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ऐ मुहब्बत जिंदाबाद! पहाड़ों पर जश्न का एक प्यारा अनोखा किस्सा

लक्ष्मी के पांव नहीं टिकते-2: 'देश में कितना कुछ अच्छा होता है, अकेले घूमके पता चला'

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फोटो: लक्ष्मी
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अकेले घूमने वाली लड़की. 25-26 बरस की लक्ष्मी कंवर चूड़ावत. बांसवाड़ा की पैदाइश. वड़ोदरा में पली बढ़ी. पिता फौजी. मां ने घर और बेटी को बनाया. एक लंबे चौड़े कोर्स (ह्यूमन डिवेलपमेंट एंड फैमिली स्टडीज) में मास्टर्स की डिग्री. महाराजा सय्याजी राव यूनिवर्सिटी ऑफ बड़ौदा से. पत्रकार रहीं. फिर टीचर बन गईं. और आखिर में तय किया कि घुम्मी ही करनी है. travel my ladies के नाम से दोस्तों संग कंपनी चलाती हैं. जिसके तहत सिर्फ महिलाओं और लड़कियों को ही घुमाने ले जाती हैं.
भटकने के दौरान जो तस्वीरें और किस्से बटोर लाती हैं. पिछली बार जब लक्ष्मी मनाली गई थी. नागा बाबा से मुलाकात हुई थी. आपने पढ़ा होगा.
अब लक्ष्मी मनाली से आगे निकल गई है. और एक किस्से की पोटली हमें लिख भेजी है. तस्वीरों के साथ वाली पोटली. पढ़िए्की दूसरी किस्त...



 
6 दिन मनाली में रुकने के बाद आगे बढ़ने का वक्त आया. मणिकरण जाने की कोई सीधी बस नहीं थी. इसलिए 11 बजे की बस ली भुंतर के लिए. बस का सफ़र बहुत सुहावना था. दायीं तरफ पहाड़ थे, जिनकी कटाई ऐसी लगती है जैसे किसी ने इनके ऊपर नकासी उकेरी हो. बाई बाजू ब्यास नदी के पानी का बदलता रंग. कुछ जगहों पर ये नीला तो कुछ पर हरा तो कुछ जगह मिट्टी के मिल जाने के कारण वो गहरा भूरा हो जाता.
फोटो: लक्ष्मी
फोटो: लक्ष्मी

मैं हमेशा कोशिश करती हूं कि ड्राइवर के उलटे हाथ के तरफ वाली सीट यानी पहली सीट पर बैठूं. इससे मैं दोनों तरफ भी देख पाऊं और रास्ते के फ़ोटो भी खींच पाऊं. और जब कहीं गाड़ी रुके तो ड्राइवर साहब से बातें कर पाऊं. मुझे जगहों, रास्तों और खाने के बारे में ज्यादातर बार इन्ही लोगों से पता चलता है. यही तो सबसे ज्यादा घूमते हैं.
करीब दो बजे भुंतर उतरी. वहां जैसे ही उतरी तो मणिकरण की बस भी मिल गई. और किस्मत से पहली सीट भी. मैं पार्वती वैली की तरफ पहली बार जा रही थी, तो दिमाग में एक खाली सलेट थी उस जगह की. रास्ता अलग था पानी कम सा था. पर घाटी की गहराई ज्यादा थी. रास्ता पेड़ों से गहरा होता जा रहा था. कुछ शाम के साढ़े 6 बजे बस ने मणिकरण उतारा. मैं ज्यादातर बार कोई भी जगह जाने से पहले वहां की तस्वीरें जरूर देख लेती हूं.
फोटो: लक्ष्मी
फोटो: लक्ष्मी

उस से मुझे अंदाज़ा रहता है कि यही वह जगह है, जहां मुझे जाना है. मणिकरण और पार्वती वैली के बारे में कुछ दोस्तों से पहले सुन रखा था तो वैसे भी थोड़ा पता था. मणिकरण वैसे वहां के गुरद्वारे की वजह से ही बहुत जाना जाता है अब. हज़ार की संख्या में रोज वहां पर लोग आते हैं. फिर चाहे वो सिख हो, हिन्दू हों या मुस्लिम हों. मैंने रुकने के लिए गुरूद्वारे में सोच रखा था. मनु एक दोस्त है. उसने ही बताया था कि वहां रुको और गुरद्वारे के संचालक से भी मिलो. मेरे लिए जगहों से ज्यादा लोगों से मिलना मज़ेदार होता है. तो जैसे ही पहुंची, बात-वात हुई. कमरा लिया और नहाने चली गई.
फोटो: लक्ष्मी
फोटो: लक्ष्मी

मणिकरण में भी मनाली के वशिष्ठ मंदिर की तरह गरम पानी निकलता है. और एक नहीं चार पांच जगह कुंड हैं. अब क्योंकि शाम हो चुकी थी और गरम पानी के कुंड के पास मैं अकेली थी. इसलिए मन में कुछ डर सा आ रहा था कि क्या अभी यूं अकेले यहां रुकना ठीक है. पर मन बलवान हुआ और फैसला हुआ डर पर जीत पाने का. उस स्नान के बाद मैंने अपने आप को अंदर से थोड़ा और मजबूत पाया.
अकेले घूमने से ज्यादा जरूरी होता है, किसी जगह पर वो कर पाना जो मन चाहे और कर सकें.
अगले दिन सुबह घूमते हुए बाजार के आखिरी छोर पर पहुंची, तो ब्रिज पार करके जंगल की तरफ जाने को मन हुआ. थोड़ी दूरी पर कुछ आदमी बड़े-बड़े बर्तनों में खाना बना रहे थे और पहाड़ी गाने बहुत ज़ोरो से बज रहे थे. मन हुआ कि जानूं कि क्या जश्न चल रहा है.
फोटो: लक्ष्मी
फोटो: लक्ष्मी

तो रसोइये ने कहा, 'शादी हो रही है अंदर, फिर तो और ज्यादा मन हुआ कि अंदर जा कर पहाड़ी शादी देखी जाए. जैसे ही पूछा कि क्या मैं भी देख सकती हूं तो उन्होंने तो हाथ पकड़ कर अंदर बिठा दिया और खूब खुश भी हुए.
फोटो: लक्ष्मी
फोटो: लक्ष्मी

एक 17 अठारह साल की लड़की सुंदर लाल सलवार सूट में नज़रें झुकाए बैठी थी. मुझे देख कर नमस्ते कहा और फिर नज़रें थोड़ी नीचे कर ली. मैंने पूछा, शादी हो गयी या होगी? एक महिला ने मुस्कराकर कहा, 'शादी इन दोनों ने पहले ही कर ली थी.' आज तो गांव का खाना है. बात कुछ समझ नहीं आई तो मैंने उन महिला से पूछा कैसे, समझ नहीं पा रही हूं मैं. वो मुस्कुराईं और लड़की के बाजू में बैठे लड़के से बोली बताओ तुमने शादी कैसे की?
तब मेरा ध्यान गया, जो एक दम सिंपल सी जीन्स, शर्ट और हिमाचली टोपी लगा कर बैठा है, वो दूल्हा है. उसके भी हाथों में गहरी मेहंदी और लाल नेल पॉलिश लगी थी. वो हल्का सा मुस्कुराया और लड़की को बोला कि तुम बताओ. लड़की भी शरमाई और बोली हम ने भागकर जम्मू जाकर शादी की है. जब वो बोली तो उसकी बोली मुझे थोड़ी अलग लगी. मैंने पूछा- भागे क्यों?
फोटो: लक्ष्मी
फोटो: लक्ष्मी

लड़के ने कहा, 'हमारे यहां भाग कर शादी बहुत लोग करते हैं. मेरे मां बाप राज़ी थे पर लड़की के बाप को मैं पसंद नहीं था. क्योंकि ये नेपाली है और मैं जम्मू से हूं. और इसका बाप इसकी शादी कोई नेपाली लड़के से करना चाहता है. मैं टैक्सी चलता हूं. और गांव के ऊपर वाले हिस्से की तरफ इसका घर है. जहां ये अपनी दो बहनों के साथ रहती है. इसकी मां कुछ साल पहले बीमार होने की वजह से मर गई थीं और इसका बाप और भाई चंडीगढ़ में काम करते हैं. वो बिल्कुल नहीं माने तो हम दोनों भाग गए और जम्मू जहां मेरा गांव है, वहां जा कर शादी करके आ गए वापस और इसके पिता और भाई गुस्सा होने के कारण आज यहां आए भी नहीं.

'मुझे ये पसंद है. और मेरे घरवालों को भी ये पसंद है. तो हम भाग गए.'

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और ये सुनकर लड़की के साथ कमरे में बैठे सब लोग हल्के से हंस दिए. मेरे पीछे बैठी महिला उस लड़के की मां थी, जिनके चार और लड़के हैं. ये सबसे बड़ा वाला है. थोड़ी देर में लड़की की दोनों बहनें भी आ गईं.
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नेपाली लड़कियां जब भारतीय तरीके से तैयार होती हैं तो ये सोचना मुश्किल होता है कि ये किसी दूसरे देश की होंगी. पर जब उन्होंने अपनी बहन से नेपाली में बात की तो एहसास हुआ कि ये तीनों बहन नेपाली ज्यादा अच्छे से बोलती हैं.
बजाए हिंदी के. मैंने लड़के से पूछा कि तुम इसकी भाषा समझते हो? तो उसने कहा कि मैं इसकी भाषा समझता हूं और वो मेरी. पर हम बोलते हैं अपनी भाषा में. ये ज्यादा आसान है हम दोनों के लिए.
उनको इस तरह दो तीन घंटे ऐसे ही कमरे में बैठे रहना था, क्योंकि उस दौरान गांव की दूसरी औरतें आती हैं, जो या तो जोड़े के लिया कपड़ा लाती या रुपया की माला या कुछ रुपये हाथ में दे देती. इस से उनकी शादी हो गई है. ये पूरे गांव के लोगों को पता चल जाएगा. और जो खाना दूसरों की शादी में खाया है, उसे लोगों को वापस खिला कर उस सामाजिक फॉर्मेलिटी से भी छुटकारा मिल जाता है.
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सुनने में एकदम सीधा लगा पर थोड़ा सोचा तो एहसास हुआ कि गांव को खाना लड़के का परिवार दे रहा है. लड़की के पिता और भाई चंडीगढ़, जहां वो काम करते है, वहां से अपनी बेटी की शादी में नहीं आए. पर जितने लोग उनको मिलने आए, वो बहुत खुश थे. थोड़ा सोचा और बात करी तो पता चला कि इस तरफ के हिस्से में यहां पर बहुत शादियां यूं ही होती हैं. अगर लड़का और लड़की एक दूसरे को पसंद करने लगे और प्यार हो जाये, तो वो घर वालों को बता देते हैं. और भागकर शादी कर लेते हैं. अब भागकर शादी करने से उन्हें हर किसी की रजामंदी नहीं लेनी पड़ती और वापस आकर सब बहुत प्यार से उन्हें अपना लेते हैं.
लड़के की मां बहुत खुश थी और लड़की की तरफ उसका ध्यान ज्यादा था. और लड़के का परिवार तीनों लड़कियों पर बहुत ध्यान दे रहा था. ये देखकर लगा, जैसे भारत में प्यार को भी तो कितने प्यार से अपना लेते हैं. उनकी कुछ तस्वीर खींची और फिर उन्हें बाय-बाय किया. पूरे परिवार ने जिद्द करी  कि मैं खाना खाकर जाऊं. पर मेरे पास बहुत वक्त नहीं था इसलिए मैंने कहा- कभी और पक्का आऊंगी. वापस आ कर सोचा कि मेरे देश में कितना कुछ अच्छा होता है. कितनी सादगी से लोग अपने जीवनसाथी को चुन लेते हैं और परिवार कितना प्यार देते हैं. मुझे आदत हो गई है कि सब कुछ अच्छा देखने की.
फोटो: लक्ष्मी
फोटो: लक्ष्मी
हां माना होता है थोड़ा बुरा भी ज़माने में कौन कहता है सब कुछ पाक है ज़माने में मेरी नज़र क्या देखेगी ये तो है मेरे नज़राने में फिर क्यों बुरा ढूंढ़ती फिरुं ज़माने में

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