दी लल्लनटॉप शो नियमित रूप से देखते होंगे तो आपको एक घटना ज़रूर याद होगी. मध्यप्रदेश वन विभाग में एक डिप्टी फॉरेस्ट रेंजर राम सुरेश हैं. हमने 13 जनवरी को अपने शो में आपको इनके बारे में बताया था.
डिप्टी रेंजर साहब के विभाग ने 10 जनवरी को छापा मारकर अवैध उत्खनन करती ट्रैक्टर ट्रॉली और जेसीबी को पकड़ा. 11 जनवरी की रात शिवराज सिंह कैबिनेट में संस्कृति और पर्यटन मंत्री ऊषा ठाकुर तीन दर्जन समर्थकों के साथ वन विभाग के दफ्तर पहुंचीं और वहां मौजूद सरकारी कर्मचारियों को डरा धमकाकर जेसीबी और टैक्टर-ट्रॉली छुड़ा ले गईं.
डिप्टी रेंजर साहब पुलिस थाने पहुंचे तहरीर लिखाने, जहां एफआईआर नहीं हुई. वन मंत्री ने कहा कि हम जांच कराएंगे. एक हफ्ता बीत जाने के बाद खबर आई है कि डिप्टी रेंजर साहब को उनकी हिम्मत और ईमानदारी का पुरस्कार मिल गया है. और वो भी उम्मीद के मुताबिक. डिप्टी फॉरेस्ट रेंजर राम सुरेश का ट्रांसफर कर दिया गया है. सूचना समाप्त. अब सुर्खियों की ओर चलते हैं. कोरोना वैक्सीन की सेफ़्टी पर बहस देश में वैक्सीनेशन अभियान का आज पांचवा दिन है. मंगलवार तक देश में 4 लाख 54 हजार 49 लोगों को कोरोना वैक्सीन लग चुकी है. स्वास्थ्य मंत्रालय के डेटा के मुताबिक तीन दिन में 580 लोगों में वैक्सीन लगने के बाद प्रतिकूल प्रभाव देखने को मिले हैं. इनमें से केवल 7 लोगों को अस्पताल में भर्ती करना पड़ा. 2 लोगों को डिस्चार्ज कर दिया है जबकि 5 लोगों को अस्पताल में निगरानी में रखा गया है. परसो यानी 18 जनवरी को कर्नाटक के बेल्लारी में 43 साल के नागार्जुन की मौत हो गई थी. नागार्जुन 16 जनवरी को वैक्सीन लेने वालों में शामिल थे. उनकी मौत की वजह हार्ट अटैक बताई जा रही है. नागार्जुन की मौत पर कर्नाटक के स्वास्थ्य मंत्री ने कहा कि हार्ट अटैक वैक्सीन की वजह से नहीं हुआ है. मीडिया के मित्रों से रिक्वेस्ट है कि वे इसे वैक्सीन से न जोड़ें. उन्होंने शनिवार को वैक्सीन ली थी और तब उन्हें कोई परेशानी नहीं थी. तमिलनाडु के मुख्यमंत्री पलानीस्वामी की मोदी-शाह से मुलाकात हां. पलानीवामी पहले सोमवार शाम को उन्होंने गृह मंत्री अमित शाह के साथ मिले, फिर अगले दिन नरेंद्र मोदी से. बैठक की वजह ये बताई गई थी कि पलानीस्वामी प्रधानमंत्री को चेन्नई में बने जयललिता मेमोरियल और कुछ अन्य सरकारी योजनाओं के उद्घाटन का निमंत्रण देने आए हैं. लेकिन इस मुलाकात को अप्रैल-मई में होने वाले विधानसभा चुनावों से जोड़कर देखा गया. अगले हफ़्ते शशिकला नटराजन बेंगलुरु की जेल से रिहा हो रही हैं. शशिकला नटराजन तमिलनाडु की पूर्व सीएम जयललिता की करीबी रही हैं और AIADMK में जयललिता के दौर में वो नंबर टू मानी जाती थीं.
जयललिता के बाद संभावित मुख्यमंत्रियों में भी उनका नाम था और कहते हैं कि मौजूदा सीएम पलानीस्वामी को मुख्यमंत्री बनवाने वाली भी वो ही थीं.
कहा जा रहा है कि बीजेपी और अमित शाह के सहयोग से पलानीस्वामी अपने खिलाफ बगावत को दबाने में कामयाब रहे. इसलिए अब पलानीस्वामी और अमित शाह इस स्ट्रैटजी पर काम कर रहे हैं कि एंटी-डीएमके वोटों को बंटने ना दिया जाए. और उसके लिए जरूरी है कि शशिकला और दिनाकरन जैसे AMMK के नेता वापस AIADMK में शामिल हों. पलानीस्वामी की दिल्ली वाली बैठकों में इस पर चर्चा हुई होगी ये अनुमान लगाया जा रहा है. हालांकि पीएम मोदी से मिलने के बाद पलानीस्वामी ने कहा है कि उन्होंने राजनीति पर कोई चर्चा नहीं की. शशिकला के सवाल पर भी उन्होंने कहा कि उन्हें पार्टी में शामिल नहीं किया जाएगा. किसान आंदोलन पर देश में क्या-क्या हुआ? सुप्रीम कोर्ट की बनाई कमेटी की आज पहली बैठक हुई. दिल्ली के इंडियन एग्रीकल्चर रिसर्च इंस्टीट्यूट (पूसा इंस्टिट्यूट) में साढ़े 11 बजे से पौने एक बजे तक बैठक चली जिसमें. अशोक गुलाटी, अनिल घनवत और प्रमोद जोशी शामिल हुए. कमेटी के चौथे सदस्य भूपेंद्र सिंह मान पहले ही कमेटी छोड़ चुके हैं. कमेटी के सदस्यों ने कहा कि वो सुप्रीम कोर्ट के आदेश अनुसार सभी पक्षों से मिलेंगे. किसान संगठनों, केंद्र सरकार और राज्य सरकारों से मिलेंगे. 21 जनवरी को किसानों के साथ पहली मुलाकात करेंगे. ये बात भी आई कि कमेटी एक वेबसाइट बनाने की सोच रहे हैं जहां सारी जानकारी पब्लिक के लिए रखी जा सके.
एक अखबार के मुताबिक इस एफआईआर में लिखा है कि सिख फॉर जस्टिस संगठन एनजीओ के ज़रिए खालिस्तानी समर्थकों को फंड भेज रहा है जिसका इस्तेमाल भारत सरकार के खिलाफ प्रोपगेंडा फैलाने में इस्तेमाल हो रहा है. इसी केस में एआईए नोटिस भेजकर पूछताछ के लिए लोगों को बुला रही है. इसमें एक नाम जसबीर सिंह रोड भी हैं, जिन्हें जरनैल सिंह भिंडारावाले का भतीजा बताया जाता है और वो दिसंबर से ही किसान आंदोलन में सक्रिय है. किसान आंदोलन से जुड़े और भी लोगों को अब तक नोटिस भेजे जा चुके हैं. इनमें पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता भी शामिल हैं. इस जीत को एक सबक़ की तरह ज़ेहन में नत्थी कर दीजिए एक अंग्रेज़ी फ़िल्म है. सच्ची घटनाओं पर आधारित. Unbroken. ये एक अमेरिकी सैनिक की कहानी है. नाम लुई ज़ैम्परिनी. एक समय के ओलंपियन. फिर सेकेंड वर्ल्ड वॉर में जंग के मैदान में गए. एक रोज़ उनका प्लेन क्रैश हो जाता है. 47 दिनों तक वीरान समंदर से लड़ाई. इस मुसीबत के आगे जापानी थे. अगले ढाई बरस तक बेइंतहा टॉर्चर. क़तरा-क़तरा बिखर जाने की हद तक टूटन. बेसाख़्ता अपमान.
वो इन सबसे जूझते हैं. टकराते हैं. ख़ुद को समेटते हैं. और, अंत में जीत कर बाहर निकलते हैं. साबुत. इस दौरान जो चीज़ उन्हें बचाए रखती है. वो एक पंक्ति थी. जो उन्हें विरासत में मिली थी, ओलिंपिक में जाने के दौरान. क्या?
Unbroken फ़िल्म का पोस्टरOne moment of pain is worth a lifetime of glory. पीड़ा से भरा एक पल जीवन भर का यश लेकर आता है.
ये पंक्ति एक बार फिर चरितार्थ हुई है. किसी युद्धभूमि में नहीं. किसी टॉर्चर कैंप में नहीं. बल्कि क्रिकेट के मैदान में. एक अभेद्य क़िले को भेद दिया गया है. एक ऐसी टीम के द्वारा, जिसकी काबिलियत शुरुआत से ही सवालों के घेरे में थी. क्रिकेट की बारिकियों के उस्ताद भविष्यवाणियां कर बैठे. अपने कहे को पत्थर पर लिख दिया. ताकि मिटाने की गुंज़ाइश न बचे. उन्होंने रेस शुरू होने से पहले ही विजेता का ऐलान कर दिया था. उनका दावा कतई ग़लत नहीं लगा. पहला टेस्ट. एडिलेड ओवल का मैदान. समानांतर चल रही भारतीय टीम अचानक से बेपटरी हो गई. दबाव हावी हुआ. 36 के स्कोर पर पूरी टीम आउट हुई. टेस्ट क्रिकेट के इतिहास का एक अनचाहा रिकॉर्ड अपने नाम दर्ज़ किया. पहले ही मैच में आठ विकेट की हार. मानो समंदर में उतरी नाव के रास्ते में अचानक तूफ़ान आ गया हो.
शुभमन गिल. फोटो: APडगमगाहट भरे सफ़र में कप्तान ने भी साथ छोड़ दिया. विराट कोहली को वापस लौटना पड़ा. झटके यहीं नहीं रुके. कोहली के बाद मोहम्मद शमी भी वापस लौटे. चोटिल होकर. ये सिलसिला आखिर तक चला. जब सीरीज़ का चौथा टेस्ट शुरू हुआ, भारतीय टीम की लगभग पूरी फ्रंटलाइन मैदान छोड़ चुकी थी. कोहली से लेकर रविंद्र जडेजा, जसप्रीत बुमराह, रविचंद्रन अश्विन तक. अश्विन, जिन्हें चुनौती मिली थी. विपक्षी खेमे के सेनापति से. बतौर धमकी. ‘See you at Gabba’. ‘गाबा में देख लेंगे’. ये दमखम उस आंकड़े से उपजा था. जिसमें सिमटा था 33 वर्षों का इतिहास. जिसके मुताबिक, टेस्ट क्रिकेट में ऑस्ट्रेलिया को गाबा मे हराना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है.
सीरीज़ का चौथा टेस्ट. ब्रिसबेन क्रिकेट ग्राउंड. ये मैदान वूलॉनगाबा इलाके में है. इसलिए, पॉपुलर कल्चर में इसे गाबा भी कहते हैं. सख़्त पिचें, कंपा देने वाली तेज रफ़्तार गेंदें और जबरदस्त उछाल यहां की खासियत रहे हैं. ऑस्ट्रेलिया के पास इसके साधक थे. पैट कमिंस, जोश हेज़लवुड और मिचेल स्टार्क. ये तिकड़ी अभी के समय में सबसे खतरनाक मानी जाती है. भारत की पहली पारी में इसका असर दिखा भी. 369 रनों के जवाब में बैटिंग 186 पर 6 विकेट. अब कमान थी दूसरा टेस्ट खेल रहे शार्दुल ठाकुर और डेब्यू कर रहे वॉशिंगटन सुंदर के हाथ. इन दोनों ने सबको हैरान कर दिया. रफ़्तार के बाजीगर बाज़ी हारते नज़र आए. ऑस्ट्रेलियाई टीम ध्वस्त होती दिखी. शार्दुल और सुंदर की पारी ने न सिर्फ भारत को संभलने का मौका दिया. बल्कि ये भी बताया कि वक़्त इंसान की परीक्षाएं लेने में कोई कसर नहीं छोड़ता. जो उसे पार कर लेते हैं, वो सही मायनों में लीडर होते हैं.
इस नौनिहाल टीम में हर किसी में ये जज़्बा दिखा. जब किसी की पतवार ढीली हुई, किसी दूसरे ने आकर थाम ली. संबल दिया. सफ़र को ढीला नहीं पड़ने दिया. मसलन, जब रोहित फिसले, शुभमन ने अपने कंधों पर जिम्मेदारी उठाई. पुजारा गए तो पंत ने आगे बढ़कर कमान संभाली. ये क्रम पूरे मैच में चला. सीनियरों ने भरोसा बंधाए रखा. कभी अकेला नहीं पड़ने दिया. मैदान के अंदर भी और ड्रेसिंग रूम में भी. गाबा टेस्ट या यूं कहें की पूरी सीरीज़ के दो झंडाबरदारों को याद रखिएगा. पहले हैं कप्तान अजिंक्य रहाणे. विपरीत परिस्थितियों में मिला भार. जब पूरा देश एक स्वर में टीम को कोस रहा था. उस दौर में रहाणे ने नेतृत्व का भार उठाया. सहज रहे. सौम्य रहे. अपने जियालों पर कायम रहे. उनका साथ दिया. उनके हौसलों को बरतते रहे. उन्हें संजोकर खर्च किया. सब अपनी गति में चला. उनकी उपलब्धि अब गूंज रही है.
भारतीय टीम के हेड कोच रवि शास्त्री और साथ में कप्तान अजिंक्य रहाणे. (स्क्रीनग्रैब: Instagram | indiancricketteam)दूसरा नाम होगा नई प्रतिभाओं का. जिन्हें यकायक जंग के बीच में उतारा गया. उन्होंने अपने होश नहीं खोए. वे बरकरार रहे. हर मुश्किल का डटकर सामना किया. चाहे वो स्टेडियम से आती घटिया टिप्पणियां हों या विरोधी पाले से हुई स्लेजिंग. वे दबे नहीं. वे बिखरे नहीं. वे टूटे नहीं. उन्होंने अपना कर्तव्य याद रखा. अपने पथ पर चलते रहे. और, नतीजा आपके सामने हैं. सारे ख़ूबसूरत विशेषण उन नौजवानों पर खर्च कर जाएं, फिर भी कम पड़ जाएगा. बॉर्डर-गावस्कर ट्रॉफ़ी को बरकरार रखने की उपलब्धि और आंकड़ों की बादशाहत से इतर भी हमें कई यादगार लम्हे मिले हैं. नए साल की उम्मीदों को स्वर देना इस सीरीज़ का सबसे बड़ा हासिल होगा. ये जीत हमारी असाधारण जीजिविषा का प्रतीक बनेगी. ये जीत हमारे धराशायी वर्तमान को उबरने की ताक़त देगी. इसे संजोना तो बनता है.
जाते-जाते एक तथ्य सुनते जाइए, चिड़ियों की एक प्रजाति है. आर्कटिक गीज़. ग्रीनलैंड के आस-पास उनका ठौर है. यहां जीवन दुसाध्य है. आर्कटिक गीज़ पहाड़ों पर अंडे देती हैं. जब चूजे दो हफ्तों के हो जाते हैं, उन्हें सैकड़ों फीट की ऊंचाई से नीचे गिरा दिया जाता है. अधिकतर नीचे पत्थरों से टकराकर दम तोड़ देते हैं. जो इस दुर्गमता को साध जाते हैं, उनके हिस्से आती है ज़िंदगी और आगे की दुनिया देखने का शऊर. नए छौनों ने अपने पंखों को साध लिया है. उनकी परवाज़ में निरंतरता है. उन्होंने आश्वस्ति दी है. उन्होंने सीना ठोक कर कहा है, ‘हम आंखों से सूरमा नहीं चुराते, आंखें ही चुरा लेते हैं.’
ये सब कितना सुंदर, कितना सुघड़, कितना जिम्मेदार लगता है. इस जीत की खुशबू को मन में बसा लीजिए. कच्ची मिट्टी पक रही है. जैसे-जैसे ये तपेगी, इसकी महक और सोंधी होती जाएगी. बेशक. सरहद पर जो हुआ उसके ज़िम्मेदार मोदी नहीं तो कौन? अब बात भारत चीन सीमा विवाद की. अप्रैल 2020 के बाद से ये मुद्दा आते ही ज़ेहन में लद्दाख आता था. 18 जनवरी के बाद से अरुणाचल प्रदेश आने लगा है. इस दिन NDTV की एक रिपोर्ट में दावा किया गया कि चीन ने अरुणाचल प्रदेश के उत्तर सुबनसिरी ज़िले में भारत की सीमा के अंदर साढ़े चार किलोमीटर घुसपैठ करके एक गांव बना दिया है. भारत और चीन के बीच अंतरराष्ट्रीय सीमा नहीं है, तो ये गांव वास्तविक नियंत्रण रेखा के इस तरफ बना हुआ बताया गया.
चैनल ने अपने दावे के समर्थन में दो सैटेलाइट तस्वीरें भी छापीं. अगस्त 2019 की तस्वीर में गांव नज़र नहीं आ रहा है. नवंबर 2020 में पूरा गांव बसा नज़र आता है जिसमें 101 घर हैं. आज सामरिक मामलों पर ओपन सोर्स इंटेलिजेंस जुटाने वाले ट्विटर हैंडल @detresfa_ ने NDTV की खबर में नज़र आ रहे गांव की हाई रेज़ोल्यूशन तस्वीरें जारी कर दीं. इसमें घाटी में एक नदी के किनारे ज़मीन समतल करके बनाए गए घर साफ नज़र आ रहे हैं. दूसरी तस्वीर में कुछ निर्माण होता दिख रहा है. इतना सब होने के बाद एक ही चीज़ बाकी थी - नेतागिरी. वो भी शुरू हो गई.
नेता अगर अपनी गलती मान ले तो उसे फिर नेता कहना संभव नहीं रह जाएगा. लेकिन इस बात पर गौर किया जाना चाहिए कि 1962 या उससे पहले चीन के हाथों मिली हार को 2021 में चीन के अतिक्रमण से मिलाकर देखना कितना सही है.
अगर देश 59 साल पहले ज़मीन हारा है, तो क्या उसे 2021 में भी वही करना चाहिए. रही बात तथ्यों की तो ये समझिए कि जहां चीन ने गांव बनाया है, वो इलाका 1959 से चीन के कब्ज़े में है. लेकिन गांव 2019 के बाद ही बना है. तो आप ये फैसला अपने हिसाब से कर सकते हैं कि इसमें गलती नेहरू से लेकर मोदी में से किसकी है या नहीं है. फिर हमारे सामने विदेश मंत्रालय का ये बयान भी आता है, जिसमें वो कहता है कि चीन ने वास्तविक नियंत्रण रेखा से लगे इलाके में निर्माण किया है. इस बयान में बड़ी सफाई से इस सवाल को ही उड़ा दिया गया है कि निर्माण LAC को लेकर भारत के दावे के अंदर हुआ है या बाहर.




















