ये गीत 1968 में आई फिल्म जुआरी का है. इस गीत को आवाज़ देने वाली मुबारक बेगम सोमवार को हमेशा के लिए सो गईं. वो मुबारक बेगम जिनकी आवाज़ सुनकर बिजलियां कौंध जाती हैं, दिल थम जाता है. 1950 से 1970 के बीच उनकी आवाज़ से हिंदी सिनेमा की गलियां रोशन थीं. उस दौर में शंकर-जयकिशन, खय्याम, एसडी बर्मन जैसे बड़े संगीतकारों के सुरों के साथ अपनी जादुई आवाज़ घोली. बेगम ने फिल्मों में गाना शुरू किया उस वक्त लता मंगेशकर भी अपने पैर जमाने शुरू कर रही थीं.

मुबारक बेगम, जयकिशन और रफी के साथ.
राजस्थान के चुरू जिले में एक कस्बा है सुजानगढ़. वहीं पर मुबारक बेगम का जन्म हुआ था. वहां से उनका परिवार अहमदाबाद चला गया. और फिर मुम्बई. बेगम के चाचा फिल्मों के शौकीन थे. और चाचा का शौक बेगम की दीवानगी बन गया. वो चाचा के साथ फिल्में देखने जाया करती थी. छोटी सी बच्ची फिल्में देखते-देखते सो जाती थी. लेकिन सुरैया की आवाज़ सुनी तो नींद ही उड़ गई. उसी के गाने दोहराती रहती.
बेगम ने गाने की तालीम रियाज़ुद्दीन खान से हासिल की थी. रियाज़ुद्दीन खान उस्ताद अब्दुल करीम खान के भतीजे हैं. अब्दुल करीम खान संगीत के किराना घराने से ताल्लुक रखते थे और उन्हें किराना घराने का वास्तविक संस्थापक भी माना जाता है.
गाने की शुरुआत: उनकी आवाज़ से उनके चाचा बहुत खुश थे. उनके कहने पर मुबारक के पापा उनको रेडियो पर गाने के लिए ले गए. वो ऑल इंडिया रेडियो के लिए गाने लगीं. उनकी आवाज़ तब के मशहूर संगीतकार रफ़ीक गज़नवी ने सुनी. तो उन्होंने मुबारक को अपनी फिल्म में गाने का ऑफर दिया.
घबराहट के मारे आवाज़ ही नहीं निकली: जब मुबारक बेगम रफ़ीक गज़नवी साहब के लिए गाने लगीं तो घबराहट के मारे उनके मुंह से आवाज़ ही नहीं निकली. इसके बाद दूसरी बार श्याम सुंदर जी ने उन्हें मौका दिया लेकिन यहां पर भी वो गा नहीं पाईं. उन्होंने पहला गाना गाया 1949 में. 13 साल की उम्र में. फिल्म थी 'आइए'. इस फिल्म के लिए उन्होंने दो गाने गाए थे. एक था 'मोहे आने लगी अंगड़ाई' और दूसरा उन्होंने लता मंगेशकर के साथ मिलकर गाया था 'आओ चले चलें वहां'.
जिस फिल्म से मुबारक की गायकी ने उड़ान भरी वो थी दायरा. फिल्म के संगीतकार भी राजस्थान से ही थे. जमाल सेन. इस फिल्म में मुबारक ने 'देवता तुम हो मेरा सहारा' गाना गाया था. बहुत ही प्यारा गाना है. जैसे रेगिस्तान की किसी शांत अंधेरी रात में किसी रेत के टीले पर से कोई आवाज़ आ रही हो हौले-हौले. और आप खोते जाएंगे आवाज़ में. इस गाने में उनके साथ मोहम्मद रफी भी हैं.मुबारक बेगम पढ़ना-लिखना नहीं जानती थीं. काफी साल पुराना एक किस्सा है उनका कि एक बार बप्पी लाहिड़ी ने उनको गाने के लिए बुलाया. जब मुबारक आईं तो पहले उन्हें धुन सुनाई और फिर गाने के बोल लिखा कागज उनको पकड़ा दिया. मुबारक बोलीं - मुझको पढ़ना तो आता नहीं है. बप्पी दा हैरान रह गए. पूछा बिना पढ़े कैसे गा लेती हो? बेगम ने कहा कि दिल से याद करके. ये दिल पर उकेर कर गाने वाली आवाज़ें थीं, जो दिल में उतर जाती हैं.
अपनी प्रसिद्धि के दिनों में वो इंडस्ट्री की राजनीति की शिकार हो गईं. उनके गाने किसी और से गवा लिए गए. वो कहती थीं कि फिल्म 'जब-जब फूल खिले' का गाना 'परदेशियों से अंखियां ना मिलाना' उनकी आवाज़ में रिकॉर्ड किया गया था. लेकिन जब रिकॉर्ड आया तो उनकी जगह लता मंगेशकर की आवाज़ थी.बाद के दिनों में उन्होंने बहुत ही खराब हालात में ज़िंदगी गुजारी. बेटी और पति की मौत हो गई. मुंबई के जोगेश्वरी में एक बेडरूम वाले मकान में रहती थीं. ये मकान भी इंडस्ट्री के कुछ लोगों ने मदद करके दिलवाया था. जिसका पैसा चुकाने के लिए उन्हें बहुत मुश्किलें झेलनी पड़ीं. उनका बेटा टैक्सी ड्राइवर है. महाराष्ट्र सरकार से उन्हें 700 रूपए मासिक पेंशन मिलती थी. जब बेटी बीमार थी, तब सारा खर्च उसी के इलाज में चला जाता था.
उनके कुछ चाहने वाले वक्त-वक्त पर उनकी मदद करते रहते थे. राजकुमार केसवानी लिखते हैं कि जब मुबारक बेगम को यह पता चला कि वो भोपाल से हैं तो उन्होंने बताया कि भोपाल के एक संगीत रसिक हैं जो छोटी-सी हलवाई की दुकान चलाते हैं. अपनी हैसियत के अनुसार उनकी मदद करते रहते हैं. इस तरह उनकी गुजर-बसर हो रही थी.उनके इलाज में मदद के लिए सरकारी चिट्ठी कई दिनों तक मंत्रालयों में ही घूमती रही. कुछ लोगों ने मदद भी की. लेकिन जिसने इतने प्यारे-प्यारे गाने दिए उसके साथ कभी ज़िंदगी ने इंसाफ नहीं किया. उन्होंने गाया था कि कभी तन्हाइयों में यूं हमारी याद आएगी, अंधेरे छा रहे होंगे बिजली कौंध जाएगी. लेकिन अंधेरों और तन्हाइयों में जीते हुए 76 साल की उम्र में वो अलविदा कह गईं हमेशा के लिए.
उन्होंने आखिरी बार 1980 में फिल्म 'रामू है दीवाना' के दो गाने गाए थे. 'सांवरिया तेरी याद में' और 'आओ तुझे मैं प्यार करूं'.
उन्होंने बहुत सारी फिल्मों में गाने गाए. उनके कुछ गाने-





















