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काटजू की इस बात से अखिलेश हो जाएंगे बमबम, मायावती होंगी नाराज़

जस्टिस काटजू ने क्या कह दिया फिर से? पढ़िए

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फोटो - thelallantop
जस्टिस मार्कंडेय काटजू के पास इफ़रात में वक़्त है. वो आंगन में बैठे उस खलिहर फूफा की तरह हैं, जिनके पास हर मुद्दे पर कहने के लिए कुछ न कुछ होता है. कोई सुने ना सुने इन फूफाओं को अपनी बात कहनी ही होती है. वो भी पूरी संजीदगी से. जस्टिस काटजू वैसे भी बहुत कुछ कहते रहने के लिए मशहूर हैं. इस बार उन्होंने कुछ नया करने की ठानी और उत्तर प्रदेश चुनावों का ओपिनियन पोल जारी कर दिया. उनके आंकड़ों से अखिलेश यादव की बांछे खिलनी वाली है. जिस्म में वो जहां कहीं भी होती हो. हां बसपा सुप्रीमो मायावती को उनसे गंभीर असहमति होगी. भाजपा तो खैर खफ़ा होगी ही होगी.
पूर्व न्यायाधीश की माने तो इस बार उत्तर प्रदेश में अखिलेश के नेतृत्व में सपा की पूर्ण बहुमत वाली सरकार आएगी. वो भी दो-तिहाई सीटों के साथ. भाजपा को बसपा से भी कम सीटें दे रहे हैं काटजू. अपनी एक बहुत लंबी फेसबुक पोस्ट में उन्होंने विस्तार में बताया कि ऐसा क्यों होगा.
उनकी भविष्यवाणी के मुख्य आकर्षण कुछ इस प्रकार हैं:
  • उनके अनुसार ज़्यादातर राज्यों में चुनाव जाती/धर्म आधारित ही होते हैं. बशर्ते कि किसी नेता की लहर ना हो जैसे 2014 में नरेंद्र मोदी की थी. फिलहाल मोदी लहर मंद हुई है और नोटबंदी की वजह से भी लोग उनसे नाराज़ हैं. उन्हें लगता है कि आम आदमी, छोटे और मध्यम व्यापारी, किसान वगैरह भाजपा के खिलाफ़ जाएंगे.
  • भाजपा का वोटबैंक उच्च जाति के हिंदू हैं. ये लगभग 20% हैं. 5 से 6 परसेंट ओबीसी वोट मिल सकते हैं. ये 26 प्रतिशत का आंकडा जीतने के लिए ज़रूरी 30 परसेंट से काफी नीचे है. इसके अलावा नोटबंदी की वजह से लगभग 5 प्रतिशत और घटेगा. नोटबंदी से कई नौकरियां गई हैं और सभी जाति-धर्मों के लोगों को इस मूर्खतापूर्ण फैसले से दिक्कतें उठानी पड़ी है.
  • 2014 में लोगों ने, ख़ास कर युवाओं ने भाजपा को जिताया था क्यों कि उन्हें भरोसा दिलाया गया था कि ‘विकास’ के आगमन के बाद लाखों नौकरियां क्रिएट होंगी. लेकिन ऐसा हुआ नहीं. उनका मानना है कि इसका खामियाज़ा भाजपा को भुगतना पड़ेगा.mark1
  • उनकी गणना के अनुसार बसपा का वोटबैंक एससी और एसटी मिलाकर 22% है. वहीं सपा का वोट बैंक ओबीसी है जो 20 से 22% होगा. कांग्रेस को वो ये कहते हुए खारिज करते हैं कि कांग्रेस का कोई वोटबैंक आज की डेट में उतर प्रदेश में है ही नहीं.
  • जस्टिस काटजू मुसलमानों को इन चुनावों में ‘की’ फैक्टर मानते हैं. वो कहते हैं 18 से 19 प्रतिशत मुसलमान एक बड़ा वर्ग है जो जिस तरफ झुकेगा उसे जिता देगा. कुछ लोगों की इस बात को कि मुस्लिम वोट बंटेगा, वो नकारते हैं. उनके अनुसार मुसलमान बीजेपी को अपना मुख्य दुश्मन मानते हैं. ‘घर-वापसी’, ‘अखलाक़’, ‘हेट-स्पीचेस’, ‘मुज़फ्फरनगर’ जैसे मुद्दों से डरे भी हुए हैं. तो सबसे ज़्यादा संभावना उन्हें इसी बात की लगती है कि वो इकठ्ठा होकर बीजेपी को हराने के लिए वोट करेंगे.mark 2
  • उनको पहले लगता था कि मुसलमान बसपा के साथ जाएंगे क्यों कि सपा सरकार में क़ानून-व्यवस्था के बुरे हाल थे और मुज़फ्फरनगर जैसी घटनाएं भी हुई. लेकिन हालिया नाटकीय घटनाओं में अखिलेश यादव जिस तरह से मज़बूत बन कर उभरे हैं, उनका अनुमान है मुस्लिम्स सपा के झंडे तले आ जाएंगे. उनका दावा है कि अपने पिता या चाचाओं के हस्तक्षेप के बिना अखिलेश प्रॉमिसिंग लगते हैं. वो एक मॉडर्न युवा हैं और उनकी छवि भी साफ़ है.
  • जिनको लगता है सपा में पड़ी फूट से उसे नुकसान होगा उनसे काटजू को इत्तेफाक नहीं है. वो समझते हैं कि लगभग सारी पार्टी अखिलेश के साथ है. एक नए, युवा और जोशीले नेता की सदारत में सपा का ब्राइट चांस लगता है उन्हें.
  • उनके मुताबिक़ अपना लगभग 22 परसेंट का परंपरागत वोट, 19 प्रतिशत के करीब मुस्लिम वोट के साथ मिलाकर सपा 40 प्रतिशत तक पहुंच जायेगी. जो उसकी जीत सुनिश्चित करती है. सपा और कांग्रेस का संभावित गठबंधन यूं तो उन्हें कोई ख़ास अपील नहीं करता लेकिन उन्हें लगता है कि इससे एक सेक्युलर फ्रंट के होने का मैसेज जाएगा जो मुसलमानों को और भी आकर्षित करेगा.mark 3
अपनी इन तमाम भविष्यवाणियों में काटजू साहब एक बेसिक बात या तो जानबूझकर भूल जाते हैं या फिर सामान्यीकरण के शिकार हैं. वो समझते हैं कि तमाम दलित बसपा के वोटर हैं, सारे मुस्लिम्स सपा के साथ जाएंगे, सारी उंची जातियां बीजेपी की झोली में गिरेंगी. जबकि हकीकत में ऐसा कभी नहीं होता.
एक बेहद सतही वर्गीकरण करता हुआ ये ‘काटजू-पोल’ राजनितिक गलियारे में चाहे जितनी अहमियत रखता हो लेकिन लोगों की दिलचस्पी का केंद्र ज़रूर बन सकता है. सोशल मीडिया पर अपनी बेबाक टिप्पणियों के लिए मशहूर जस्टिस काटजू को, पढ़कर पसंद करने वाले और पढ़कर ख़ारिज करने वाले दोनों ही तरह के लोगों की संख्या बेशुमार है. उनका ये सर्वे हलचल तो ख़ूब मचाएगा.
नतीजे क्या आयेंगे ये तो दो महीने बाद पता चलेगा लेकिन तब तक के लिए ये पोल ‘टॉक ऑफ़ दी टाउन’ रहेगा ही. और कुछ नहीं तो कम से कम अखिलेश यादव खुश तो हो ही सकेंगे.
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