साहब अब 'कूल' नहीं, 'कायदे' में दिखेंगे. जी हां, हिमाचल प्रदेश की हसीन वादियों में अब सरकारी दफ्तरों का नजारा बदलने वाला है. अगर आप सोच रहे हैं कि दफ्तर में जींस और टी-शर्ट पहनकर 'कूल' लुक में काम निपटा लेंगे, तो जरा ठहरिए.
जींस पहनने से काम खराब होता है? हिमाचल के दफ्तरों में नए 'ड्रेस कोड' पर छिड़ी जंग!
हिमाचल प्रदेश सरकार ने सरकारी कर्मचारियों के लिए नया ड्रेस कोड लागू किया है. अब ड्यूटी पर जींस और टी-शर्ट पहनने पर रोक लगा दी गई है. जानिए किन 5 राज्यों में पहले भी ऐसा हो चुका है और क्या कहता है कानून.


आजतक की खबर के मुताबिक सुक्खू सरकार ने एक नया फरमान जारी किया है, जिसके बाद अब सरकारी कर्मचारियों के वॉर्डरोब से कैजुअल कपड़े दफ्तर के लिए 'आउट' हो गए हैं. आसान भाषा में कहें तो अब हिमाचल के सरकारी बाबू अपनी पसंद की जींस पहनकर फाइलें नहीं खंगाल पाएंगे. उन्हें 'प्रॉपर' फॉर्मल कपड़ों में ही ड्यूटी पर हाजिर होना होगा.
लेकिन क्या वाकई कपड़ों का काम की क्वालिटी से कोई लेना-देना है? या फिर ये अनुशासन के नाम पर वही पुराना चश्मा है जिसे प्रशासन समय-समय पर पहन लेता है? चलिए, आज 'लल्लनखास' में समझते हैं कि इस नियम के पीछे की कहानी क्या है और देश के बाकी राज्यों का इस पर क्या सोचना है.
क्या है हिमाचल सरकार का नया फरमान?
हिमाचल प्रदेश सरकार ने अपने सभी अधिकारियों और कर्मचारियों के लिए एक सख्त 'ड्रेस कोड' लागू कर दिया है. हिमाचल प्रदेश सामान्य प्रशासन विभाग (GAD) की इस अधिसूचना के मुताबिक, अब ड्यूटी के दौरान जींस, टी-शर्ट, स्पोर्ट्स शूज और किसी भी तरह के भड़कीले कपड़ों पर पाबंदी होगी.
‘द ट्रिब्यून इंडिया’ की रिपोर्ट के मुताबिक सरकार का तर्क है कि सरकारी दफ्तरों में एक गरिमा और अनुशासन होना चाहिए. जब कोई आम आदमी अपनी फरियाद लेकर दफ्तर आए, तो उसे पता चलना चाहिए कि वह किसी जिम्मेदार अधिकारी के सामने खड़ा है.
इस नियम का उल्लंघन करने वाले कर्मचारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की चेतावनी भी दी गई है. सरकार का मानना है कि 'कैजुअल' कपड़े वर्क कल्चर को भी कैजुअल बना देते हैं, इसलिए अब दफ्तर में सिर्फ शर्ट, पैंट या महिलाओं के लिए साड़ी और सूट जैसे औपचारिक कपड़े ही मान्य होंगे.
उन 5 राज्यों की कहानी, जहां ड्रेस कोड पर मच चुका है बवाल
हिमाचल प्रदेश अकेला ऐसा राज्य नहीं है जहां सरकारी बाबू लोगों के पहनावे पर 'कैंची' चली है. हकीकत यह है कि भारत के कई राज्यों में 'फॉर्मल बनाम कैजुअल' की यह जंग समय-समय पर सुलगती रही है. प्रशासनिक गलियारों में अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि जींस-टीशर्ट जैसे कपड़े दफ्तर की गंभीरता को कम कर देते हैं. आइए विस्तार से जानते हैं उन 5 राज्यों की कहानी, जहां ड्रेस कोड को लेकर न केवल फरमान जारी हुए, बल्कि उन पर भारी बवाल भी मचा.
बिहार: 'पिकनिक लुक' पर सरकार की सख्त चोटबिहार में ड्रेस कोड का मुद्दा तब चर्चा में आया जब राज्य सरकार ने सचिवालय के भीतर जींस और टी-शर्ट पहनने पर पूरी तरह पाबंदी लगा दी. सरकार के सामान्य प्रशासन विभाग ने तर्क दिया कि कर्मचारी अक्सर ऐसे कपड़े पहनकर दफ्तर आते हैं जो पेशेवर नहीं लगते, बल्कि ऐसा महसूस होता है जैसे वे पिकनिक मनाने आए हों.
बिहार सरकार के सामान्य प्रशासन विभाग के इस आदेश के बाद सोशल मीडिया पर बहस छिड़ गई थी कि क्या किसी कर्मचारी की कार्यक्षमता उसके कपड़ों से तय होती है? आलोचकों ने इसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर प्रहार बताया, जबकि प्रशासन इसे कार्यसंस्कृति में सुधार का नाम देता रहा.
उत्तर प्रदेश: जब डीएम ने कहा-'कायदे में रहिए, वर्ना जुर्माना भरिए'उत्तर प्रदेश में अनुशासन को लेकर अक्सर कड़े रुख अपनाए जाते रहे हैं. बरेली से लेकर लखनऊ तक, कई बार जिलाधिकारियों ने अपने स्तर पर जींस-टीशर्ट को दफ्तरों में बैन किया है.
'द टाइम्स ऑफ इंडिया' की एक रिपोर्ट के अनुसार, बरेली के एक पूर्व जिलाधिकारी ने तो यहां तक कह दिया था कि सरकारी कर्मचारी राज्य व्यवस्था का चेहरा होते हैं, अगर वे गरिमापूर्ण कपड़ों में नहीं दिखेंगे तो उन पर आर्थिक जुर्माना भी लगाया जा सकता है. यूपी के प्रशासनिक हलकों में जींस को 'अनुशासनहीनता' के चश्मे से देखा जाता रहा है.
महाराष्ट्र: जींस तो ठीक, 'चप्पल' पर भी लग गई रोकमहाराष्ट्र सरकार ने ड्रेस कोड को एक कदम आगे बढ़ाते हुए केवल जींस-टीशर्ट ही नहीं, बल्कि दफ्तर में 'स्लीपर्स' यानी चप्पल पहनकर आने पर भी आपत्ति जताई थी. राज्य सरकार द्वारा जारी गाइडलाइंस में स्पष्ट किया गया कि महिला और पुरुष कर्मचारी ऐसे कपड़े न पहनें जो भड़कीले हों या जिनसे सरकारी दफ्तर की छवि खराब होती हो.
महाराष्ट्र शासन का मानना था कि सरकारी कर्मचारी जनता के सेवक हैं और उनका व्यक्तित्व ऐसा होना चाहिए, जिससे जनता के बीच सरकार की एक गंभीर और जिम्मेदार छवि बने.
मध्य प्रदेश: टी-शर्ट पहनी तो कटेगी सैलरी और मिलेगा नोटिसमध्य प्रदेश में ड्रेस कोड का मामला तब और गंभीर हो गया जब कुछ संभागों में अधिकारियों ने टी-शर्ट पहनकर आने वाले कर्मचारियों की सैलरी रोकने या उन्हें कारण बताओ नोटिस जारी करने के आदेश दे दिए.
'दैनिक भास्कर' की एक खबर के मुताबिक, ग्वालियर संभाग में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग और महत्वपूर्ण बैठकों के दौरान टी-शर्ट पहनने को प्रोटोकॉल का उल्लंघन माना गया. यहां प्रशासन का तर्क बहुत सीधा था-दफ्तर काम करने की जगह है, फैशन शो की नहीं. इस सख्ती की वजह से कई बार कर्मचारी संगठनों और सरकार के बीच ठन भी गई थी.
कर्नाटक: महिलाओं और पुरुषों के लिए अलग-अलग नियमकर्नाटक में ड्रेस कोड का दायरा केवल पुरुषों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि महिला कर्मचारियों के लिए भी स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए गए. वहां की सरकार ने सचिवालय और अन्य सरकारी विभागों के लिए नियम बनाया कि पुरुष कर्मचारी शर्ट और पैंट पहनेंगे, जबकि महिला कर्मचारियों को साड़ी या चूड़ीदार सूट में ही दफ्तर आना होगा.
कर्नाटक राज्य सिविल सेवा नियमावली के तहत इस नियम के पीछे मंशा यह थी कि पूरे दफ्तर में एकरूपता दिखे और माहौल पूरी तरह से पेशेवर बना रहे. हालांकि, यहां भी आधुनिक सोच रखने वाले युवाओं ने इन नियमों को पुरानी विचारधारा का हिस्सा बताकर विरोध दर्ज कराया था.
इन पांचों राज्यों की कहानियां गवाह हैं कि भारत में 'जींस बनाम फॉर्मल' की यह बहस बहुत पुरानी है. हर राज्य ने अपने-अपने स्तर पर दफ्तर की गरिमा बचाने की कोशिश की, लेकिन सवाल आज भी वही खड़ा है-क्या कपड़े वाकई काम की क्वालिटी तय करते हैं?
फॉर्मल बनाम कैजुअल: क्या कहता है कानून और तर्क?
अब बात करते हैं उस बुनियादी और कानूनी सवाल की जो अक्सर ऐसी पाबंदियों के बाद खड़ा होता है. क्या सरकार को यह अधिकार है कि वह तय करे कि आप दफ्तर में क्या पहनेंगे?
क्या जींस पहनना वाकई अनुशासनहीनता है या यह केवल एक पुराना नजरिया है? आइए इस बहस के कानूनी और तार्किक पहलुओं को विस्तार से समझते हैं.
कानूनी पक्ष: क्या कहता है भारत का संविधान?भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) देश के हर नागरिक को 'भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' का अधिकार देता है. कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि व्यक्ति जो कपड़े पहनता है, वह भी उसकी अभिव्यक्ति का ही एक हिस्सा है.
लेकिन यहां एक पेंच है. जब आप एक 'पब्लिक सर्वेंट' यानी सरकारी कर्मचारी के तौर पर नियुक्त होते हैं, तो आप 'सर्विस रूल्स' (सेवा नियमावली) के दायरे में आ जाते हैं.
कानून की नजर में, यदि कोई सरकारी संस्थान अपने ब्रांड की गरिमा, कार्यक्षमता या अनुशासन बनाए रखने के लिए एक विशेष ड्रेस कोड या यूनिफॉर्म तय करता है, तो उसे मौलिक अधिकारों का उल्लंघन नहीं माना जाता.
अदालतें अक्सर यह मानती हैं कि सार्वजनिक सेवा में एक खास तरह का अनुशासन जरूरी है, ताकि जनता में प्रशासन के प्रति विश्वास बना रहे.
ड्रेस कोड के पक्ष में तर्क: प्रोफेशनलिज्म और स्पष्ट पहचानड्रेस कोड का समर्थन करने वाले प्रशासनिक अधिकारियों और विशेषज्ञों के पास अपने मजबूत तर्क हैं. प्रशासनिक सुधार और लोक शिकायत विभाग (DARPG) के वर्ककल्चर रिपोर्ट के मुताबिक ड्रेस कोड समर्थकों का मानना है कि औपचारिक पहनावा दफ्तर की कार्यसंस्कृति को गंभीर बनाता है.
पहला बड़ा तर्क प्रोफेशनलिज्म का है. समर्थकों का कहना है कि जब कर्मचारी फॉर्मल कपड़ों में होते हैं, तो वे मानसिक रूप से काम के प्रति अधिक केंद्रित महसूस करते हैं. यूनिफॉर्म या एक जैसा पहनावा पदानुक्रम (Hierarchy) और टीम भावना को बढ़ावा देता है.
दूसरा तर्क आम जनता की सुविधा से जुड़ा है. जब कोई ग्रामीण या आम नागरिक दफ्तर आता है, तो औपचारिक कपड़ों की वजह से वह आसानी से पहचान पाता है कि अधिकारी कौन है और कर्मचारी कौन. इससे दफ्तर के भीतर एक व्यवस्थित माहौल नजर आता है.
ड्रेस कोड के विपक्ष में तर्क: आराम और आधुनिक सोच की मांगदूसरी तरफ, एक बड़ा वर्ग ऐसा भी है जो ड्रेस कोड को गैर-जरूरी और पिछड़ी सोच मानता है. वैश्विक वर्क-कल्चर सर्वे और मनोवैज्ञानिक शोध रिपोर्ट के मुताबिक इस पक्ष का मानना है कि काम की गुणवत्ता कपड़ों से नहीं, बल्कि कर्मचारी की मानसिक स्थिति और स्किल से तय होती है.
विपक्ष का सबसे प्रमुख तर्क कंफर्ट यानी आराम का है. मनोवैज्ञानिकों और वर्क-कल्चर विशेषज्ञों का एक बड़ा समूह मानता है कि अगर कर्मचारी जींस या अपनी पसंद के आरामदायक कपड़ों में है, तो वह अधिक 'क्रिएटिव' और 'प्रोडक्टिव' हो सकता है.
बंद गले के कोट या टाइट फॉर्मल कपड़े गर्मी या लंबे काम के घंटों में बोझ बन सकते हैं. इसके अलावा, आलोचक इसे 'औपनिवेशिक मानसिकता' (Colonial Mindset) का अवशेष मानते हैं. उनका कहना है कि काम से ज्यादा दिखावे पर जोर देना अंग्रेजों के जमाने की रीत है, जिसे आधुनिक भारत में बदलने की जरूरत है.
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अदालती फैसलों का आधार: क्या कहता है सुप्रीम कोर्ट?ऊपर दिए गए पक्ष और विपक्ष के तमाम तर्क हवा-हवाई नहीं हैं. ये सभी बिंदु उन विभिन्न याचिकाओं और मुकदमों का हिस्सा रहे हैं, जो समय-समय पर देश की विभिन्न अदालतों और सुप्रीम कोर्ट के सामने आए हैं.
सर्वोच्च न्यायालय ने भी कई मामलों में टिप्पणी की है कि ड्रेस कोड तय करना प्रबंधन का विशेषाधिकार है, बशर्ते वह तर्कसंगत हो और किसी की व्यक्तिगत गरिमा को ठेस न पहुंचाता हो.
कुल मिलाकर, कानून व्यवस्था और व्यक्तिगत पसंद के बीच यह खींचतान काफी पुरानी है. हिमाचल का नया फैसला इसी कानूनी और तार्किक रस्साकशी का एक नया अध्याय है.
कपड़ों से काम सुधरेगा या सिर्फ दिखावा बढ़ेगा?हिमाचल सरकार का ये फैसला अनुशासन की दिशा में एक कदम हो सकता है, लेकिन असली चुनौती ये है कि क्या सिर्फ ड्रेस कोड बदलने से फाइलों की रफ्तार बढ़ेगी? जनता को कपड़ों से ज्यादा इस बात में दिलचस्पी है कि उनके काम समय पर हों और भ्रष्टाचार पर लगाम लगे.
खैर, अब देखना ये होगा कि हिमाचल के कर्मचारी इस 'टाई और शर्ट' वाले नए कल्चर को कितनी खुशी से अपनाते हैं या फिर ये विरोध की नई वजह बनता है.
वीडियो: लोकसभा, राज्यसभा और विधानसभा का कोई ड्रेस कोड है, या जो मन किया पहनके चले गए?




















