जवाब, आपके अपने चश्मे के मुताबिक. कभी कभी ये चश्मा उन विचारों का होता है जो पहले से आपके दिमाग में घर किए बैठे हैं. और अगर चश्मा मजहबी हो तो इस पर अकसर एक खास किस्म की धूल जमी होती है, जो हर तथ्य को धुंधला कर देती है. तब आप ऐसी राय बना बैठते हैं जो फैक्चुअली सही नहीं होती.
मिसाल के तौर पर दो दिन पहले एक खबर आई. जिसकी हेडलाइन कुछ वेबसाइट्स ने इस तरह लिखीं:


इन हेडलाइंस से आपको कैसी ध्वनियां आती हैं और सोचने के क्रम में आप किस दिशा में बढ़ते हैं? सोशल मीडिया पर कुछ लोग इसे ले उड़े कि युवाओं की संख्या के मामले में मुसलमान हिंदुओं से आगे निकल गए हैं और इस बारे में तुरंत कुछ करना चाहिए. जाहिर है, यह निहायत गलत व्याख्या थी.
खबर तो ये थी कि मुसलमानों की कुल आबादी में बच्चों और टीनएजर्स की हिस्सेदारी बाकी धर्मों के मुकाबले ज्यादा है. जो पिछली जनगणना में भी ज्यादा थी. देश में मुस्लिम नौजवान हिंदू युवाओं से ज्यादा नहीं हो गए हैं. मतलब ये है कि मुसलमानों की अपनी आबादी में से 47 फीसदी 'बच्चे और टीनएजर्स' हैं. जबकि हिंदुओं की आबादी के संबंध में ये हिस्सेदारी 40 फीसदी की है.
पूरे देश में
20 साल के कम उम्र के: 41 % लोग 20-59 साल के: 50 % लोग 60 साल से ज्यादा के: 9 % लोग

कोलकाता की तस्वीर. Photo: Reuters
हिंदू 7 परसेंट से पीछे हैं, पर सिर्फ परसेंटेज के मामले में, जनसंख्या में नहीं.
पूरी आबादी की बात करें तो मुल्क में 41 परसेंट 20 साल से कम उम्र के नौजवान हैं. खबर तो ये है कि देश में हर मजहब के युवाओं की तादाद 4 परसेंट घटी है. पिछले दशक में यह आंकड़ा 45 परसेंट था. चिंता करनी है तो इस पर कीजिए.देश में 96.63 करोड़ हिंदू हैं. उनमें से 40 परसेंट यानी 38.6 करोड़ टीनएजर्स हैं. इसी तरह देश में 17 करोड़ मुसलमान हैं. उनमें से 47 परसेंट यानी 7.99 करोड़ टीनएजर्स हैं. हिंदू नौजवानों की संख्या मुस्लिम युवाओं से 27.3 करोड़ ज्यादा है.
जी. मुल्क में बुजुर्ग मुसलमानों की संख्या का 'परसेंटेज' काफी कम है. इसी जनगणना से ये बात निकली है. मुसलमानों में सिर्फ 6.4 फीसदी 60 साल से ज्यादा हैं. यानी उनमें से बहुत बड़े हिस्से की मौत 60 साल से पहले हो जाती है. ये परसेंटेज नेशनल ऐवरेज का आधा है. 2001 में ये आंकड़ा 5.8 परसेंट था, जिसमें इस दशक में मामूली इजाफा हुआ है. जैन और सिखों में बुजुर्गों की हिस्सेदारी 12 फीसदी है, जो नेशनल ऐवरेज से 30 परसेंट ज्यादा है.सोचना है तो ये सोचिए कि मुसलमानों में युवाओं का परसेंटेज ज्यादा है, पर वे जल्दी क्यों मर रहे हैं.
अब ऐसा क्यों है कि मुसलमानों में युवा ज्यादा हैं और उनकी मौत भी जल्दी हो जाती है? सोशियोलॉजी के किसी प्रोफेसर से बात करने की भी जरूरत नहीं है. कॉमन सेंस है कि इसका रिश्ता अशिक्षा, खराब रहन-सहन और सेहत की सुविधाओं की कमी है.
आप जानते हैं कि देश में दलितों की हालत सोशल और फाइनेंशियल लिहाज से खराब है. फिर सच्चर कमेटी की रिपोर्ट याद कीजिए जो कहती है कि इन दलितों से भी बुरी हालत जिनकी है, वे हैं मुसलमान. सरकारी नौकरियों में उनकी हिस्सेदारी भी आबादी के अनुपात में कम है.

Photo: Reuters
फिर भी सरकारें हज पर सब्सिडी देती हैं. मदरसों को ग्रांट्स मिलते हैं. लेकिन उनकी शिक्षा और स्वास्थ्य के अच्छे और सस्ते विकल्प मुहैया कराने पर खर्च बहुत कम है. जकात के पैसों से मदरसे ज्यादा खुलते हैं, अस्पताल और स्कूल कम.
यह बात सही है कि पूरी जनसंख्या में इजाफे की दर के मामले में मुसलमान आगे हैं. लेकिन रोजमर्रा के तजुर्बे से आप गरीबों की मानसिकता जानते हैं. गरीब परिवार आज भी मानते हैं कि जितने हाथ होंगे उतनी कमाई होगी. मौजूदा सिस्टम में इस बात की खासी संभावना है कि मजदूरी करने वाला एक परिवार 4 मजदूर बच्चे पैदा करना चाहेगा, जो परिवार की आमदनी में इजाफा करेंगे. इसके उलट मिडल क्लास की सोच है कि बच्चे जितने कम हों, उनके पालन, शिक्षा और स्वास्थ्य पर उतना बेहतर खर्च किया जा सकेगा. तो जनसंख्या का यह मसला वर्गभेद से सीधी तरह जुड़ा हुआ है.
लिहाजा आंकड़ों से किसी की नसें फूलें या नारे लगाने का मन करे, ऐसा कोई कारण नहीं है. बल्कि जिम्मेदारी है कि इस तरह की खबरों को ध्यान से पढ़ें, समझें, तब राय बनाएं. जल्दबाजी न करें.
आपने ट्रकों के पीछे लिखा देखा होगा, 'जिन्हें जल्दी थी, वे चले गए. और जो जल्दी में हैं, वो कहीं नहीं पहुंचेंगे.





















