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अगर ये किस्से समझ लें, तो दंगे कभी नहीं होंगे

शिवसेना की कहानी...

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फोटो - thelallantop

1. जोगेश्वरी में रहनेवाली एक मुस्लिम औरत ने कहा: ठाकरे मुझसे ज्यादा मुस्लिम हैं. उनको मुसलमानों का ऑबसेशन है. हम क्या खाते हैं, कैसे नमाज पढ़ते हैं सबकी चिंता उनको है. वो दिन-रात हम लोगों को ही देखते रहते हैं.

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-सुकेतु मेहता की किताब मैक्सिमम सिटी से

2. कोर्ट के जजमेंट पर मैं मूतता हूं. बाल ठाकरे, जून 1993 में

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1980 से 1990 के बीच भारत की राजनीति में कम्युनलिज्म बहुत ज्यादा फैला. पंजाब में खालिस्तान की मांग को लेकर स्थिति ख़राब हुई जो ऑपरेशन ब्लूस्टार और इंदिरा गांधी की हत्या  के रूप में सामने आया. कश्मीर में आतंकवाद पनपने लगा. 'हिन्दू चेतना' के नाम पर छोटे-बड़े ढेर सारे संगठन उग आये. गंगा जल यात्रायें आयोजित की जाने लगीं. राम-जन्मभूमि और बाबरी मस्जिद का मामला उठ ही चुका था. 'गर्व से कहो हम हिन्दू हैं' को प्रचारित किया जा रहा था. नार्थ-ईस्ट में क्रिश्चियन मिशनरीज के काम को लेकर 'धर्म परिवर्तन' जैसे मुद्दे उठाये जा रहे थे. उसी समय प्रधानमंत्री राजीव गांधी देश को 21वीं सदी में ले जाने की बात कर रहे थे. उस वक़्त शिवसेना क्या कर रही थी?

शिवसेना की राजनीति 1985-94

महाराष्ट्र में कम्युनलिज्म

संयोग से या दुर्योग से, महाराष्ट्र में कल्चरल रिवाइवल बहुत पहले से हो रहा था. विनायक सावरकर ने हिन्दू महासभा बनायी थी और महासभा बहुत पहले से इस बिजनेस में थी. गोलवलकर और हेडगेवार ने आरएसएस बनाया था. दोनों ग्रुप्स का टारगेट बने चीफ मिनिस्टर अब्दुल रहमान अंतुले. उन पर दोनों ने कई आरोप लगाए. इस नेक काम में अंतुले से नाराज चीनी मिलों के मालिकों ने बहुत हाथ बंटाया. अभी तक आरएसएस और बीजेपी को बनिया-ब्राह्मण पार्टी कहा जाता था. अपनी छत्र-छाया में बाकी जातियों को लाने के लिए बहुत सारे संगठन बनाये गए. पतित पावन, बहुजन युवा इत्यादि-इत्यादि. बेरोजगारी और गरीबी ने इस आग को कायदे से हवा दी. तब तक शिवसेना का बीजेपी से संगठन हो चुका था. शिवसेना ने इस कम्युनल कार्ड को अपने तरीके से खेला.
पार्ट-3 में हमने पढ़ा था कि शिवसेना पर भिवंडी में दंगे कराने का आरोप लगा था. फिर शिवसेना बीजेपी के साथ मिलकर चुनाव भी हार चुकी थी. पर  BMC के चुनाव में कांग्रेस के मुख्यमंत्री वसंतदा पाटिल की गलतबयानी के चलते 'मराठा-मानुस' के कार्ड पर शिवसेना जीत गई.
फिर अपने 'वादों' को पूरा करने के लिए शिवसेना असम की घटनाओं का सहारा लेने लगी. 1984 में असम में 'बाहरी' के मुद्दे पर दंगे हुए थे. सरकार 1972 में एक कट-ऑफ डेट दे रही थी. उसके बाद असम आने वाले लोगों को वापस भेजने का प्लान था. बातें चल रही थीं. ठाकरे ने भी बम्बई के लिए एक कट-ऑफ डेट की मांग कर दी! पर कुछ ख़ास हो नहीं पाया. महाराष्ट्र समेत अन्य राज्यों में एक के बाद एक मुख्यमंत्री बदले जा रहे थे. राजीव गांधी अपने इन्हीं फैसलों के लिए कुख्यात हो चुके थे. ऐसे में बम्बई में शिवसेना पर लगाम रखनेवाला कोई नहीं था.

किसान कैसे पहुंचे 'शहरी' शिवसेना में?

शिवसेना की पहुंच किसानों में भी बढ़ी. किसानों का 'शेतकारी संगठन' अपने नेता शरद जोशी के 'मुक्त व्यापार' के सपोर्ट के चलते बिखर रहा था. ऐसे में शिवसेना की तरफ उनका झुकना लाजिमी था. शरद जोशी धीरे-धीरे इतना मुक्त हो गए कि बाद में 1999 में शिवसेना-बीजेपी की बड़ाई करने लगे और उनसे अपने कैंडिडेट उतरवाने की कोशिश करने लगे. तो किसान शिवसेना की तरफ आयेंगे ही. इन सारे 'संयोगों' का फायदा मिला शिवसेना को. 1988 में औरंगाबाद में शिवसेना को म्युनिसिपल इलेक्शन में जीत हासिल हुई. मराठावाड़ा क्षेत्र में औरंगाबाद की राजनीति सबसे ऊपर है. यहां मुस्लिम और दलित समुदाय की संख्या ज्यादा है. पर शिवसेना की जीत से लोगों को कम्युनल पोलराईजेशन की आशंका हुई.

प्रोजेक्ट हिंदुत्व:'सामना'

इस दौर में तीन वाकये हुए. जो शिवसेना की तरक्की समझने के लिए जरूरी हैं. पहला. सामना की शुरुआत. 1989 शिवसेना के लिए पैराशूट लेकर आया. अब शिवसेना अपने आसमान से किसी भी जगह की जमीन पर उतरने के लिए तैयार थी.  शिवसेना ने अपना दैनिक अखबार 'सामना' लांच किया. अब रोज-रोज धर्म लो लेकर कड़वे बोल बोलना आसान हो गया. फिर प्रोजेक्ट हिंदुत्व के लिए ग्राउंड तैयार करना भी आसान हो गया. ठाकरे का स्टाइल जगजाहिर था. अब जो वो रोज बातचीत में बोलते थे उसको लिख के सबके पास पहुंचाना आसान हो गया. नाम 'सामना' भी धर्म को लेकर किसी के खिलाफ खड़े होने की आइडियोलॉजी के लिए उपयुक्त था. दूसरा. 1989 में ही थाने के मेयर के चुनाव में शिवसेना के दो लोगों ने क्रॉस-वोटिंग कर दी. उनमें से एक का मर्डर हो गया. आरोप तो बहुत लगे पर कुछ साबित नहीं हो पाया. मगर काडर को संदेश साफ था. बगावत सेहत के लिए हानिकारक होगी. तीसरा. बीजेपी के साथ चुनावी गठजोड़. ये फैसला हुआ बीजेपी के पालमपुर में हुए अधिवेशन में. इसी में ये भी तय हुआ कि पार्टी विहिप के रामजन्मभूमि आन्दोलन को खुला सपोर्ट करेगी. शिवसेना पहले ही उग्र हिंदुत्व की नाव पर सवार थी. दो यार मिल गए. बाकी बातों पर भले ही मतभेद हो, इस बात पर दोनों अभी तक दोस्त हैं. अंबेडकरवादी राजनीति के खिलाफ खड़ी शिवसेना महाराष्ट्र में अंबेडकर के समय से ही दलित आंदोलन मजबूत था. अपने शुरुआती दौर में शिवसेना का दलित पैंथर्स नाम के दल से टकराव हुआ. 1974 में ये हिंसक रहा. पैंथर्स का एक नेता मारा गया. उंगलियां शिवसेना पर उठीं. ठाकरे का बार बार कहना था. जाति नहीं, महाराष्ट्र की पहचान अहम है. फिर मंडल कमीशन के दौरान भी ठाकरे ने रुख साफ किया. वह 'जाति आधारित रिजर्वेशन' के खिलाफ थे. 1988 में राज्य की कांग्रेस सरकार ने दलितों को लुभाने के लिए अंबेडकर की किताब का प्रचार शुरू किया. शिवसेना ने इसका विरोध शुरू कर दिया. मगर दलित इस बार चुप नहीं रहे. उन्होंने किताब के पक्ष में जोरदार प्रदर्शन किए. कांग्रेस ने किताब निकाली. किताब के बाद मोर्चा खुला यूनिवर्सिटी के नाम पर. मराठावाड़ा यूनिवर्सिटी का नाम अंबेडकर के नाम पर ऱखा गया. शिवसेना इसके भी खिलाफ थी. 1989 में सांसद, विधायक बढ़े और ठाकरे बोले: गोडसे पर गर्व है.  1989 के लोकसभा चुनावों में शिवसेना-बीजेपी ने 48 में से 14 सीटें जीतीं. असेंबली इलेक्शन में 288 में से 94 सीटें जीतीं. वोट परसेंटेज इनका 28 तक पहुँच गया. शिवसेना की 94 में से 52 सीटें थीं. ये ज्यादा अहम था. 1991 में बाल ठाकरे ने एक भाषण में कहा: 'हमें नाथूराम गोडसे पर गर्व है. उन्होंने देश को दूसरे पार्टीशन से बचाया. उन्होंने महात्मा गांधी के देश से धोखे का बदला लिया था. इस भाषण को सामना में कई बार छापा गया'. फिर ठाकरे ने खुलेआम हिटलर की स्तुति शुरू कर दी. हिटलर पर एक किताब का 'विमोचन' भी किया. उसकी फ्री कॉपियां भी बंटवाई.

बाल ठाकरे और फ्री स्पीच

1.संयुक्त महाराष्ट्र मूवमेंट के नायक आत्रे को ठाकरे ने 'वर्ली का सूअर' कहना शुरू कर दिया था. 2.'दोपहर का सामना' में शिवसेना ने एक महिला पत्रकार को 'वेश्या' कहा था. 3.1991 लोकसभा चुनाव के प्रचार में ठाकरे ने जजों पर भी जुबानी हमला किया! नहीं पता किस फायदे से. पर कोई और बोले तो? नवभारत टाइम्स के एक पत्रकार को शिवसेना की आलोचना करने के लिए मार के सर फोड़ दिया गया.

सेना के ओबीसी पोस्टर बॉय भुजबल ने कहा बाय

1991 में शिवसेना को बड़ा झटका लगा. इसके बाद ठाकरे की रणनीति बदल गई.  ओबीसी लीडर छगन भुजबल ने 17 विधायकों के साथ पार्टी छोड़ दी. दो वजहें थीं. पहला, ब्राह्मण जाति से आने वाले मनोहर जोशी को लीडर ऑफ़ अपोजिशन बनाया गया था. दूसरे, ठाकरे ने मंडल कमीशन का विरोध किया था. छगन 'माली' जाति से आते थे और OBC समुदाय में उनकी गहरी पकड़ थी. विधानसभा चुनावों में छगन स्कूटर पर बैठकर प्रचार करते थे. शिवसेना बम्बई तक सीमित थी पर छगन ने जान लगाकर प्रचार किया और शिवसेना को गांवों में भी पहुंचा दिया. ठाकरे ने अब वो किया जिसके लिए वो सबको गरियाते थे. अपने बेटे उद्धव ठाकरे और भतीजे राज ठाकरे को पार्टी में बड़े पदों पर शामिल किया. 'वंशवाद' का आरोप न लगे इसके लिए ठाकरे ने एक स्टंट भी किया. फिर से वही 'पुर्जा' वाला. निकाला, पढ़ा. 'शिवसेना छोड़ रहा हूं'. शिवसैनिक फिर पागल. 'साहेब! नहीं. साहेब! नहीं'. साहेब इतना प्यार ठुकरा नहीं पाए. एक बार साहेब ने कहा था: शिवसेना का चीफ बन के रहने में जो बात है वो मुख्यमंत्री या कोई भी मंत्री बन के नहीं आएगी.

देश कम्युनलिज्म की चपेट में  

1992-3 में देश में तीन बड़ी-बड़ी घटनाएं हुईं: 1. दिसम्बर 1992 में अयोध्या में बाबरी मस्जिद का गिरना 2. दिसम्बर 1992 और जनवरी 1993 में बम्बई में दंगे (दंगे और जगहों पर भी हुए थे पर बम्बई के दंगों का परिणाम ज्यादा खतरनाक था) 3. मार्च 1993 में बम्बई बम ब्लास्ट आडवाणी ने जब रथ-यात्रा शुरू की तो शिव सैनिक कन्फ्यूज थे. क्योंकि उनके पास अपना भगवान तो पहले से ही था. क्या करें? थोड़ी हीला-हवाली के बाद क्लियर हो गया: 'मंदिर वहीं बनायेंगे'. जब मस्जिद गिरी तब बीजेपी के नेता इसका क्रेडिट लेने में सकुचा रहे थे. वैसे वक़्त में ठाकरे ने प्राउडली कहा: 'मस्जिद गिराने वाले शिवसैनिक थे'. बीजेपी के लोग भी शुरुआती सफाई में यही कह रहे थे: कारसेवक मराठी बोल रहे थे. बम्बई में दंगे-1 6 दिसम्बर को मस्जिद गिरने के बाद बम्बई में स्थिति गंभीर हो गई. मुसलमान समुदाय के हज़ारों लोग सड़कों पर उतर आये. कांफ्रेंसेज होने लगीं. दंगाइयों का हमला सरकारी दफ्तरों, पुलिस पर होने लगा. मिनारा मस्जिद के पास पुलिस की एक गाड़ी फूंक दी गई और दो पुलिसवालों को मार दिया गया. 7 दिसम्बर की सुबह ऐसा हो गया कि हॉस्पिटल में हर मिनट एक बॉडी जाने लगी. 8 दिसम्बर को 'सामना' ने लिखा: 'देश्द्रोहियाना चीरदा'. 9 दिसम्बर को साकीनाका के पास आग लगा दी गई और 1000 लोग बेघर हो गए. मुसलमान समाज के उत्साही लोगों का जत्था निकलने लगा: 'मस्जिद वहीं बनायेंगे'. मुख्यमंत्री सुधाकर राव नायक दंगों के बारे में यही कह पाए: 'मैंने ठाकरे से 'बात' की है'. ठाकरे ने कहा: 'सरकार आर्मी की मदद से जनता को काबू में करना चाहती है. पर हिन्दू ताकत को अब कोई नहीं रोक सकता'. बम्बई में दंगे-2 10 दिसम्बर को मछुआरों की बस्ती में आग लगा दी गई. 11 दिसम्बर को शुक्रवार था. दिन लगभग शांत रहा. पर शाम थोड़ा भयावह सीन हो गया. मुसलमान समुदाय  के नमाज के समानांतर हिन्दू समाज के उग्र लोगों ने आरती की. शिवसेना के लोगों ने महाआरती की. फिर किसी ने आजाद मैदान में क्रिकेट खेल रहे लड़कों पर यूं ही फायरिंग कर दी. रात को उग्र मुस्लिम भीड़ ने डिंडोशी में एक मंदिर में आग लगा दी और पुजारी को बाहर खींच कर मार डाला. लगा बवाल फिर बढ़ेगा. पर 12 दिसम्बर को थोड़ी शान्ति रही. सिर्फ चार लोगों को जलाया गया. 13 दिसम्बर को सब कुछ शांत हो गया. 18 दिसम्बर को कांदिवली और चिंचपोकली में बम ब्लास्ट हुए. पर फिर भी मामला संभल गया.

शिवसेना ने अब हर बड़े मंदिर में महाआरती करने का फैसला किया. 26 दिसम्बर से 6 जनवरी के बीच 33 महा-आरतियां हुईं.

बम्बई में दंगे-3 6 जनवरी को एक ट्रांसपोर्ट कंपनी में काम करनेवाले विष्णु कदम और उसके भाई को मार दिया गया. पुलिस की कोशिश रही बताने की कि ये दंगे की वजह से नहीं हुआ बल्कि यूनियनबाज़ी के चलते हुआ है. आपसी रंजिश में क़त्ल हुआ है. पर जब दिल में आग लगी हो तो हर लपट वहीं से आती मालूम पड़ती है. 7 जनवरी को कई संगठनों ने विरोध-प्रदर्शन किया. 8 जनवरी को दो जगहों से दो हिन्दू परिवारों के मार दिए जाने की खबर आई. शिवसेना ने अपनी सारी शाखाओं में मीटिंग शुरू कर दी. 9 जनवरी को 'सामना' में ठाकरे का लेख आया: 'देश को बचा के रखो. जब दूसरे लोग हिंसक हो रहे हैं तो हम शांति का सन्देश नहीं देंगे. कोई भी आता है और हम लोगों को डांटने लगता है. हम ये बर्दाश्त नहीं करेंगे. सरकार बुरका पहन के बैठी है. हम नहीं. जब तक शरीर पर दो-चार घाव नहीं लगेंगे, जीत बेकार होगी. आनेवाले दिन हमारे हैं'. 9 से 12 जनवरी के बीच बम्बई में भयानक क़त्ल-ए-आम हुआ. म्युनिस्पेलिटी के रिकार्ड्स चेक कर के लोगों को टारगेट किया गया. साइकिल पंक्चर बनाने वाले, पान वाले, मोचियों सबको मारा गया. पुलिस खड़ी मुंह ताकते रही. अब सारे क्रिमिनल्स को छूट मिल गई थी. जम के उत्पात हुआ. इस बात को बाल ठाकरे ने भी बाद में माना कि 'हिन्दूवाद'  की जगह अपराधियों ने ले ली थी. आर्मी थी पर कोई क्लियर ऑर्डर्स नहीं मिल रहे थे. 10 जनवरी को ठाकरे ने 'सामना' में लिखा: 'हिन्दुओं ने दिखा दिया है. अब वो मारते हैं, मरते नहीं'. अफवाहें उड़ती रहीं. कुछ इस तरह की कि इस्लामिक देशों से कमांडो आ रहे हैं. हिन्दुओं को मारने के लिए. कहीं और कुछ और आता. फाइनली 12 जनवरी को ठाकरे ने 'सामना' में लिखा: 'बहुत हुआ. अब सबको सिखा दिया गया है'. शिवसैनिकों ने इस सन्देश को चारों ओर फैलाया. शहर में होर्डिंग लगाए गए. असर हुआ. दंगे रुक गए. दंगों के बाद

1.1993 में 'महानगर' के एडिटर निखिल वागले ने कहा: 'मैं 'सामना' को अखबार नहीं मानता'. कहा जाता है कि शिवसेना के लोगों ने उनको बहुत मारा.

2.1994 में ठाकरे ने एक टीवी इंटरव्यू में हिन्दुओं को 'सन्देश' दिया: हिन्दुओं को आक्रामक बनना पड़ेगा.

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3.महाराष्ट्र के विधानसभा चुनाव प्रचार में ठाकरे ने हर जगह कहा: मुख्यमंत्री मैं डिसाइड करूंगा. रिमोट कंट्रोल मेरे हाथ में रहेगा. अगर करप्शन का एक भी मामला सामने आया तो मैं चीफ मिनिस्टर को भी भगा दूंगा. अगर मंत्रालय में फाइलें पड़ी रहीं तो मैं उनको आग लगा दूंगा.

4. आगे बोले: अगर इलेक्शन कमीशन बुरका वाली औरतों को वोट डालने की अनुमति देगा तो हम वोट नहीं पड़ने देंगे. सिर्फ बम्बई नहीं, पूरे इंडिया में.

शिवाजी पार्क में शपथ

दंगों के समय कांग्रेस की केंद्र और राज्य, दोनों सरकारें मुंह ताकती रहीं. फिर लातूर भूकंप और गोवारी भगदड़ में हुए नरसंहार के बाद कांग्रेस नेताओं की स्थिति प्रशासक के तौर पर इज्जत खो रही थी. मुख्यमंत्री शरद पवार के 'भाई' लोगों के साथ रिलेशन के आरोप, वासी-विरार डेवलपमेंट कंट्रोवर्सी ने सब गोबर कर दिया. नतीजा निकला कि 1995 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी और शिवसेना ने 288 में से 138 सीटें जीत लीं. बाकी 7 सीटों का जुगाड़ हो गया. क्योंकि कांग्रेस के कई विधायक पार्टी छोड़ कर आ गए. शिवसेना के मनोहर जोशी मुख्यमंत्री बने और बीजेपी के गोपीनाथ मुंडे उप-मुख्यमंत्री.

14 मार्च 1995 को मनोहर जोशी ने शिवाजी पार्क में शपथ ली. वहीं जहां से शिवसेना ने अपना सफ़र शुरू किया था. महाराष्ट्र में पहली बार कोई मुख्यमंत्री राजभवन की बजाय खुले में शपथ ली थी.

बाला साहेब ठाकरे ने मंच से खुशी में मस्त शिवसैनिकों से पूछा: क्या मैं सपना देख रहा हूं?

सरकार में आने के बाद बाल ठाकरे ने क्या किया? और क्या हुआ जब 1996 में होम मिनिस्टर इन्द्रजीत गुप्ता हाथ में एक डंडा लेकर मुंबई गए? पढ़िए आगे...
 

ये स्टोरी 'दी लल्लनटॉप' के लिए ऋषभ ने की थी.


बाल ठाकरे और शिवसेना की कहानी: पार्ट 1 बाल ठाकरे और शिवसेना की कहानी: पार्ट 2 बाल ठाकरे और शिवसेना की कहानी: पार्ट 3 क्या हुआ जब बाल ठाकरे के हाथ में मुंबई का रिमोट आया?: पार्ट 5

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