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यहीं से अपर्णा सिंह बिष्ट सोशल वर्क और पॉलिटिक्स में इंटरेस्ट लेने लगीं. अब करियर बाकायदे शुरू होने जा रहा है. 26 साल की अपर्णा मुलायम सिंह यादव की छोटी बहू हैं. उनके पति प्रतीक यादव की दिलचस्पी बॉडी बिल्डिंग और रियल एस्टेट के बिजनेस में ज्यादा थी. इसलिए वह राजनीति में नहीं उतरे तो अपर्णा उतर आईं. इस फैसले से कोई नहीं चौंका है. एनजीओ में सोशल वर्क करते, महिलाओं और बच्चों से जुड़े मुद्दों पर काम करते और पॉलिटिकल बयानबाजी करते देखकर कोई भी उनकी राजनीतिक इच्छाओं और संभावनाओं का अंदाजा लगा सकता था.

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तो अब वह चुनाव लड़ेंगी. जेठ जी सूबे के मुख्यमंत्री हैं. ससुर जी सांसद हैं. चचिया ससुर यूपी में मंत्री हैं. पॉलिटिक्स में एंट्री लेने वाली वह यादव परिवार की 20वीं मेंबर हैं.
लखनऊ कैंट सीट पर उत्तराखंड का असर!
अगले साल होने वाले यूपी विधानसभा चुनाव के लिए सपा ने उन्हें लखनऊ कैंट सीट से उम्मीदवार बनाया है. यहां पहाड़ी वोटरों की खासी तादाद है. कांग्रेस की प्रदेश अध्यक्ष रह चुकीं रीता बहुगुणा जोशी यहीं से विधायक हैं. लेकिन उनके भाई विजय बहुगुणा उत्तराखंड में कांग्रेस से बगावत कर चुके हैं. यूपी चुनाव में अभी काफी वक्त है और हैरत नहीं होनी चाहिए अगर रीता बहुगुणा जोशी भी पंजे की जगह किसी और निशान से चुनाव लड़ती नजर आएं. इसलिए लखनऊ कैंट सीट पर उनकी राह कैसी होगी, यह कहना अभी जल्दबाजी है. पर इस सीट से सपा कभी नहीं जीती. पिछले चुनाव में सपा प्रत्याशी यहां चौथे नंबर पर था.
किरण बेदी के साथ. फोटो: फेसबुक
सपा ने उन्हें मुलायम परिवार की गढ़ माने जाने वाली मैनपुरी-इटावा-फिरोजाबाद बेल्ट से टिकट नहीं दिया. लखनऊ के कुछ पत्रकारों का अनुमान है कि अपर्णा अपनी सीट से खुश नहीं होंगी. हो सकता है कि चुनाव से पहले उनकी सीट बदल भी दी जाए.
और बचपन कैसा था?
अपर्णा के बारे में दो बातें लोग जानते ही हैं. एक तो ट्रेंड सिंगर हैं, दूसरा विदेश से पढ़कर आई हैं. क्लासिकल म्यूजिक सीखा है. सितार भी बजाती हैं. सुंदर गाती हैं. छुटपन में मां मानती थीं कि लड़कियों को आर्ट्स में अच्छा करना चाहिए. उससे उनकी पर्सनैलिटी निखरती है. हर घर में बाजा होना जरूरी है. लेकिन अपर्णा शरारती थीं. फिर उन्होंने पहली बार मोहम्मद रफी को सुना तो गाने लगीं. तब मां ने म्यूजिक सीखने भेज दिया.
https://youtu.be/fOTzpO6hKaU?t=32s
प्रतीक की मां का जन्मदिन था. बर्थडे पार्टी में 9वीं में पढ़ने वाली अपर्णा ने गाना गाया. प्रतीक ने सुना और उन्हें लगा कि उनकी पार्टी में 'यो' टाइप के लोग कहां से आ गए. इस उम्र में जैसा आकर्षण होता है, हो गया. प्रतीक ने याहू मैसेंजर पर उन्हें खूब सारे मैसेज भेज डाले, जो अपर्णा ने बहुत बाद में देखे.बताते हैं कि शुरू में मुलायम इस रिश्ते के लिए तैयार नहीं थे पर बाद में मान गए. 2011 में सैफई में दोनों की शादी हुई. बताने वाले बताते हैं कि यूपी वालों ने कभी वैसा भव्य प्रोग्राम नहीं देखा था. 2013 में उन्हें बिटिया हुई. नाम रखा- प्रथमा.फोटो: फेसबुक

बॉडी बिल्डिंग के शौकीन हैं अपर्णा के पति प्रतीक.
अपर्णा ने विदेश से इंटरनेशनल रिलेशंस की पढ़ाई की है. बोलती हैं तो अंग्रेजी और हिंदी दोनों भाषाओं के शब्द सहजता से निकलते हैं. एनिमल राइट्स के लिए काम करती हैं. घर के फंक्शन में नॉन वेज नहीं बनने देतीं. किसी को मांस खाना हो तो बाहर ही खाता है. अपर्णा चमड़े की चीजें इस्तेमाल नहीं करतीं, न पति को करने देती हैं.

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हालांकि खबरें थी कि मुलायम सिंह परिवार की महिलाओं के पॉलिटिक्स में आने के पक्ष में नहीं थे. बताते हैं कि उन्होंने डिंपल के राजनीति में आने का भी विरोध किया था. बल्कि वह चाहते थे कि प्रतीक राजनीति में इनवॉल्व हों. लेकिन प्रतीक का इंटरेस्ट नहीं था तो उन्होंने ये जगह अपनी पत्नी के लिए मांग ली. जाहिर है कि मुलायम इस मांग के साथ सहज नहीं थे.

डिंपल, अपर्णा, प्रतीक. फोटो: फेसबुक
2014 में उनसे पूछा गया कि क्या ससुर जी उन्हें राजनीति में आने को कहा है? उनका जवाब था, 'हां वो कहेंगे तो सोचा जाएगा. समय, काल और परिस्थिति के हिसाब से.'अपर्णा अपने सुंदर चेहरे, गायकी और आत्मविश्वासी व्यक्तित्व के अलावा पार्टी लाइन से अलग बयान देने के लिए भी जानी गईं. उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वच्छ भारत अभियान का खुलकर समर्थन किया और उनके साथ सेल्फी भी सोशल मीडिया पर शेयर की. उनके शब्द थे, 'बतौर प्रधानमंत्री वह अच्छा काम कर रहे हैं.'

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पार्टी लाइन की ज्यादा परवाह नहीं की
'निर्भया केस' के नाबालिग आरोपी को फांसी की सजा की मांग करते हुए उन्होंने लखनऊ में प्रोटेस्ट किया. जनवरी में जब प्रधानमंत्री अंबेडकर यूनिवर्सिटी पहुंचे थे तो उस प्रोग्राम में पहुंचने वाली वह यादव परिवार की इकलौती मेंबर थीं. उन्होंने इनटॉलरेंस पर आमिर खान के बयान का विरोध किया, जबकि उनके ससुर इसके समर्थन में थे. बीफ के बवाल पर भी उनका स्टैंड बीजेपी के ज्यादा करीब था. इस पर खखोरू पत्रकारों ने यह निष्कर्ष निकाला कि यह पार्टी को कड़े संकेत देने की रणनीति थी, ताकि अपना सियासी हक वसूला जा सके.''मीडिया के जो लोग मेरे, मेरे परिवार या पार्टी को लेकर कंट्रोवर्सी करते हैं, उन्हें नारी सशक्तिकरण का पाठ मैं ही पढ़ाऊंगी. आप चिंता न करें.'' - अपर्णा यादव, उनके बयानों पर सपा नेताओं से प्रतिक्रिया लेने पहुंचने वाले पत्रकारों पर2014 में जब उनसे अखिलेश सरकार के काम-काज के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा, 'ये एक राजनीतिक सवाल है. लेकिन उत्तर प्रदेश के नागरिक के तौर पर कोई भगवान नहीं होता. अभी बहुत अच्छा काम कर रहे हैं. पर मैं चाहती हूं कि और अच्छा हो.'

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कुछ भी हो, अपर्णा की समझ कच्ची नहीं लगती. महिलाओं के खिलाफ अपराध के बारे में पूछे जाने पर वह महिलाओं को वस्तु समझे जाने की मानसिकता पर बात करती हैं. सियासत में उनकी राह वैसी आसान नहीं है, जैसी दूसरे राजनीतिक वारिसों की होती है. वह परिवार की अंदरूनी राजनीति को अपने सियासी चमत्कार से पछाड़ पाईं तो महिला विरोधी बयानों के लिए बदनाम 'पुरातनपंथी' सपा में नई ताजगी ला सकती हैं.












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