हम भारतीय हैं. आकाशगंगा की सबसे ज़्यादा संस्कारी ब्रीड. हम सभ्य हैं. हम सुसंस्कृत हैं. हम नारियों का सम्मान करने के मामले में पूरे ब्रह्मांड में टॉप कर गए हैं.
हमारे यहां औरतों को इतना सम्मान दिया जाता है कि औरतें परेशान हैं, इसे रखे कहां! हर जगह सम्मान दिए जा रहे हैं हम. सड़कों पर, पार्टियों में, सिनेमा हॉल्स में हर जगह. अभी एक जगह सम्मान देकर निपटे नहीं होते कि दूसरी जगह से उससे ज़्यादा सम्मान देने की ख़बर आ जाती है. बिना सम्मान दिए कोई दिन ख़ाली नहीं जाने देते हम भारतवासी. औरतों को देवी मान कर पूजे जाने की परंपरा यूं ही थोड़े ही है भारत महान में!
हज़ारों-हज़ार सालों से हम स्त्री को देवी मानते आए हैं और उसका चीरहरण भी करते रहे हैं. दोनों ही कामों में हमें महारत हासिल है. हम पूरी तन्मयता से, बिना शर्मिंदा हुए, एक जैसी श्रद्धा से ऐसे कारनामे कर सकते हैं.
बेंगलुरु में स्त्री-सम्मान की नई ऊंचाइयां
औरतों को मान बख्शने की ताजातरीन घटना बेंगलुरु की है. जहां किसी इक्के-दुक्के ने नहीं, बल्कि एक पूरे हुजूम ने औरतों के सम्मान की सड़क पर ही प्रदर्शनी लगा दी थी. नए साल के जश्न वाली रात को सभ्यता के ध्वजवाहक भारत देश की सभ्य, शालीन, संस्कारी मर्द बिरादरी लड़कियों के कपड़े फाड़ने पर उतारू हो गई थी.
तस्वीर साभार बेंगलुरु मिरर
मॉलेस्टेशन करने वालों के हौसले इतने बुलंद थे कि पुलिसवालों के होने के बावजूद वो ज़रा न घबराए. ये उदाहरण काफ़ी है ये बात अंडरलाइन करने के लिए कि हमारे पुरुष-प्रधान समाज का एक बड़ा हिस्सा, बहुत बड़ा हिस्सा, औरतों को एक ऑब्जेक्ट की तरह देखने का आदी है. और उसे किसी की फ़िक्र नहीं, किसी का खौफ़ नहीं.
उनका ये अपमान ही क्या कम था कि अब इसमें हमारे सो कॉल्ड जनप्रतिनिधि भी शामिल हो गए हैं. 'मास मॉलेस्टेशन' के बाद अब 'मास इंसल्ट' की बारी है. एक नहीं बल्कि दो-दो नेताओं ने निहायत ही शर्मनाक बयान देकर बेंगलुरु की ट्रेजेडी को दोबाला कर दिया है.
नेताओं की बेक़ाबू ज़ुबान
बेंगलुरु वाली घटना पर प्रतिक्रिया देते हुए कर्नाटक के होम मिनिस्टर 'जी परमेश्वरा' ने कहा है, 'इस तरह की बातें होती रहती है.' उन्होंने उल्टे युवाओं को ही 'पश्चिम की नक़ल' करने पर लताड़ा. उनके इस बयान की चौतरफा आलोचना हो रही है. एक गृहमंत्री जैसी पोस्ट पर बैठा हुआ आदमी ही अगर इस ज़हनियत का होगा तो बाकी लोगों से क्या शिकायत की जाए?

मूर्खता के इस जाहिर प्रदर्शन में उनके पार्टनर बने हैं समाजवादी पार्टी के विधायक अबू आज़मी. उनकी गाड़ी भी औरतों के कपड़ों में ही जा फंसी है. आज़मी साहब बोले,
"ये तो होना ही था. उन्होंने छोटे-छोटे कपड़े पहन रखे थे. औरतें आज-कल नंगई को ही फैशन कहने लगी हैं." उन्होंने बिन मांगे औरतों को सलाह दे डाली कि वो भारतीय परम्पराओं का पालन करें और जब भी बाहर निकलें परिवार के साथ निकलें.

ये तो हाल है हमारे रहनुमाओं का. सारी गलती औरतों की हैं. कितने बड़े-बड़े गुनाह है उनके!
वो छोटे कपड़े पहनती है, अकेली बाहर घूमती है, नए साल की पार्टी मनाना चाहती है, मर्द की बैसाखी के बिना खुद के पैरों पर खड़ी होना चाहती है, बिना किसी पुरुष से इजाज़त लिए सांस ले रही है. कितनी सारी गलतियां! जिन्होंने सड़क पर बेहूदगी की नई इबारत लिखी, उन पुरुषों पर दोनों में से किसी ने एक शब्द बोलने की ज़रूरत नहीं समझी. उनकी करतूत की वजह से सभ्यता को खरोंच तक नहीं आई है. हां, लड़कियों के छोटे कपड़ों से संस्कृति माई फ़ौरन कोमा में चली जाती हैं.
https://www.youtube.com/watch?v=QcjUu6ed2l4 जहालत की ये सरेआम नुमाइश देखकर यकीन हो जाता है कि हम वाकई विश्वगुरु हैं.
पाखंड में, दोहरेपन में, हिप्पोक्रेसी में. साहिर याद आते हैं,
मदद चाहती है ये हव्वा की बेटी
यशोदा की हमजिंस, राधा की बेटी
पयंबर की उम्मत, जुलेखा की बेटी
जिन्हें नाज़ है हिंद पर वो कहां हैं ज़रा मुल्क के रहबरों को बुलाओ
ये कूचे, ये गलियां, ये मंजर दिखाओ
जिन्हें नाज़ है हिंद पर उनको लाओ
जिन्हें नाज़ है हिंद पर वो कहां हैं जिन्हें नाज़ है हिंद पर वो कहां हैं....
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