके पास न्यूज नहीं रहती है तो पुरानी खबर चलाने लगते हैं. सोशल मीडिया पर तो लगातार खबरें मिलेंगी. प्रधानमंत्री की यही अदा अच्छी लगती है. टेक्नॉल्जी को तुरंत कैच करना. तुरंत इस्तेमाल करना. तो मोदी ने आगे कहा कि अब सोशल मीडिया के चलते सरकार को समस्या हो रही है. क्योंकि कोई घटना के होते ही सेकेंडों में लोग सवाल पूछने लगते हैं. पर सरकार को काम करने में वक्त तो लगता ही है. अब हम लोग घिर जाते हैं. प्रधानमंत्री की ये बात तो सही है. पर ये स्थिति उस चीज पर लागू होती है जब किसी को कुछ अंदाजा ही ना हो. कोई दुर्घटना हो जाए. लेकिन आज के दौर में सरकारों के पास भी तो बहुत पहले से हर बात की इंफार्मेशन रहती है.
फिर प्रधानमंत्री ने ऐसी बात कही जो उनके घोर समर्थक को भी नहीं पसंद आएगी. कहा कि अब जमाना बदल गया है. एक गांववाला भी फोटो खींच के अपलोड कर सकता है और इस चक्कर में न्यूज की भरमार हो गई है. लोगों के पास इतनी न्यूज आने लगी है कि लोग अखबार खरीदते ही हैं इसलिए कि पढ़ी हुई खबर वेरिफाई कर सकें. मुझे ये नहीं पता कि आप लोग इस स्थिति से कैसे निपटेंगे.
अब बात ये है कि अब जा के जनता के पास कुछ आया है जिसकी मदद से लोग अपनी आवाज उठा पा रहे हैं. इसके पहले तक तो किसी की बात सुनने वाला ही कोई नहीं था. इसी बात की तो दिक्कत थी. अब तो ट्वीट पर भी काम होने लगे हैं. तो प्रधानमंत्री की ये झिझक अच्छी नहीं लगी.
3.
फिर उन्होंने भारतीय मीडिया पर बात की. कहा कि ऐसा क्या है कि भारतीय मीडिया वर्ल्ड क्लास नहीं हो पाया है. क्यों बाहर के न्यूज चैनलों बीबीसी और सीएनएन की तरह हमारा मीडिया अपनी हैसियत नहीं बना पा रहा है. हमें इस पर सोचने की जरूरत है. हमारे पास टैलेंट की कमी नहीं है. पर हम कर नहीं पा रहे हैं.
प्रधानमंत्री की ये बात बिल्कुल जायज है. दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के चैनल देश से बाहर जा ही नहीं पा रहे. देश में भी उन पर सवाल उठने लगे हैं. तो ये चिंता करने की जरूरत है.
4.
इसके बाद प्रधानमंत्री ने ऐसी बात कर दी जो हमें ये सोचने को विवश कर देगी कि हमारे नेता क्यों लोगों का दर्द नहीं समझ पाते. वो ये नहीं समझ पाते कि सिर्फ नई स्कीमें लाने से ही लोगों का दुख कम नहीं हो जाता. किसी भी अन्याय या किसी समस्या की जड़ में सामाजिक, आर्थिक, ऐतिहासिक कई समस्याएं होती हैं. इसीलिए तो हम लोग नेताओं को चुनते हैं कि वो सबमें साम्य बैठा के काम कर सकें. नहीं तो सिर्फ वैज्ञानिक या अफसर से ही काम नहीं चला लेते. मोदी ने कहा कि पहले एक्सीडेंट होते थे तो सिर्फ ये रिपोर्टिंग होती थी कि हां भाई, ट्रक से एक्सीडेंट हो गया है. पर अब ये आने लगा है कि बीएमडब्लयू से दलित का एक्सीडेंट हो गया है. माफ कीजिएगा, पर क्या बीएमडब्लयू चलाने वाले को पता था कि सामने दलित आ रहा है. तो ऐसी खबरों से समस्या पैदा हो जाती है.
यहां मोदी जी ये बात भूल गये कि एक्सीडेंट में ऐसी हेडलाइन आमतौर पर नहीं लगती. अगर कभी लगी है, तो ये गलत है. लेकिन ऐसे कई मौके आए हैं, जब कार ने फुटपाथ पर सो रहे लोगों को कुचल दिया है. यह देखना जरूरी है कि कार के नीचे कौन आता है और किस परिस्थिति में? जब फुटपाथ पर सोये लोग कार के नीचे आते हैं तो वो देश के टूटे स्ट्रक्चर को दिखाता है. फुटपाथ पर कौन सोता है? ये मोदी की नजरों से छुपा नहीं होगा. ये सच है कि दलित होने की वजह से किसी का एक्सीडेंट नहीं होता. पर जो आदमी फुटपाथ पर रहता है, क्या उसका सच देखा जाएगा?
5.
चुनाव से पहले प्रधानमंत्री ने जुमलों की बाढ़ ला दी थी. सबको खुला चैलेंज दिया कि मैं काम कर रहा हूं. आप लोग आंकिए. चुनाव जीतने के बाद अब प्रधानमंत्री सकुचा रहे हैं. कहते हैं कि न्यूज ये है कि मोदी सरकार ने बजट पेश किया. न्यूज ये नहीं है कि मोदी सरकार ने कमरतोड़ बजट पेश किया. कमरतोड़ तो आपका विचार है. न्यूज आप दे नहीं रहे, अपने विचार बता रहे हैं. यहां प्रधानमंत्री ये भूल गए कि पत्रकारिता का काम ही है कि नेताओं के हर काम की हर एंगल से विवेचना करें. सीधा-सीधा बताएं कि इसका क्या प्रभाव पड़ता है. प्रधानमंत्री ये भी भूल गए कि बहुत सारे ऐसे पत्रकार और चैनल हैं जो खुलेआम सरकार की बड़ाई में लग जाते हैं. बिना किसी फैक्ट या एथिक्स को ध्यान में रखते हुए. तो ये भी तो न्यूज नहीं है.
खुद प्रधानमंत्री कभी प्रेस कांफ्रेस नहीं करते. एकतरफा बात करते हैं. किसी के सवालों का जवाब नहीं देते. ये भी तो पत्रकारिता नहीं है. ये नेतागिरी भी नहीं है.