
होती क्या है ये कांवड़ यात्रा, कहां से आया इसका कॉन्सेप्ट
हिंदू कैलेंडर के सावन महीने में भगवान शिव को खुश करने के लिए भक्त एक यात्रा पर निकलते हैं. लकड़ी की एक पट्टी के दोनों किनारों पर बांस से बनी टोकरियां बांधी जाती हैं. टोकरियों के अंदर घड़े या कलश में गंगाजल रखा जाता है. इसे कांवड़ कहते हैं. शिव-भक्त अपनी मनौती के मुताबिक एक ऐसी जगह तय करते हैं, जहां से गंगाजल मिल सके. वो इस कांवड़ को कंधे पर रखकर वहां तक जाते हैं और कलश में गंगाजल लेकर वापस आते हैं. फिर वो इसे उसी शिवलिंग पर चढ़ाते हैं, जहां उन्होंने मनौती मांगी थी.
कांवड़ का मूल शब्द 'कावर' है, जिसका मतलब कंधे से है. भक्त कांवड़ को अपने कंधे पर रखकर चलते हैं, इसीलिए इन्हें कांवड़िया नाम मिला. कांवड़ को कंधे के अलावा कहीं और नहीं रखा जा सकता. कुछ कांवड़ यात्रा खरमास या पुरुषोत्तम मास में भी की जाती हैं. वैसे तो शिव ज्योतिर्लिंग पर ही जल चढ़ाने की मान्यता है, लेकिन कुछ लोग जल लाकर शिवालयों पर भी पूजा-अर्चना कर लेते हैं.

शुरू किसने की थी ये कांवड़ यात्रा
कहा जाता है कि रावण पहले कांवड़िया थे. भगवान राम ने भी शिव को कांवड़ चढ़ाई थी. आनंद रामायण में जिक्र है कि राम ने कांवड़िया बनकर सुल्तानगंज से जल लिया और देवघर के बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग का अभिषेक किया. एक मान्यता ये भी है कि परशुराम ने भगवान शिव की पूजा करने के लिए पुरा महादेव में मंदिर की स्थापना की और कांवड़ में गंगाजल लाकर इस परंपरा की शुरुआत की. ये मंदिर उत्तर प्रदेश में मेरठ ज़िले के पास है.
अश्वमेध यज्ञ जितना फल: भक्तों की ऐसी-ऐसी हैं मान्यताएं
- भोले भंडारी का फेवरेट मंथ सावन है. इसमें शिव पर गंगाजल चढ़ाने से उन्हें शीतलता मिलती है.
- कहते हैं कांवड़ यात्रा भक्तों को भगवान से जोड़ती है. इससे मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं.
- कांवड़ पर वैदिक अनुष्ठान के साथ गंगाजल का भार पिटारियों में रखा जाता है.
- मान्यता ये भी है कि जब समुद्रमंथन से निकले विष को पीकर भोलेनाथ ने दुनिया बचाई थी, तब से उन पर विष के प्रकोप को कम करने को उनका जलाभिषेक किया जाता है.
- भक्त मानते हैं कि यात्रा के हर कदम पर अश्वमेध यज्ञ करने जितना फल मिलता है.

कहां से कहां तक होती है यात्रा
इसका कोई तयशुदा नियम नहीं है. बस जल किसी शिवालय पर चढ़ाना होता है. हालांकि, ज्योतिर्लिंग पर जल चढ़ाने का ख़ास महत्व है. लोग कानपुर, बिठूर, बनारस या हरिद्वार से जल लेते हैं और फिर बैद्यनाथ (झारखंड) या महादेवा-लोधेश्वर (बाराबंकी) में चढ़ाते हैं.
कांवड़ियों का वर्जन क्या है
नवाबगंज से दो बार कांवड़ यात्रा पर जा चुके आनंद बताते हैं कि उन्हें बचपन से ये यात्रा बेहद रोचक लगती थी, इसलिए उन्होंने भी इसे शुरू कर दिया. उन्होंने बताया कि उनके यहां एक महंत होते हैं, जो यात्रा को लीड करते हैं. जो आठ बार कांवड़ यात्रा करके लौट चुका हो, वही महंत बन सकता है. और यात्रा में किसी भी गलती का ज़िम्मेदार महंत ही होता है. आनंद मानते हैं कि यात्रा में इतना उत्साह होता है कि जयकारों और तेज़ आवाज़ में गीत गाना स्वाभाविक हो जाता है. लेकिन जिससे दूसरों को परेशानी हो, ऐसा उत्साह किस काम का. आनंद भी मानते हैं कि यात्रा में हुड़दंग और गुंडई नहीं होनी चाहिए.

कांवड़िए कई तरह के होते हैं
सामान्य कांवड़िए: ये यात्रा में कहीं भी रुककर आराम कर सकते हैं. दिन में कई बार खा-पी सकते हैं.
डाक कांवड़: ये कांवड़ जल लेने के बाद कहीं रुकते नहीं. इन्हें उसी दिन भगवान का जलाभिषेक करना होता है. कई बार ये दौड़ते हुए मंदिर तक पहुंचते हैं.
खलेसरी कांवड़: जो कांवड़िए कांवड़ को ज़मीन पर नहीं रखते, उन्हें खलेसरी कहते हैं. हालांकि, अलग-अलग जगहों पर इन्हें दूसरे नामों से भी पुकारा जाता है.
इन सारी बातों के बाद ये जानना सबसे जरूरी है
मेरठ में कांवड़ियों के लिए कांवड़ बनाने का काम मुस्लिम परिवार करते हैं. सावन शुरू होने के तीन महीने पहले से ही कांवड़ बनाने का ऑर्डर मिलने लगता है. ये कारीगर आस्था का पूरा ध्यान रखते हैं.

जहां फ्रिज़ में बीफ होने के शक पर किसी की जान ली जा रही हो, जहां एक फेसबुक पोस्ट से दंगे भड़क रहे हों, वहीं सैफी समाज समिति के कुछ युवा हरिद्वार के रास्तों पर अपने हिंदू भाइयों का ख़ैर-मक़दम (स्वागत) करते हैं. नंगे पांव चलने से वो कांवड़ियों के पैरों में हुए ज़ख्मों पर दवा लगाते हैं. फल और ठंडा बांटते हैं. ये बात बताई हमें 'द लॉजिकल इंडिया' ने. देखा आपने भी होगा.
ऐसा नहीं है कि कांवड़ यात्रा में सिर्फ पुरुष ही जाते हैं. 2015 में इलाहाबाद से ख़बर आई थी कि सैकड़ों महिलाएं इस यात्रा में शामिल हुईं थीं. संगम से जल लेकर कांवड़ तैयार किया, फिर पैदल पड़िला महादेव मंदिर पहुंचीं.

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