जुलाई 2017 में पीएम मोदी इजराइल गए थे. वहां उन्हें एक नया दोस्त मिला. बेंजामिन नेतन्याहू. बहुत गाढ़ा दोस्त. दोनों कभी समंदर के किनारे टहलते दिखे. कभी हाथ में ग्लास थामे मीठा पानी पीते. ऐसा लगा कि जैसे हमेशा-हमेशा से याराना हो उनका. मीडिया ने इस दोस्ती को नाम भी दे दिया- ब्रोमांस. भाईचारे का मॉडर्न रूप. जब मोदी जी लौटने लगे, तो उन्होंने दोस्त को कहा- मैं जा रहा हूं, तुम्हारे आने की राह देखूंगा. नेतन्याहू ने दोस्त को वादा थमाया. कहा, मैं जल्द आऊंगा. नेतन्याहू ने वादा निभाया. वो भारत आ गए हैं. प्रधानमंत्री मोदी सारे प्रोटोकॉल के बंधन तोड़कर खुद एयरपोर्ट पहुंचे. और फिर दोनों देश गले लग गए. नेतन्याहू का निकनेम है- बीबी. बचपन में जो पुकारे जाने का नाम देते हैं घरवाले, वैसा ही कुछ. ऐसे ही जैसे लोगों का नाम पिंटू, पप्पू, चुन्नी, चुन्नू होता है. घर-बाहर, लोग अक्सर उन्हें इसी नाम से पुकारते हैं. नेतन्याहू का बैकग्राउंड सेना वाला है. वहां भी निकनेम का काफी चलन रहता है. इसीलिए उनका ये निकनेम काफी मशहूर है.
पीएम मोदी के दोस्त, जिन्हें लोग 'बीबी' कहते हैं
पीएम मोदी सारे प्रोटोकॉल को ठेंगा दिखाकर अपने दोस्त को लेने एयरपोर्ट गए.

जेरुसलम को राजधानी माने जाने पर भारत ने नहीं दिया था साथ नरेंद्र मोदी इजरायल जाने वाले पहले भारतीय प्रधानमंत्री थे. अब नेतन्याहू आए हैं. लेकिन भारत आने वाले पहले इजरायली प्रधानमंत्री नहीं हैं वो. उनसे पहले एरियल शेरॉन भी भारत आ चुके थे. मगर नेतन्याहू का आना कई अहम चीजों के बीच हुआ है. सबसे अहम चीज तो जेरुसलम है. जिसे अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप और दुनिया के तकरीबन नौ गुमनाम देशों ने इजरायल की राजधानी मान लिया है. भारत और इजरायल की ताजा गर्मजोशी को देखते हुए पहले शक हुआ. कि कहीं भारत भी न बह गए. मगर ऐसा हुआ नहीं. भारत ने संयुक्त राष्ट्र के अंदर इस संबंध में हुई वोटिंग में अमेरिका के इस प्रस्ताव के खिलाफ वोट दिया. पता नहीं, इजरायल ने भारत से किसी और बात की उम्मीद की होगी या नहीं. खैर.
पहले के मुकाबले भारत-इजरायल के रिश्ते बहुत बदल गए हैं भारत के साथ इज़राइल के राजनैतिक संबंध साल 1992 से शुरू हुए थे. इसके पहले दोनों दूर-दूर ही रहते थे. इसके बाद भी इंडिया ने कभी इन संबंधों को मज़बूत करने की कोई ख़ास कोशिश नहीं की. इसकी वजह है फिलिस्तीन. इजरायल का गठन विवादित रहा है. इजरायल का होना फिलिस्तीन के वजूद को दांव पर लगाता है. 14 मई, 1948 को इजरायल के आधिकारिक गठन के बाद से स्थितियां ऐसी ही बनी हुई हैं. बाद के सालों में इजरायल और उसके पड़ोसी देशों के बीच युद्ध भी हुए. इन युद्धों ने इजरायल को और मजबूत ही किया. फिलिस्तीन के इलाके उसके कब्जे में चले गए. सबसे अहम था वेस्ट बैंक और पूर्वी जेरुसलम. दुनिया फिलिस्तीन के लिए रोती है. इस रोने का कोई नतीजा नहीं निकला कभी, मगर हां, एक किस्म का सपोर्ट है फिलिस्तीन के लिए. भारत का भी पारंपरिक स्टैंड ये ही रहा है. इसीलिए भारत ने कभी इजरायल के साथ ताल्लुकात बढ़ाने पर जोर नहीं दिया. मोदी और नेतन्याहू ने इस परंपरा को बदला है. मोदी जी के बारे में आप जानते हैं. अब नेतन्याहू के बारे में भी जान लीजिए.

नेतान्याहू यूएन में अपनी स्पीच के दौरान
कौन हैं मोदी के नए दोस्त बेंजामिन नेतान्याहू ? इनके बारे में यहां पढ़िए:
1. बेंजामिन नेतान्याहू 21 अक्टूबर 1949 को तेल अबीब में पैदा हुए. 1963 में इनके पिता को अमेरिका में एकेडमिक पोस्ट ऑफर हुई तो सारा परिवार अमेरिका शिफ्ट हो गया. नेतान्याहू के पिता इतिहासकार थे. 18 साल की उम्र में नेतान्याहू इज़राइल वापिस आ गए. यहां उन्होंने 1967 में आर्मी ज्वाइन कर ली. फिर वो इजराइली सेना की स्पेशल फोर्स सयरेट मटकल में शामिल हो गए. ये आतंकवाद के खिलाफ बनी थी.
2. नेतान्याहू इज़राइली फौज के काफी बड़े-बड़े ऑपरेशन का हिस्सा रहे हैं. 1968 में अरब देशों के हमले पर चलाए गए ऑपरेशन इन्फर्नो और उसी साल लेबनान पर इजराइल के किए गए ऑपरेशन गिफ्ट दोनों का हिस्सा थे बेंजामिन. इसके बाद 1973 की योम-किप्पुर लड़ाई में भी रहे थे.

बेंजामिन नेतान्याहू
3. अपनी मिलिट्री सर्विस ख़त्म होने के बाद वो वापिस अमेरिका चले गए जहां उन्होंने MIT से बैचलर्स और मास्टर डिग्री हांसिल की.
4. नेतान्याहू के भाई जोनाथन भी इज़राइली फौज का हिस्सा थे. 1976 में एंटेबे, यूगांडा में हाईजैक प्लेन के रेस्क्यू मिशन के दौरान 106 हॉस्टेज लोगों में से 102 को बचा लिया गया. इजराइल का सिर्फ एक सैनिक मरा. वो जोनाथन ही थे. उनके सम्मान में इजराइल ने इस मिशन को ऑपरेशन जोनाथन नाम दे दिया.

जोनाथन नेतान्याहू (इमेज - pinterest)
5. जोनाथन की मौत का नेतान्याहू पर गहरा असर पड़ा था. 1982 में अपने भाई की याद में उन्होंने एंटी-टेररिज्म इंस्टिट्यूट खोला. यहीं से उनका राजनैतिक सफ़र शुरू हुआ. तभी वो उस समय के इज़राइल के भविष्य के विदेश मंत्री मोशे अरेंस की नज़र में आए. अरेंस ने उन्हें वॉशिंगटन में यूएस मिशन का डिप्टी चीफ बना दिया. ये वो वक्त था जब इजराइल के संबंध अमेरिका से गड़बड़ा गए थे.

Image - Reuters
6. इसके बाद नेतान्याहू की पब्लिक लाइफ शुरू हो गई. उनकी छवि एक ऐसे इज़राइली की बन गई जो अमेरिकन एक्सेंट में फर्राटेदार अंग्रेजी बोलता था. अमेरिकी टीवी पर वे एक जानामाना चेहरा बन चुके थे जो इज़राइल के मसलों पर बात करता था. इसके बाद 1984 में उन्हें अमेरिका में यूएन का स्थायी प्रतिनिधि बना दिया गया.

Image - CNN
8. 1993 में फिलीस्तीनी नेता यासिर अराफात के साथ संधि के बाद इजराइल के पीएम की बड़ी आलोचना हुई थी. 1996 में पीएम इत्ज़ाक रेबिन की हत्या के बाद राष्ट्रपति शिमोन पेरेस ने चुनाव जल्दी करवा दिए. इन्हीं चुनावों में नेतान्याहू इज़राइल के प्रधान मंत्री बने. उनके नाम इज़राइल का सबसे कम उम्र में पीएम बनने का रिकॉर्ड है. वो 1999 तक इज़राइल के पीएम रहे.

Image - CNN
9. 1999 में चुनाव हारने के बाद उन्होंने पार्लियामेंट के मेंबर पद से इस्तीफ़ा दे दिया और अपनी पार्टी लिकुड के चेयरमैन पद से भी हट गए. 2001 में पार्टी ने वापसी की तो उन्हें विदेश मंत्री बनाया गया और फिर फाइनेंस मिनिस्टर. 2005 में इज़राइल के गाज़ा पट्टी से हट जाने के विरोध में उन्होंने अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया.

Image - Reuters
10. 2005 में अपनी नई पार्टी कदीमा बनाई फिर लिकुड पार्टी के साथ इस शर्त पर एलायंस कर लिया कि पार्टी लीडर वो ही होंगे. 2009 में दोबारा पीएम बने. 2012 में नेतान्याहू ने समय से पहले चुनाव करवाने की घोषणा कर दी. पार्लियामेंट डिजॉल्व करने के 1 हफ्ते के अंदर ही गाज़ा ने इज़राइल पर रॉकेट हमला कर दिया और इसके जवाब में नेतान्याहू ने आर्मी को गाज़ा पर हमला करने का आदेश दे दिया. 2013 में जीतने के बाद तीसरी बार इज़राइल के पीएम बने. 2015 में वो चौथी बार पीएम बने और ये एक रिकॉर्ड है. इससे पहले इजराइल में सिर्फ बेन गुरियन ही तीन बार पीएम बने थे. इजराइली बेन गुरियन को दुनिया के सबसे बड़े क्रांतिकारियों का कॉकटेल मानते थे.
Image - Reutersये आर्टिकल दी लल्लनटॉप के साथ इंटर्नशिप कर रहे भूपेंद्र ने लिखा है.
ये भी पढ़ें









