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'मुग़ल-ए-आज़म' और 'पठान' की सक्सेस में क्या है अंतर?

पढ़िए बॉलीवुड में सक्सेस के पैमाने कैसे वक़्त के साथ बदलते रहे हैं.

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बॉलीवुड के बदलते पैमाने

K.G.F 2 – 435 करोड़ 

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RRR – 275 करोड़

ब्रह्मास्त्र – 258 करोड़

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दी कश्मीर फाइल्स – 253 करोड़

पठान – 600 करोड़ प्लस (पहला हफ्ता)

संडे की शाम पापा से फिल्मों की कमाई पर डिस्कशन होने लगा. आजकल फिल्में करोड़ों कमा रही हैं. 200-300 करोड़ अब आम हो गया है. आए दिन कोई न कोई फिल्म पिछले collections का रिकॉर्ड तोड़ रही है. सबसे रीसेंट उदाहरण तो पठान का ही है, जो सिर्फ eक हफ्ते में ही 600 करोड़ के पार पहुंच गई. यही किसी भी फिल्म की सक्सेस का पैरामीटर होता है. यह आंकड़े सुनकर पापा कई साल पीछे चले गए. सिनेमा की भाषा में इसे ही फ्लैशबैक कहा गया है. मुझे भी मौका मिला इस फ्लैशबैक में झाँकने का. वो ज़माना, जब फिल्में देखने के लिए मल्टीप्लेक्स नहीं बल्कि सिंगल स्क्रीन सिनेमा हॉल में लोग जाया करते थे. वो ज़माना, जब फिल्म रिलीज़ की जानकारी सोशल मीडिया से नहीं बल्कि गली-कूचों और सिनेमा हॉल के बाहर लगे पोस्टर से मिला करती थी. वो ज़माना, जब फिल्मों की सफलता पैसों से नहीं बल्कि हफ़्तों में नापी जाती थी. जितने ज्यादा हफ़्तों तक फिल्म सिनेमा में चलती थी, वह उतनी ही बड़ी हिट या फ्लॉप मानी जाती थी और इसी से तय होता फिल्म में काम करने वाले एक्टर्स का कद.

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इस फ्लैशबैक में सब कुछ बढ़िया चल रहा था. मैं खुद उनके ज़माने के सिंगल स्क्रीन सिनेमा हॉल तक पहुच गया था. लेकिन अचानक से पापा ने ब्रेक लगाया और कहानी की दिशा को बदलते हुए कंटेंट, लिरिक्स, म्यूजिक जैसी फालतू की लॉजिकल बातें करने लगे. भला फिल्मों की सफलता का इनसे क्या लेना-देना? लेकिन वो यहीं पर नहीं रुके. अब हमारे पिताजी ‘हमारे ज़माने में तो.....’ वाले जोन में जा चुके थे. उन्हें रोकना नामुमकिन हो चुका था. लेकिन मुझे अब भी समझना था. हम तो 4 दिन में डिसाइड कर लेते हैं कि फिल्म हिट होगी या फ्लॉप. ये हफ़्तों वाला क्या सिस्टम है? पिताजी को रोककर मैंने यही सवाल किया. उन्होंने शुरुआत की जुबिली कुमार यानी राजेंदर कुमार से. जिनकी कई फिल्में 25 हफ़्तों से ज्यादा चली. 25 हफ्ते होने पर कहा जाता था कि इस फिल्म ने सिल्वर जुबिली पूरी कर ली है. इसी तरह 50 हफ़्तों को गोल्डन जुबिली, 75 को प्लैटिनम और 100 हफ़्तों को डायमंड जुबिली कहते थे. जितने भी बड़े एक्टर्स रहे इन्होने लगातार जुबिली वाली हिट मूवीज़ दी.

अब बिना फैक्ट्स के किसी भी बात पर कैसे भरोसा किया जा सकता है? हो सकता है अपने ज़माने को सुपीरियर बताने के लिए बात को बढ़ा-चढ़कर बताया जा रहा हो. तो शुरुआत हुई राज कपूर की बड़ी हिट्स से. 1949 में आई उनकी फिल्म बरसात, जिसमें नर्गिस भी थी. यह फिल्म 100 हफ़्तों तक कुछ सिनेमा हॉल में चलती रही. दिलीप कुमार की कल्ट फिल्म मुग़ल-ए-आज़म 150 हफ़्तों तक चली. आज भी इस फिल्म के डायलॉग सुने जा सकते हैं और गाने आते-जाते आपके कानों में पड ही जाते होंगे. इसी तरह राजेश खन्ना ने भी लगातार जुबिली हिट्स फिल्मों की लम्बी लिस्ट तैयार की थी. आराधना, दो रास्ते, बंधन, कटी पतंग, सच्चा-झूठा, आन मिलो सजना, आनंद, हाथी मेरे साथी और अमर प्रेम. ये राजेश खन्ना की वो मूवीज़ हैं जो कई हफ़्तों तक चलती रही. वहीं शोले जैसी महान फिल्म 250 हफ़्तों तक सिनेमा हॉल में लगी रही. शोले के आलावा, दीवार, अमर अकबर एंथनी, त्रिशूल, मुकद्दर का सिकंदर और डॉन जैसी फिल्मों ने अमिताभ बच्चन को एंग्री यंग मैन के नाम से एस्टैब्लिश किया.

बॉक्स ऑफिस पर कौनसी फिल्म कितने हफ़्तों तक चली इसी से तय होता था, आने वाले वक़्त के स्टार्स कौन होने वाले हैं.

1983 में आई सुभाष घई की हीरो, 100 हफ़्तों तक चली. इसी से उन्हें ‘शोमैन’ का टैग मिला. 1986 में श्रीदेवी की नागिन, प्लैटिनम जुबिली रही और इसी से काफी हद तक बॉलीवुड में उनका भविष्य तय हो गया था. इनके अलावा 90s की मूवीज़ DDLJ, करन-अर्जुन, राजा हिन्दुस्तानी भी सिनेमा हॉल में लम्बे वक़्त तक लगी रहीं.

इसके बाद दौर आया VCP (Video Casette Player) aur satellite TV का. इसे ही आज-कल की भाषा में disruptive innovation कहा जाता है. अब लोग अपने बेडरूम से ही बिलकुल ताज़ा और बड़ी फिल्में देख सकते थे. जैसे-जैसे केबल टीवी और VCP की लोकप्रियता बढ़ी, वैसे-वैसे सिनेमा हॉल में मूवीज के चलने का वक़्त कम होता गया. अब लोग लगान या टाइटैनिक जैसी बड़ी मूवीज के लिए ही सिनेमा हॉल का रुख कर रहे थे. इसी तरह केबल टीवी के बाद वक़्त आया एक और disruptive innovation यानी OTT. नेटफ्लिक्स और अमेज़न जैसे प्लेटफॉर्म का. एक से एक कंटेंट, फिक्शन हो या डॉक्युमेंट्री, रोमांटिक हो या सस्पेंस थ्रिलर, 2-3 घंटे की मूवी हो या कई एपिसोड्स और सीजन वाली सीरीज, फॅमिली ड्रामा हो या साइंस फिक्शन, अब सब कुछ आपकी जेब में है. यह भी एक कारण है कि सिनेमा हॉल तक लोगों को खींचने के लिए बॉलीवुड को कड़ी मशक्कत करनी पड़ रही है. उम्मीद है पठान ने जो माहौल बनाया है वो लम्बे वक़्त तक कायम रहेगा.

सिनेमा का ये सफ़र बड़े सिंगल स्क्रीन सिनेमाघरों से लेकर आपके मोबाइल फ़ोन तक पहुंच गया है. हफ़्तों का ये खेल अब बस कुछ दिनों के करोड़ों के COLLECTIONS तक सिमट गया है या कह सकते हैं कि और ज्यादा फ़ैल गया है. यह फैसला हम आपकी समझ और नज़रिए पर छोड़ देते हैं.   

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