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साउथ कोरिया: यहां तो कूड़ा-कचरा पैदा करने के भी पैसे लगते हैं

'कोरिया कागज' लेकर आए हैं सत्यांशु. पहली किस्त में बात वहां की सफाई की.

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फोटो - thelallantop
Satyanshu

साउथ कोरिया. यहां से लगभग पांच हजार किलोमीटर दूर. कोरिया हमारे लिए क्या है? सैमसंग और किमची? वो जगह जहां के मर्द भी मेकअप में खूब हाथ आजमाते हैं. लेकिन अब कोरिया को और पास से जानने का मौक़ा है. सत्यांशु दी लल्लनटॉप के दोस्त हैं. JNU के कोरियाई अध्ययन केंद्र में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं. अभी कोरिया फ़ॉउंडेशन रिसर्च फेलो के तौर पर सौउल नेशनल यूनिवर्सिटी, साउथ कोरिया में काम कर रहे हैं. कोरियाई साहित्य और अनुवाद इनकी रिसर्च के सब्जेक्ट्स हैं. घूमने-फिरने, तस्वीरें लेने और क्रिकेट​ में दिलचस्पी रखते हैं. सत्यांशु हमारे लिए कोरिया के हाल लिख भेजेंगे. क्योंकि चिट्ठी साउथ कोरिया से आनी है सो नाम रहेगा कोरिया कागज. आज पढ़िए पहली किस्त.


तो बात है सन 2004 की जब हम पहली बार साउथ कोरिया पहुंचे. लैंड करते ही ये फीलिंग आने लगी कि भैया किसी बढिया साफ़ सुथरी एडवांस्ड कंट्री में आएं हैं. सुना पढ़ा तो पहले से था ही कोरिया के बारे में देखा पहली बार था. एयरपोर्ट से यूनिवर्सिटी की डॉरमिटरी तक का रास्ता एकदम सपने जैसा, बस की खिड़की से नज़र ही नहीं हटी समझो. तब से लेकर अब तक करीब 8-9 साल बिता चुका हूं कोरिया में और अब एकदम सेकंड होम वाला हिसाब है. बहुत खूबियां हैं इस छोटे से देश में पर आज बात कोरिया के वेस्ट मैनेजमेंट और रिसाइक्लिंग की. क्योंकि इसमें बहुत आगे है कोरिया और हम लोग भी आजकल स्वच्छता अभियान चला ही रहे हैं इंडिया में.
प्राकृतिक संसाधनों को लेकर लड़ाई मची पड़ी है दुनिया भर में. बताया जा रहा है कि इस ग्रह के एक तिहाई से ज्यादा प्राकृतिक संसाधन तो हमने पिछले 3 दशकों में ही निबटा दिए हैं. (पॉल हॉकेन, एमोरी लोविंस एंड एल. हंटर लोविंस, नेचुरल कैपिटलिज़्म, 1991) अब जो बचा है उसे लेकर पर्यावरणविदों का चिंतन और UN में घमासान दोनों चल ही रहा है. ऐसी अंधकार की स्थिति में कोरिया एक जलते हुए दिए की तरह हमें कुछ ज्ञान की बात समझा रहा है. समझ सको तो समझो.
रिसाइक्लिंग रेस में कौन सबसे आगे है उस पर फोर्ब्स ने OECD देशों की एक लिस्ट जारी की थी, खुद ही देख लो साउथ कोरिया किस नंबर पे है.
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1980 से 2000 के बीच आर्थिक विकास के साथ साथ कोरिया में वेस्ट जनरेशन भी काफ़ी बढ़ा. पॉपुलेशन डेंसिटी बहुत अधिक थी और कचरा भराव क्षेत्र (लैंडफ़िल) कम. ऐसे में इन्होंने तिकड़म लगाई और 'वॉल्यूम बेस्ड फ़ी सिस्टम' यानि भार के हिसाब से शुल्क देने वाला सिस्टम 1995 में इंट्रोड्यूस किया. मतलब तुम फ्री में कूड़ा कचरा पैदा नहीं कर सकते, पैदा करोगे तो जो नियमित शुल्क है वो देना होगा. 'Producer pays' वाला हिसाब है.
क्या? कूड़ा करने के लिए पैसा देना पड़ेगा? बौराय गए हो का? किस बात का पैसा?

'वॉल्यूम बेस्ड फ़ी सिस्टम' काम कैसे करता है?

हम भी ऐसे ही भौचक्के हुए थे, पर फिर बात आई समझ में. आपको बता दूं की ये 'डूगना लगान' जैसा भारी नहीं है और सिर्फ नॉन-रिसाइक्लेबल वेस्ट पर ही लगता है. तो क्या है ये 'वॉल्यूम बेस्ड फी सिस्टम'? इन्होंने बनाई वॉल्यूम के हिसाब से कचरे की थैलियां. ये स्पेशल थैलियां प्राकृतिक तरीके से सड़नशील (बायोडिग्रेडेबल) है और कोरिया के हर स्टोर्स में उपलब्ध हैं.
10 लीटर से लेकर 100 लीटर तक के बैग मिलते हैं और दाम 300 वॉन से लेकर 3000 वॉन है. लगभग 15 से 150 रूपये तक समझ लो. कोरिया भारत से लगभग चार गुना महंगा है तो उस हिसाब से देखें तो थैली सस्ती ही है. और इन थैलियों में डालकर सामान नहीं फेंका तो कोई उठाएगा भी नहीं.  तो पहले तो रिसाइक्लेबल और नॉन-रिसाइक्लेबल वेस्ट को अलग अलग करना है और चूंकि नॉन-रिसाइक्लेबल वेस्ट को फेंकने में पैसे लगते हैं तो ये सिस्टम आपको प्रोत्साहित करता है की आप कम से कम नॉन-रिसाइक्लेबल वेस्ट प्रोड्यूस करें.
मतलब एक इकनोमिक इंसेंटिव भी है उसके लिए जो कम कचरा करे. 1985 में साउथ कोरिया का प्रति व्यक्ति प्रति दिन औसतन वेस्ट जनरेशन 4.85 पाउंड था जो कि 2010 तक घटकर 2.11 पाउंड ही रह गया है. और कोरिया के पर्यावरण मंत्रालय के 2010 के आंकड़ों की मानें तो सौउल 66% यानि दो-तिहाई कचरा रीसायकल करता है. जोकि दुनिया के लिए एक मिसाल है. मतलब ये तिकड़म काम कर गयी.
नॉन-रिसाइक्लेबल वेस्ट डिस्पोज़ल बिन
नॉन-रीसाइक्लेबल वेस्ट डिस्पोज़ल बिन

रिसाइक्लेबल वेस्ट डिस्पोज़ल बिन
रीसाइक्लेबल वेस्ट डिस्पोज़ल बिन

रीसाइक्लेबल कचरे के लिए भी एक सिस्टम है

ऐसे नहीं की कहीं भी कुछ भी फेंक दिया. अलग-अलग बिन हैं. ग्लास, प्लास्टिक, पेपर/कार्डबोर्ड, कैन, स्टायरोफोम, मैटल, फ़ूड वेस्ट आदि. कूड़ा फेकने जाता हूं तो 5-10 मिनट तो लग ही जाते हैं सब अलग-अलग करने में. इसी दौरान और लोगों से मुलाक़ात भी हो जाती है वरना आजकल स्मार्टफ़ोन की दुनिया में किसके पास टाइम है मिलने जुलने का?
सौउल में इसको लेके नियम बड़े सख्त हैं. सभी रिहाइशी जगहों के वेस्ट डिस्पोज़ल एरिया में कैमरे लगे हुए हैं. इधर-उधर फेंका तो पहले वार्निंग उसके बाद फाइन और फिर भी नहीं माने तो बाहर का रास्ता भी दिखाया जा सकता है आपको. शुरू-शुरू में तो बड़ी दिक्कत होती थी और पहले तो कूड़ेदान पर लेबल्स भी सब कोरियन में ही लिखे होते थे. हम तो फिर भी कोरियन पढ़ लेते थे मज़ा तो आता था अपने दूसरे इंडियन साथियों को देखने में जिन्हें कोरियन आती नहीं थी और मजबूरन हर बिन में झांक-झांक के कूड़ा फेंकना पड़ता था.
मेरी धर्मपत्नी की कहानी तो और भी मज़ेदार है, जब भी वो कूड़ा फेकने जाती थी एक बूढा सा आदमी उसका पीछा करता और वो बहुत डर जाती थी. एक दिन उसने छुपकर देखा तो पता चला कि वो आदमी उसी बिल्डिंग में काम करता था और कूड़ा अलग करके सही बिन्स में डालता था. अंग्रेजी न बोल पाने के कारण समझने में असमर्थ वो आदमी तो मदद करने के इरादे से ही आता था.
लोग यहां के सब नियम मानते हैं. और हर तरह से सफाई का ध्यान रखते हैं. चाहे वो घर हो या घर के बाहर की सड़क. एक किस्सा बताऊं आपको जो मेरे एक मित्र के साथ घटा. भाईसाब ने सिगरेट फूंक के फिल्टरफेंक दिया सड़क पे. तभी पीछे से निकल के आए एक अंकल, करीब 75 वर्ष के रहे होंगे. फिल्टरकी तरफ़ इशारा किया और फिल्टरउठा के ट्रैशबिन में डालने को कहा. दोस्त को लगा था किसी ने देखा नहीं होगा पर फिर अंकल को सॉरी बोला और फिल्टरउठा के ट्रैश बिन में डाला. इंडिया में कहां कोई ऐसे टोकता है? बहुत बड़ी सीख मिली उस दिन. खुद तो सीखा ही साथ ही ये सबक भी मिला की कम्युनिटी को भी विजिलेंट होना पड़ेगा तभी चारों तरफ साफ़ सफ़ाई रखी जा सकती है.

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