प्रदीपिका सारस्वत फ्रीलांस राइटर हैं. मीडिया की नौकरी छोड़कर इन दिनों कश्मीर में डेरा जमाए हुई हैं. ये दी लल्लनटॉप के लिए पहले भी लिख चुकी हैं. और इस बार कश्मीर की खो रही भाषा पर लिखा है. पढ़िए प्रदीपिका की कश्मीर डायरी. ‘ममा कल मैं स्कूल नहीं जाउंगा,’ पांच साल का फाइक बड़े लाड़ से अपनी मां से ज़िद कर रहा था. ‘बेटा आपके एग्ज़ाम्स शुरू होने वाले हैं, ऐसे बार बार स्कूल की छुट्टी नहीं करते,’ उसकी मां ने समझाया. हर शहर, हर गांव के बच्चे ने ऐसी ज़िद कभी न कभी तो ज़रूर की होती है. ये कोई खास बात नहीं होती अगर फाइक एक कश्मीरी बच्चा न होकर यूपी या बिहार के गांव का लड़का होता. वैसे तो यूपी और बिहार के गांवों के बच्चे भी मुझे लगता है ब्रजभाषा, अवधी या भोजपुरी जैसी किसी ज़ुबान में अपनी मां से ज़िद करते होंगे. पर सचमुच मुझे बड़ा अचंभा हुआ कश्मीर के गांव के एक छोटे बच्चे को हिंदी, या कहें कि उर्दू में अपनी मां से बात करते देखकर. उसके बाद ऐसा कई बार देखने को मिला. श्रीनगर शहर मैं भी मैंने लड़के-लड़कियों को आपस में कश्मीरी की बजाय हिंदी में बात करते पाया. मैं वाकई हैरान थी. अपनी एक अलग, काफी खूबसूरत और रिच भाषा होने के बावज़ूद ये बच्चे हिंदी या उर्दू में बात कर रहे थे, जिसे मैं हिंदी कहूंगी उसे यहां आम तौर पर उर्दू कहा जाता है. मुझे कॉलेज के वो बंगाली दोस्त याद आए जो दूसरा बंगाली मिलते ही बांग्ला में बात करना शुरू कर देते थे, ये बात भूल कर कि हम बांग्ला न समझने वालों को उनकी इस हरकत से कितनी कोफ्त होती थी. पर इस बार मुझे इन कश्मीरियों को हिंदी में बात करते देख न जाने क्यों अच्छा नहीं लगा. मैं खुद कश्मीरी सीखना चाहती हूं, जैसे वहां रहते बांग्ला सीखने की कोशिश कर रही थी.
आखिर हम विविधता में एकता की रट लगाने वाले लोग हैं न, तो इन रंग-बिरंगी बोली-भाषाओं को खोते देखना चुभेगा ही.जब मैंने कश्मीर के इस नए भाषाई बदलाव की पड़ताल करने की कोशिश की तो मेरा ध्यान 'बुद्धू बक्से' पर गया. फाइक के घर मैं सब लोग शाम को इकट्ठे होकर टीवी देखते हैं. साथ मैं देखा जाने वाला सीरियल है ‘अशोका’. बचपन में हम भी कभी परिवार के साथ बैठकर कृष्णा, जय हनुमान और इसी तरह के कई सीरियल देखते थे.
एक शाम जब उनका पूरा परिवार बैठा टीवी देख रहा था तो मुझे इस कश्मीरी मुसलमान परिवार और अपने परिवार में कोई अंतर नहीं नज़र आया. सीरियल की भाषा में इस्तेमाल किए जाने वाले क्लिष्ट हिंदी शब्द अब तो हमारे हिंदी लिटरेचर से भी गायब होने लगे हैं, पर यहां लोग बड़े ध्यान से सब देख-सुन रहे थे.
अगली शाम मैंने एक छोटे लड़के को अपनी बहन के साथ एक खेल खेलते देखा. लड़के के हाथ में एक छोटी सी टहनी थी जिसे उसने बंदूक बनाया हुआ था. अपने खेल में वो फौजी बना था और उसकी बहन मिलिटेंट. ‘हाथ ऊपर करो,’‘सर्च करने दो,’‘छोडूंगा नहीं,’‘तुम्हारे बाकी साथी कहां हैं,’‘ग्रेनेड फेंक दूंगा,’‘मेरे पास एके सैंतालिस है’ ये सारी बातें उस खेल का बड़ा खास हिस्सा थीं. ज़ाहिर है, ये खेल कनफ्लिक्ट ने उन्हें दिया था.कश्मीरी छोड़ कर हिंदी अपनाने वाली ये जेनरेशन आर्म्ड कनफ्लिक्ट में ही पैदा हुई है. श्रीनगर के एक बिज़नेस स्कूल में पढ़ाने वाले अनायतुल्ला ने मुझे एक किस्सा सुनाया. कई साल पहले एक रात एक गांव में माइन ब्लास्ट हुआ. सबेरे भारतीय सेना के जवान लोगों से पूछताछ करने लगे. एक बुज़ुर्ग से पूछा, उसे हिंदी-उर्दू नहीं आती थी. बोला, साहब निंद्र-ए, मौत-ए. जवान ने उसे बहुत मारा, बिना ये समझे कि वो क्या कहना चाहता था. बुज़ुर्ग का मतलब था कि नींद तो एक छोटी मौत की तरह होती है, कुछ पता नहीं चलता कि किसने क्या किया. जवान ने इसका मतलब अपनी मर्ज़ी से लगाया और अपना गुस्सा बेवज़ह उस बुज़ुर्ग पर निकाल दिया. ‘पहले हमारे यहां ज़्यादातर लोगों को हिंदी न तो बोलनी आती थी, न ही पढ़नी. इसकी वज़ह से लोग आर्मी की बात नहीं समझ पाते थे, और काफी परेशानी उठाते थे. कनफ्लिक्ट ने भी हमें एक अलग कल्चर दिया है. कश्मीरी भाषा में इस कल्चर के लिए कोई जगह नहीं है, ये भी एक वज़ह है कि हम कश्मीरी की बजाय हिंदी बोलने पढ़ने लगे हैं.’ साउथ कश्मीर के इकबाल बताते हैं.
श्रीनगर के जाने-माने सोश्योलजिस्ट शाहज़ादा सलीम ने इस ट्रेंड को ज़रा और गहराई से पकड़ा. उन्होंने कहा कि सूबे की राजनीतिक अस्थिरता और कनफ्लिक्ट के चलते हमारे समाज में एक होने की भावना खोती जा रही है. एक ज़माने में गांवों पर उनके बुज़ुर्गों का पूरा होल्ड होता था, पर अब ऐसा नहीं रहा है. पॉलिटिकल टरमॉइल और कनफ्लिक्ट के अलावा ग्लोबलाइज़ेशन और मॉडर्नाइज़ेशन भी इसके लिए ज़िम्मेदार हैं.
‘कनफ्लिक्ट ने हमारी कलेक्टिव कॉन्शियसनेस खो दी है. हमारी सोसाइटी एक बड़े ट्रांज़ीशन का सामना कर रही है. न तो हम पूरी तरह मॉडर्नाइज़्ड हैं, न पूरी तरह वेस्टरनाइज़्ड हैं, न पूरी तरह कंज़र्वेटिव हैं, न पूरी तरह भारत के साथ हैं, न पूरी तरह पाकिस्तान के साथ हैं.’अगली बात उन्होंने जॉब अपॉर्चुनिटीज़ की कमी के बारे मैं कही. ‘आजकल माता-पिता समझने लगे हैं कि सिर्फ कश्मीरी सिखाने से उनके बच्चों को नौकरियां नहीं मिलनी, उन्हें हिंदी अंग्रेजी भी सीखनी होगी. मुझे याद है कि एक बार रेडियो पर आने वाले एक प्रोग्राम “ज़रा सोचिए” में एक आम शख्स ने बड़ा ज़रूरी सवाल पूछा था. उसने कहा था कि हमारे ज़्यादातर स्कूलों में कश्मीरी सिर्फ आठवें दर्ज़े तक पढ़ाई जाती है, हमारे पास उस से ऊपर की क्लासेज़ के लिए टेक्स्ट बुक्स तक नहीं हैं. ऐसे में अगर आप अपने बच्चों को सिर्फ कश्मीरी पढ़ाने की ही ज़िद करेंगे तो ज़रा सोचिए कि कल उनका भविष्य क्या होगा. तो इस तरह के सवाल कश्मीरियों के ज़ेहन में उठने लगे हैं.’ सलीम आगे बताते हैं कि देश के बाकी हिस्सों की तरह कश्मीर में भी फॉरेन कल्चर को लेकर अट्रेक्शन है, खास तौर पर कुछ स्किल्स को लेकर. जैसे यहां के लड़के यूपी या पंजाब से आए बार्बर के पास अपने बाल कटवाना पसंद करते हैं बजाय एक कश्मीरी नाई के. लेकिन जब खान-पान और पहनावे की बात आती है तो ये ही लड़के काफी एथनोसेंट्रिक हो जाते हैं. पर भाषा के बारे में चीज़ें इसलिए बदल रही हैं क्योंकि ये उनके करियर से जुड़ी चीज़ है. इसके अलावा उन्होंने सरकार और लीडरशिप को भी इस बदलाव के लिए भी ज़िम्मेदार ठहराया. ‘कल्चर और भाषा को प्रिज़र्व करना राज्य सरकार की भी ज़िम्मेदारी है. पर सरकार की तरफ से ऐसे कोई कदम नहीं उठाए जाते. हमारे पास अच्छे टीचर्स की भी खासी कमी है. सरकार ने गुर्जरी, पहाड़ी जैसी भाषाओं के प्रिज़र्वेशन के लिए तो काम किया भी है पर कश्मीरी के लिए ऐसा कुछ नहीं किया. यहां तक कि भारत के संविधान का भी साल दो साल पहले ही कश्मीरी में अनुवाद किया गया है. पिछले काफी सालों से कश्मीरी में बाकी भाषाओं की चीज़ों का अनुवाद बेहद कम हुआ है.
मजबूत लीडरशिप की कमी भी हमारी भाषा के कमज़ोर होने के लिए ज़िम्मेदार है. नेशनल कॉन्फ्रेंस के फाउंडर और नया कश्मीर का सपना देखने वाले शेख मुहम्मद अब्दुल्ला अकेले ऐसे कश्मीरी नेता थे जिन्होंने हमारी भाषा और कल्चर को ऊपर रखा था, पर आज हमारे पास उस तरह की लीडरशिप, उस तरफ का पॉलिटिकल रिप्रजेंटेशन नहीं है.’उन्होंने कश्मीर पर विदेशी शासकों को भी भाषा के मुद्दे से जोड़ा. ‘साथ ही इंपीरियलिज़्म काभी हमारी भाषा पर असर रहा है. अंग्रेज़ शासकों से मिली अंग्रेज़ी और जम्मू के महाराजाओं की उर्दू ने भी राज्य में हमारी अपनी भाषाओं का महत्व कम किया है.’
हालांकि उन्होंने कहा कि कश्मीर से बाहर चले जाने वाले कश्मीरी पंडित आज भी कश्मीरी भाषा को समेट कर रखे हुए हैं. ‘विदेशों में बसे कश्मीरी पंडित आज भी अपने परिवार में, घरों में अपनी मातृभाषा में बात करते हैं.’ शायद इसलिए कि जड़ों से दूर होने पर हम उनके छूट जाने की कमी को ज़्यादा शिद्दत से महसूस करते हैं. जो बचा हुआ है, उसे बचाए रखना चाहते हैं. हालांकि पिछले कुछ सालों में सिविल सर्विसेज का एग्ज़ाम पास करने वाले कुछ कश्मीरी छात्रों ने कश्मीरी को एक विषय के तौर पर चुना, तब से इस भाषा को एक बार फिर इज़्ज़त की नज़र से देखा गया है. सलीम ने कश्मीर के फेमस अंग्रेज़ी पोएट आगा शाहिद अली का भी एक किस्सा इस सिलसिले में सुनाया. ‘अमेरिका में रहने वाले आगा शाहिद अली ने कश्मीर में अपने पिता आगा अशरफ को एक चिट्ठी लिखी. उन्होंने लिखा कि अमेरिका की यूनिवर्सिटी में अंग्रज़ी पोएट्री पढ़ाना एक कश्मीरी के लिए बड़ी बात है, आपने मिशनरी स्कूल में मुझे पढ़ाकर मुझे बहुत कुछ दिया है. पर मेरी मातृभाषा आपने मुझे नहीं सिखाई, और ऐसे में आपने मुझसे बहुत कुछ छीन लिया है.’ आगा अशरफ अली अपने समय में कश्मीर के बड़े एजूकेशनिस्ट थे. कश्मीरी बुद्धिजीवियों के लिए आगा शाहिद अली और उनकी अंग्रेज़ी में कश्मीर पर लिखी गईं कविताएं एक अलग ही मकाम रखती हैं, लेकिन इतने सेलिब्रेटेड पोएट के दिल में भी अपनी मातृभाषा को न जानने का दर्द रहा था, ये कम लोगों को पता है. अपनी मां से हिंदी में बात करने वाले ये कश्मीरी बच्चे पता नहीं कभी इस दर्द को महसूस कर पाएंगे या नहीं, मैं नहीं कह सकती.
मैं बस इतना कह सकती हूं. कनफ्लिक्ट ने इस ज़मीन से बहुत कुछ छीना है, कश्मीरी भाषा उन खो रही चीज़ों में से एक है, जिसे वक्त रहते बचा लेना चाहिए.पढ़िए: 'पाकिस्तान से पैसा फेंकना बंद हो जाए तो कश्मीर में पत्थर फेंकना बंद हो जाएगा'






















