
विनीत दी लल्लनटॉप के रीडर और पक्के वाले दोस्त हैं. बलिया से हैं. जहां से चंद्रशेखर प्रधानमंत्री बने थे. उन्हीं ने देवस्थली विद्यापीठ स्कूल खोला था जिस स्कूल में पढ़े हैं विनीत. आजकल मुंबई में रहते हैं और वहीं से दुनिया देख रहे हैं. अपने देखे सुने का तमाम एक्सपीरिएंस लल्लन के साथ भी बांटते हैं. अपने दोस्त मकालू से परेशान रहते हैं, उसके किस्से भेजते हैं. आप भी पढ़िए.
गौरी लंकेश की मौत पर हंसने वालों के लिए सबसे सही बात इस आदमी ने बोली है!
कातिलों और ट्रोल्स के बारे में बेहद संवेदनशील बात.
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मैं इसी उधेड़ बुन में था कि मेरा दोस्त मकालू मिल गया. अक्सर बहुत आड़े टेढ़े सवालों से उलझा देता है मुझे. लेकिन आज मेरे सवाल से वो उलझ सा गया. बोला- गुरु दरअसल उन लोगों की सिर्फ दलीलें कमजोर नहीं होतीं. बल्कि वो खुद बहुत कमजोर होते हैं. बिलकुल अंदर से सड़े और गले हुए.

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मैं समझा नहीं मकालू. आखिर किसी को जान से मारने कि ताकत रखने वाले कमजोर कैसे हो सकते हैं?
मकालू बोला- गुरु कोई भी हथियार तभी उठाता है जब वो बेहद ही कमजोर अवस्था में होता है. कई बार लोग परिस्थितिवश आत्मरक्षा के लिए भी हथियार उठाते हैं. लेकिन जाति, धर्म, परंपरा या खुद के आत्मसम्मान के नाम पर हथियार उठाकर किसी की जान लेने वालों की सिर्फ दलीलें नहीं बल्कि उनकी सांस्कृतिक, पारिवारिक और आध्यात्मिक जड़े भी कमजोर होती हैं. उनके अंदर ताकत ही नहीं होती है कि वो सच की कड़वाहट को गले से नीचे उतर पाएं. फिर वो सच कहने वाले का गला काटने पर उतारू हो जाते हैं और कई बार काट भी देते हैं. मैं तो कहता हूं कि अगर कोई गलत भी कह रहा हो तो आपके पास इतनी क्षमता क्यों नहीं होती कि आप अपने सच को सामने लाकर उसे ससम्मान स्थापित कर सको.

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मकालू कि बातें कहीं मेरे अंदर उतर रही थीं. मैंने पूछा- दोस्त सोशल मीडिया पर मैंने कुछ लोगो को इस क़त्ल की वकालत और सेलिब्रेशन करते भी देखा. आखिर लोग किसी पत्रकार से या किसी भी इंसान से इतनी नफरत कैसे कर सकते हैं कि उसकी मौत से उन्हें ख़ुशी हो?
मकालू बहुत गुस्से में बोला- गुरु वो भी कमजोर और कुंठित लोगो की जमात है. दरसअल अपने समर्थन और सेलिब्रेशन से वो भी हिंसा कर रहे हैं. वैचारिक हिंसा कर रहे हैं. उनकी गालियां उसी गोली की प्रतिरूप हैं जिससे एक कन्नड़ पत्रकार कि हत्या हुई है. खून वो भी कर रहे हैं, फर्क इतना है तात्कालिक तौर पर खून नहीं दिखता. लेकिन इसके असर से कभी वाकई में कत्ल हो जाता है.
गुरु मैं मानता हूं कि ये वो लोग हैं जिन्हें बचपन में नहीं सिखाया जाता कि नफरत, पूर्वाग्रह, हिंसा जैसी नकारात्मक भावनाओं से दूर रहने के लिए बहुत साहस और आत्मज्ञान की जरूरत होती है. हिंसा पर कोई तभी उतारू होता है जब उसके समूचे वजूद के पास कोई जवाब नहीं होता. और सामने वाले के सवालों के जवाब देने के बजाय वो सवाल करने वाले को ही मिटा देना चाहता है.

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और एक आखिरी बात कह दूं गुरु कि पत्रकार दरबारी कलाकार नहीं होता है.
मैं समझा नहीं- बात मेरे ऊपर से निकल गयी थीं.
मकालू बोला- गुरु राजतंत्र में दरबारी कवि का काम होता था राजा कि तारीफ में कसीदे पढ़ना. उसकी कलम सिर्फ राजा को खुश करने के लिए उठती थी और वैसे ही दरबारी कलाकार बादशाह की झुर्रियों को भी अपने रंगो से छिपा देता था. बदले में उन्हें दौलत और तरह तरह की उपाधियां और रियासतें दी जाती थीं. लेकिन पत्रकार का किरदार इसके उलट होता है. पत्रकार वो आइना होता है जो हुकूमत को और समाज को उसकी सच्चाई दिखाता है. हुकूमत के चेहरे पर पड़ी झुर्रियों को ज्यों का त्यों सामने रख देता हैं.
और गुरु तुम्हें जो पत्रकार ऐसा करते नहीं दिखते हैं, समझ लेना कि उन पत्रकारों को हुकूमत से किसी तरह की बख्शीश की लालसा है. लेकिन उन्हें ये भी याद रखना चाहिए कि ये राजतंत्र नहीं बल्कि लोकतंत्र है और वक़्त जरूर उनका भी हिसाब करेगा.
मुझे मकालू कि सारी बातें तो नहीं समझ आईं लेकिन फिर भी काफी कुछ समझ में आ रहा था. सवाल तो अभी भी कई थे मेरे पास लेकिन मैंने उनको अपने अंदर ही मर जाने देना बेहतर समझा.
आखिर पूछू भी किसके लिए? आखिर सुन भी कौन रहा है?
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