
ट्रेंडिंग में अभी नहीं आया है
ये जलेबी बनाने का कोई फायदा नहीं, डिरेक्ट ट्रेलर पर आते हैं यार. ट्रेलर देखकर लगता है कि ये फिल्म ठग्स ऑफ हिंदोस्तान का रिकॉर्ड तोड़ेगी कमाई के मामले में. देखने वालों ने मुंह फुला रखा है कि 3 मिनट 19 सेकेंड की फिल्म देख ली किसी तरह, पूरी फिल्म कैसे देखेंगे. इससे पहले के देशप्रेम, अंग्रेजों की गुलामी इत्यादि सोचकर आप मेरे ऊपर गालियों के भेस में वर्चुअल अंडे टमाटर बरसाएं, मैं अपना वो जो है, वो क्या कहते हैं, ऑब्जर्वेशन आपको देता हूं
राजा रानी खतम कहानी

बुंदेले हरबोलों के मुंह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वो तो झांसी वाली रानी थी. सुभद्रा कुमारी चौहान की ये कविता हमारी नसों में खून की तरह दौड़ रही है. काहे कि हम यूपी बोर्ड में पढ़े हैं और हमारे सिलेबस में थी. तो भैया झांसी की रानी की कहानी भूलना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है. लेकिन ये ट्रेलर भी रानी की तरह याद रहेगा, इसमें संदेह है. सवा तीन मिनट के ट्रेलर में पूरी कहानी दिख रही है. पूरी कहानी में सिर्फ रानी दिख रही है. रानी के भेस में कंगना. और किसी को कोई स्पेस नहीं मिल रहा है.

ये चलो ठीक भी है, रानी ओरिएंटेड कहानी है तो उनके अलावा किसी को फुटेज मिलनी भी नहीं चाहिए. लेकिन बाहुबली जैसी कहानी लिखने वाले के विजयेंद्र प्रसाद ने इसके ट्रेलर में कोई योगदान नहीं दिया है. अच्छे ट्रेलर की ये खासियत होती है कि वो फिल्म के हर खास सीन को थोड़ा सा दिखाकर उस मोड़ पर छोड़ता है जहां से दर्शक का मन अकुला जाए कि अमा अब तो देखना ही है इसको. मणिकर्णिका का ट्रेलर देखकर आपको लगा है कि कुछ देखने को बचा है? ईमानदारी से बताइयेगा. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर फिल्म बनाना और उसका ट्रेलर काटना संजय लीला भंसाली से सीखना चाहिए. पद्मावत का ट्रेलर देख लो. कहानी पद्मावती की लेकिन भौकाल खिलजी और राणा सा को भी कम नहीं मिला था.
नकली नकल

कुलभूषण खरबंदा और सुरेश ओबेराय
ढेर सारा स्लो मोशन. नकली लगते बाघ को मारना. लपककर हाथी पर खड़े हो जाना. डैनी, कुलभूषण खरबंदा, सुरेश ओबेराय के कॉस्ट्यूम से लेकर दो दो शब्द के डायलॉग सब नकली लगे हैं. हां तलवार बाजी और खून खच्चर कुछ कुछ ठीक लगता है. और भाईसाब वो मुंडी हाफ कट वाला सीन तो 18 प्लस है यार.

18+ सीन है यह
टू मच वायलेंस. युद्ध में तो यही होता है. तलवार चलती है तो ये थोड़ी देखती है कि किसी का हाथ कट रहा है या नाक कट रही है. और तो और राजा गंगाधर राव भी बिल्कुल इम्प्रेसिव नहीं लगते. कुल मिलाकर पूरा भार कंगना रानौत पर है. और वो पावरफुल एक्ट्रेस हैं, उम्मीद है फिल्म की नैया किनारे लगाएंगी.
बवाल की रानी
इस फिल्म का नाम झांसी की रानी होने की बजाय बवाल की रानी होना चाहिए. केतन मेहता ने पहले कहानी चुराने का आरोप लगाया. फिर पता चला कि फिल्म में डायरेक्टर का काम भी कंगना रानौत देख रही हैं. अभी ट्रेलर के डायरेक्टर क्रेडिट में ये बात दिख भी रही है. बीच में फिल्म की 40 दिन की शूटिंग दोबारा करनी पड़ी थी क्योंकि कंगना इससे संतुष्ट नहीं थीं. उसके पहले सोनू सूद ने फिल्म छोड़ दी थी जिस पर बंपर बवाल हुआ था.

इस गेटप में थे सोनू सूद
कंगना ने कहा था कि सोनू सूद महिला डायरेक्टर के अंडर में काम नहीं करना चाहते. उन्होंने फिल्म में एक कुश्ती सीन खुद डलवा दिया ताकि उनकी बॉडी दिखे. सोनू सूद ने जवाब देते हुए कहा था कि मुद्दा डायरेक्टर का जेंडर नहीं बल्कि क्षमता है. मने कंगना उनको डायरेक्टर के तौर पर मेच्योर नहीं लगी थीं. जिस मराठा वॉरियर का रोल सोनू सूद कर रहे थे वो फिर जीशान अय्यूब को मिल गया लेकिन जीशान ट्रेलर में कहीं नहीं दिखे. हो सकता है अभी उनका वाला सीन शूट हो रहा हो. लेकिन लगभग साढ़े तीन मिनट के ट्रेलर में इत्ते बड़े करेक्टर का सीनै नहीं है. क्या बताएं यार.

बाकी सब ठीक है ट्रेलर में. फर्स्ट डे फर्स्ट शो देखने के बाद हमारे यहां से रिव्यू करने जाने वाला कोई आपको बता ही देगा कि फिल्म कैसी है. 25 जनवरी बहुत दूर नहीं है. लेकिन ट्रेलर ये तो तय करता ही है कि 26 जनवरी की छुट्टी आप टीवी पर परेड देखकर बिताने वाले हैं या टिकस खरीदकर सिनेमाहॉल में ये पिच्चर देखकर. ट्रेलर देख लो.






















