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राजीव गांधी की हत्या से ठीक एक साल पहले भी एक सियासी हत्या हुई थी

कश्मीर डायरी 3- मुंह छिपाकर पाकिस्तानी झंडा लहराने वाले लड़के और मीरवाइज की हत्या की बरसी

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फोटो: प्रदीपिका सारस्वत
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प्रदीपिका सारस्वत

प्रदीपिका सारस्वत फ्रीलांस राइटर हैं. मीडिया की नौकरी छोड़ इन दिनों कश्मीर में डेरा जमाए हुई हैं. 'दी लल्लनटॉप' के लिए वह कश्मीर के कनफ्लिक्ट पर सीरीज लिख रही हैं. ये उसकी तीसरी किस्त है. 
इस बार वह बता रही हैं भारत के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या के दिन यानी 21 मई 1991 से ठीक एक साल पहले हुई एक बड़ी सियासी हत्या के बारे में. उसकी बरसी के आयोजनों के बारे में. और पाकिस्तानी झंडा दिखा लेकिन मुंह छिपा फोटो खिंचाने के कथित एडवेंचरिज्म के बारे में. 


अभी 21 मई बीती है. कश्मीर में ये एक 'काला दिन' होता है. 21 मई 1990 को मौजूदा हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के चेयरमैन मीरवाइज़ मोहम्मद उमर फारुक के पिता मीरवाइज़ मौलाना  फारुक को उनके डाउनटाउन श्रीनगर के घर में दिनदहाड़े घुसकर गोली मार दी गई थी. मीरवाइज़ घराना कश्मीर का मुख्य धार्मिक घराना है. 14वें मीरवाइज़ फारुक आवामी एक्शन कमेटी के नेता थे.
बाद में उनकी शवयात्रा पर सीआरपीएफ ने गोलियां चलाईं और कम से कम 62 लोगों की जानें गईं और सैकड़ों घायल हुए थे. उनकी शवयात्रा पर गोलियां क्यों चलीं, इस बारे में भी कई बातें कही जाती हैं. 3 जनवरी 2011 को इंडिया टुडे की वेबसाइट पर लिखा गया, ‘21 मई 1990 को अज्ञात बंदूकधारियों ने डाउनटाउन श्रीनगर के मीरवाइज़ के घर में घुसकर उनकी हत्या कर दी. बाद में उनकी शवयात्रा पर सीआरपीएफ ने गोलियां चलाईं और इस्लामिया कॉलेज के नज़दीक हुई इस गोलीबारी में कई लोग मारे गए. मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के अनुसार इस गोलीबारी में 60 जानें गईं और सैकड़ों घायल हुए.’
इसी तरह की खबर कश्मीर से छपने वाले अखबारों में भी थी. सवाल यह था कि आखिर एक शवयात्रा पर सीआरपीएफ ने गोली क्यों चलाई. मैंने 1990 के दशक से कश्मीर कनफ्लिक्ट पर काम कर रहे वरिष्ठ पत्रकार यूसुफ जमील साहब से इसे समझने की कोशिश की. यूसुफ जमील बीबीसी, वॉइस ऑफ अमेरिका, न्यू यॉर्क टाइम्स, डेक्कन क्रॉनिकल और एशियन एज जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में काम कर चुके हैं.1996 में कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स ने इन्हें इंटरनेशनल प्रेस फ्रीडम अवॉर्ड से भी नवाज़ा था.
‘21 मई 1990 को 2 मिलिटेंट मीरवाइज़ से मिलने आए और उन्होंने उनकी हत्या कर दी. मीरवाइज़ को पहले से ही इस बात का अंदेशा था. अपनी हत्या से करीब दो हफ्ते पहले जामा मस्जिद में दिए अपने भाषण में उन्होंने कश्मीर मुद्दे पर काफी खुलकर बात की थी. बंदूक के रास्ते आजादी तलाश रहे लोगों को उन्होंने बातचीत के रास्ते पर लौटने की हिदायत दी थी. उनकी हत्या के बाद उनके एक सहयोगी मुहम्मद याकूब वकील ने कहा कि मीरवाइज़ के हत्यारे हिंदी में बात कर रहे थे. उन्होंने यहां तक कहा कि ये लोग शायद शिवसेना जैसे किसी ग्रुप से वास्ता रखते थे. उनका इरादा मिलिटेंट्स को इस इल्ज़ाम से दूर रखने का था, जबकि उन्हें खुद हत्यारों के बारे में नहीं पता था या शायद वे लोगों का ध्यान भटकाना चाहते थे. बाद में इस बारे में जांच हुई और आज कश्मीर में सब जानते हैं कि उस हत्या के पीछे हिजबुल मुजाहिदीन के एक धड़े के मिलिटेंट्स ही थे.’
लेकिन मीरवाइज़ की शवयात्रा पर हुई सीआरपीएफ की गोलीबारी ने सारा माहौल बदल दिया, और मीरवाइज़ की मौत का गुस्सा भारत सरकार के खिलाफ गुस्से में बदल गया.
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फोटो: प्रदीपिका सारस्वत
‘दरअसल ये एक शवयात्रा नहीं थी. मीरवाइज़ के शव को श्रीनगर के शेर ए कश्मीर अस्पताल से रजौरीकदल में बने उनके पुश्तैनी घर और अवामी एक्शन कमेटी के हेडक्वॉर्टर की ओर लाया जा रहा था. हज़ारों की भीड़ उनके शव के साथ थी. जब भीड़ इस्लामिया कॉलेज के नज़दीक पहुंची तो सीआरपीएफ ने गोलीबारी शुरू कर दी.’
आखिर सीआरपीएफ ने गोली क्यों चलाई? इस सवाल के जवाब में यूसुफ साहब बताते हैं, ‘वे घबरा गए थे. हमें ये भी बताया गया कि भीड़ बहुत ज़्यादा थी, नारेबाजी कर रही थी, और कहीं से एक गोली चली. किसने चलाई, कोई नहीं जानता. ये गोली हालांकि बिना किसी निशाने के हवा में चलाई गई थी. तो लोगों का कहना है कि सीआरपीएफ ने इस गोली के जवाब में भीड़ पर गोलियां चलाईं. ये सीआरपीएफ की भयंकर भूल थी, क्योंकि शव के साथ जा रहे लोग निहत्थे सिविलियंस थे. कुल 62 जानें गईं. ज़्यादातर लोग मौके पर ही मारे गए, और बाकियों ने अस्पतालों में दम तोड़ दिया. और इन हत्याओं ने सारा माहौल बदल दिया. लोगों ने मानना शुरू कर दिया कि मीरवाइज़ को भी सुरक्षा एजेंसियों ने ही मारा था. उन दिनों यूं भी कश्मीरी युवा हथियार उठा रहे थे, और इस घटना के बाद गुस्से से भरे और भी लड़कों ने हथियार उठाए.’
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फोटो: प्रदीपिका सारस्वत

इंडिया टुडे की (3 जनवरी 2011 की) रिपोर्ट के मुताबिक 2010 में टाडा कोर्ट ने मीरवाइज़ फारुक की हत्या के ज़ुर्म में एक पूर्व आतंकवादी मुहम्मद अयूब डार सहित तीन आतंकियों को जेल भेज दिया. इसी रिपोर्ट के मुताबिक पहली बार किसी हुर्रियत नेता (प्रोफेसर अब्दुल गनी) ने यह माना कि मीरवाइज़ फारुक और दूसरे कश्मीरी नेताओं की हत्या में बाहरी ताकतों की बजाय अंदरूनी लोगों का ही हाथ था.
याद रहे कि इस हत्या के ठीक एक साल बाद, इसी दिन भारतीय प्रधानमंत्री राजीव गांधी की भी हत्या कर दी गई. और फिर 2002 में यही तारीख एक और नेता की मौत की गवाह बनी. हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के नेता अब्दुल गनी लोन मौलाना मीरवाइज़ फारुक की शहादत की अकीदत में निकाले जा रहे मार्च में शामिल हुए थे जब ईदगाह मैदान में अज्ञात हमलावरों ने उन पर गोली चलाई. इस हत्या के बारे में भी कश्मीर मानता है कि मिलिटेंट्स इस हत्या में शामिल थे.
बकौल यूसुफ जमील साहब, ‘अब्दुल गनी लोन के बेटे सज्जाद गनी लोन, जो मौजूदा कश्मीर सरकार में मंत्री हैं, मानते हैं कि उनके पिता की हत्या मिलिटेंट्स ने की. सरकार भी यही मानती है. लेकिन क्यों की, और हत्यारों को अभी तक इंसाफ के दायरे में क्यों नहीं लाया जा सका है, इन सवालों का जवाब सरकार ही दे सकती है.’
इस 21 को उसी ईदगाह मैदान तक एक और वैसा ही जुलूस निकाला जाना था. लेकिन पहले हो चुकी घटनाओं की वजह से शहर की सुरक्षा बढ़ा दी गई थी. खासतौर पर डाउनटाउन श्रीनगर में काफी सख्ती थी. जगह-जगह रेज़र वायर्स से रास्तों को ब्लॉक किया गया था. हालांकि हुर्रियत नेताओं से लेकर मिलिटेंट ग्रुप्स ने भी आज कश्मीर घाटी में हड़ताल के लिए आवाज़ दी थी, लेकिन बढ़ी हुई चौकसी के मद्देनज़र परसों शुक्रवार की नमाज़ के बाद ही मौलाना मीरवाइज़ फारूख के बेटे मीरवाइज़ उमर फारूख ने अपनी रैली कर ली.
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फोटो: प्रदीपिका सारस्वत

सुबह मैं अपने घर से प्रेस कॉलोनी के लिए निकली. एक पत्रकार दोस्त ने कहा था कि वहां तुम्हें कोई न कोई मिल जाएगा मार्टयर्स ग्रेवयार्ड तक साथ जाने के लिए. मार्टयर्स ग्रेवयार्ड श्रीनगर ईदगाह के करीब वो कब्रिस्तान है जहां कश्मीरियों के मुताबिक उनकी आज़ादी की लड़ाई में मारे गए शहीदों को दफनाया जाता रहा है. कहते हैं कि इस कब्रिस्तान में जितनी कब्रों पर नाम है, उससे ज़्यादा पर नहीं है. तिहाड़ जेल में दफनाए गए ‘कश्मीरी शहीद’ मकबूल भट और अफज़ल गुरु के मॉर्टल रिमेन्स को आज भी यहां लाने के लिए यहां लोग कसमें खाते हैं.
घाटी के बाहर हिंदुस्तान में जिन्हें आतंकवादी कहा जाता है, कश्मीर को अलग देश के तौर पर देखना चाहने वाले कश्मीरियों के लिए ये सब शहीद हैं. मुझे भी मेरे दोस्तों ने आगाह किया था कि पब्लिकली इनमें से किसी का नाम लेते वक्त साहब ज़रूर लगा लेना, क्या जाने कब किसे बुरा लग जाए.
तो जब में प्रेस कॉलोनी पहुंची तो वहां कुछ फोटो जर्नलिस्ट्स मौजूद थे. उनमें से एक को मैं पहचानती थी. वे सभी मार्टयर्स ग्रेवयार्ड की ओर ही जा रहे थे. मैं जिसे पहचानती थी, उसके साथ मैं भी चल पड़ी. डाउनटाउन श्रीनगर की तरफ जाने वाले सारे रास्ते रेज़र वायर्स से बंद कर दिए गए थे. हमारे हाथों में कैमरा देख कर हमें जाने दिया गया. मुझे उम्मीद थी कि कब्रिस्तान पर हमें भीड़ नज़र आएगी. पर ये कश्मीर है, और मैं यहां नई हूं. वहां सिवाय पुलिस की गाड़ियों, पुलिस और सीआरपीफ के जवानों के हमें बस इक्का दुक्का लोग ही नज़र आए. कब्रिस्तान पर ताला पड़ा हुआ था. अंदर जाना मना था. कुछ तस्वीरें लेकर हम वापस लौट पड़े.
साथ के फोटोजर्नलिस्ट ने मुझे कहा कि लौटते वक्त हम मीरवाइज़ के पुश्तैनी घर और उनके ऑफिस की ओर जाएंगे जहां उन्हें गोली मारी गई थी. रजौरीकदल चौक पर मौजूद उस घर-दफ्तर के पास भी काफी पुलिस मौजूद थी. हमने वहां रुक कर तस्वीरें लीं. जब मैं तस्वीरें ले चुकी तो मैंने साथ वाले बंदे को तलाशना शुरू किया. वो कुछ दूरी पर खड़ा एक लड़के से बात कर रहा था. धूप बहुत थी, काफी देर हो जाने के बाद मैंने उसे चलने के लिए कहा. उसने आकर मुझे बताया कि यहां कुछ लड़के पाकिस्तान का झंडा लेकर निकलने वाले हैं.
'इंडियन एक्सप्रेस' की वेबसाइट पर मैंने पढ़ा था कि शुक्रवार को मीरवाइज़ की रैली में कुछ लड़कों ने पाकिस्तान का झंडा दिखाया था. मुझे लगा कि फिर से इसी तरह का कोई छोटा प्रोसेशन निकलेगा शायद. पर कहा था न, ये कश्मीर है, और मैं अभी यहा नई हूं. मैं भी उस तरफ चली गई. देखा कुल तीन लड़के थे. एक पाकिस्तानी झंडा था. मैं हैरान. तीनों ने बारी-बारी से चेहरा ढंककर झंडा थामे तस्वीरें उतरवाईं.
हम वापस लौटे तो पुलिस ने मेरे साथ के जर्नलिस्ट को पकड़ लिया. हो क्या रहा है, ये जानने के लिए जब मैं भी वहां पहुंची तो पता चला, पुलिस का कहना था कि वो झंडा हम लोगों ने ही उसे दिया होगा, क्योंकि पुलिस तो वहां कब से तैनात है. ये मेरे लिए और भी नया था. खैर मैंने उन्हें समझाया कि मैं तब से उनके सामने ही खड़ी थी तो ये कैसे हो सकता था. पर मुझे थोड़ा डर भी लगा. मैंने कश्मीर में पुलिस, टॉर्चर, और पीएसए के तमाम किस्से सुने थे.
अभी पांच मिनट पहले ही उस फोटो जर्नलिस्ट ने मेरे एक सवाल के जवाब में कहा था कि डाउनटाउन के ज़्यादातर लड़कों पर पीएसए लग चुका है, इसलिए अब उन्हें फर्क नहीं पड़ता और वे ऐसे स्टंट करते रहते हैं. डाउनटाउन, श्रीनगर का सबसे संवेदनशील इलाका है. हर शुक्रवार की नमाज़ के बाद पथराव यहां की रिवायत है. और पीएसए का मतलब है पब्लिक सेफ्टी एक्ट. इस एक्ट में आपको सीधे उठा लिया जाता है, और दो साल तक कोई बेल, कोई सुनवाई नहीं हो सकती. मेरा फिलहाल जेल जाने का कोई इरादा नहीं था.
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फोटो: प्रदीपिका सारस्वत

पुलिस वालों ने, मुझे तो कुछ नहीं कहा, पर साथ वाले बंदे की तस्वीर और उसकी गाड़ी की नंबर प्लेट की तस्वीर उतार कर ज़रूर रख ली. उसे कहा गया कि उसके खिलाफ एफआईआर की जाएगी.
वापस आकर ये किस्सा मैंने अपने दोस्तों को सुनाया. पहले तो एक अनजान बंदे के साथ जाने के लिए मेरी अच्छी खासी लानत-मलामत की गई, मुझे समझाया गया कि यहां किसी पर भी भरोसा करने से पहले काफी सोचना-समझना होता है, और ये जगह यूपी और दिल्ली नहीं है, कि कोई भी किसी भी एजेंसी का आदमी-इनफ़ॉर्मर हो सकता है, कि अब तक कोई न कोई एजेंसी मुझ पर भी निगाह रखने लगी होगी.
डर लगा मुझे, पर ज़रा सा ही. यूं तो मैं जानती हूं कि जब मैं कहीं से ग़लत नहीं हूं, तो मुझे डरने की ज़रूरत नहीं. पर इस ज़रा से डर की वज़ह है कश्मीर का कनफ्लिक्ट ज़ोन होना, वॉर ज़ोन होना. कश्मीरियों को अपने वतन से इश्क है, एक रूमानी इश्क, जैसा हर कनफ्लिक्ट ज़ोन, वॉर ज़ोन के बाशिंदे को होता है, जैसा हिंदुस्तान की आज़ादी की लड़ाई लड़ने वालों को रहा होगा, जैसा फिलिस्तीनियों को है (मैं यहां होने, न होने की बात कर रही हूं, जायज़-नाजायज़ की नहीं). और जंग भी यहां ज़ारी है. और कहते हैं कि इश्क और जंग मैं सब जायज़ है. तो बस यहां मेरा ज़रा सा डर जाना भी कहीं न कहीं जायज़ सा ही लग रहा है मुझे. और इस डर के आगे जीत है या नहीं, खुदा ही जाने.

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