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जब महाभारत में सुनाई गई रामायण की कहानी

ये वो मौक़ा था जब एक महागाथा में दूसरी महागाथा चल रही थी.

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Source- artoflivingsblog
"राजकुमार थे हम! किस से कम थे क्या? हमने किसी का क्या बिगाड़ा था? कोई पाप भी नहीं किया फिर भी दर-दर भटक रहे हैं. इतना दुर्भागी हमारे सिवा और कौन होगा दुनिया में?" ताजा -ताजा जयद्रथ से द्रौपदी को छुड़ाकर आए थे युधिष्ठिर. दुखों से चट गए थे. मार्कण्डेय ऋषि के सामने बैठे-बिठाए हाल-ए-दिल-ए-ज़ार खोल बैठे. मार्कण्डेय बोले- धीर धरो बालक. तुमसा ही कोई और भी था. राजा का बेटा था. उससे भी ऐसे ही राज छुड़ा लिया गया था. जंगल-जंगल भटका. बीवी को कोई हर ले गया. तुम्हारी तो फिर भी तुम्हारे साथ है. पर उनने हार न मानी. जिस काम को जन्म लिया था कर के ही माने. युधिष्ठिर बोले - कौन था मुनिवर? मुझे भी बताइए. मैं भी जानूं मुझसे पहले किसने मुझसा झेला है. तब मार्कण्डेय ऋषि ने उन्हें रामायण की कहानी सुनाई. ये वो मौक़ा था जब एक महागाथा में दूसरी महागाथा चल रही थी. यही वो मौक़ा जब महाभारत में रामायण की कथा सुनाई गई.सुनने वाले थे युधिष्ठिर.सुनाने वाले मार्कण्डेय. जगह थी काम्यक वन और जानने के इच्छुक आप!

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