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एक भुला दिया गया कवि जिसकी इंटरनेट पर एक तस्वीर तक नहीं

पढ़िए, कविता लिखकर स्वयं अपनी मृत्यु का साक्षात्कार करने वाले एक कवि के बारे में.

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पेंटिंग: The Poor Poet By Carl Spitzweg, 1837, Germany
‘‘मैं गलत वक्त पर भावुक इसलिए हो उठता हूं, क्योंकि सही वक्त पर कठोर बने रहना चाहता हूं.’’ ऊपर कोट की गई बात जितेंद्र कुमार की एक कहानी ‘मेरे शहर में घोड़े’ से है, और उसे यह स्वीकार करने में कतई झिझक नहीं है कि रोजमर्रा के तमाम प्रसंगों में उसे जितेंद्र कुमार का कवि-कथाकार अक्सर याद आता है. लेकिन दिक्कत यह है कि जितेंद्र कुमार की रचनाएं वह सिर्फ दिल-दिमाग में लेकर ही चल सकता है. किताब की शक्ल में वे उससे बिछुड़ती रही हैं. इंटरनेट पर जितेंद्र कुमार की एक तस्वीर तक नहीं है तो उनकी रचनाएं क्या होंगी. ‘कविता कोश’ और ‘हिंदी समय’ जैसी हिंदी साहित्य की मशहूर वेबसाइट्स कैसे-कैसे नामचीनों के साथ कैसे-कैसे नामहीनों से भरी पड़ी हैं, यह बताने की जरूरत नहीं. लेकिन यह बताना जरूरी है कि वहां ‘रतजगा’, ‘आईने में चेहरा’, ‘ऐसे भी संभव है मृत्यु’ जैसे कविता-संग्रहों के कवि और ‘वहीं से कथा’ जैसे कहानी-संग्रह के कहानीकार जितेंद्र कुमार नहीं हैं. वह कोई एक वर्ष तो जरूर था, जब साहित्यिक मासिक पत्रिका ‘कथादेश’ ने उन पर केंद्रित एक अंक निकाला था— संभव है उनकी मृत्यु पर. वह अंक उधड़ा हुआ था, जब आज से आठ-नौ साल पहले वह उसके हाथ आया. एक रोज उसने इस अंक को खोजते हुए पूरा घर उधेड़ दिया, लेकिन वह दोबारा हाथ नहीं आया. यह संयोग या दुर्भाग्य या नियति या पता नहीं क्या है कि जितेंद्र कुमार की किताबें उससे जर्जर हालत में ही मिलती और बिछुड़ती रही हैं. साहित्य अकादेमी की लाइब्रेरी में एक दुपहर उनका कविता-संग्रह ‘आईने में चेहरा’ पाकर वह लगभग खुश हो उठा था. हिंदी का एक युवा कवि इस खुशी का गवाह है जो इसके बाद से इस संग्रह में शामिल एक कविता-पंक्ति ‘मरी हुई चीजों पर मरता हुआ जीवन है’ कई प्रसंगों में अक्सर दोहराने लगा. एक बातचीत में जितेंद्र कुमार की कविताओं का जिक्र आने पर एक कथाकार ने उससे कहा था कि जितेंद्र कुमार की कहानियां भी पढ़नी चाहिए. यह कहने के बाद उस कथाकार ने अपनी स्टडी से ‘वहीं से कथा’ बहुत खोजकर उसे पढ़ने को दिया दिया था— जर्जर और अब बंद हो चुके संभावना प्रकाशन, हापुड़ से छपा हुआ. ये सारी घटनाएं साल 2006 में हुई जितेंद्र कुमार की मृत्यु के बाद की हैं, जब उनके रचनाकार से उसका परिचय हुआ. बाद में साहित्य की त्रैमासिक पत्रिका ‘समास’ के दो अंक उसने केवल इसलिए खरीदे क्योंकि उनमें जितेंद्र कुमार की कविताएं थीं. इनमें से ही एक अंक में उनके पहले कविता-संग्रह ‘रतजगा’ पर कवि-आलोचक-रंगकर्मी व्योमेश शुक्ल का बहुत कलात्मक और काव्यात्मक गद्य भी था. यहां तक आकर पढ़ने वालों के मन में शायद जितेंद्र कुमार के बारे में और जानने की जिज्ञासा बढ़ जाए, इसके लिए ‘समास’ में उनकी कविताओं के साथ दी गईं टिप्पणियां काम आएंगी जिनमें कहा गया : ‘‘जितेंद्र कुमार हिंदी के उन बेहतर कवियों में हैं जिन्हें हमारे साहित्य की तथाकथित प्रगतिशीलता और जनवादिता ने अपने चिर अज्ञान और तात्कालिक राजनीति के कारण कभी प्रकाश में नहीं आने दिया. जितेंद्र की कविताओं को निर्मल वर्मा जैसे मूर्धन्य लेखक पसंद करते रहे, पर हमारी अकादमियों पर छाए मार्क्सवादी अंधकार में उन पर कभी गहन विचार करने की स्थिति नहीं बन सकी. उनके चार कविता-संग्रह, दो कहानी-संग्रह और तीन उपन्यास प्रकाशित हुए. ‘ऐसे भी संभव है मृत्यु’ जैसी कविता लिखकर — जो हिंदी की प्रसिद्ध कविताओं में गिनी जाएगी — स्वयं अपनी मृत्यु का साक्षात्कार करने वाले जितेंद्र कुमार को जब अपने डॉक्टर-सैनिक बेटे देवाशीष की मृत्यु की खबर मिली, वह भीतर से टूट गए. घर से बाहर पहले ही वह कम निकलते थे, इस हादसे के बाद, उन्होंने खुद को अपने ही घर में कैद कर लिया.’’

अब पढ़िए जितेंद्र कुमार की कुछ कविताएं

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संगीत

रातों को जब नींद नहीं आती मैं अपनी सारी इच्छाएं सूत्रबद्ध करना चाहता हूं प्यास का एक सूखा संगीत मुझे जीवित रखता है जब बहुत प्यास लगती है पानी के बर्तन में मुझे सांप नजर आते हैं पर जब सांपों से डरने लगता हूं और सपनों का अस्तित्व भूल जाता हूं प्यास का वह सूखा संगीत एक भूले हुए गीत की धुन की तरह मुझे याद आता रहता है * शीर्षकहीन और अचानक मुझे बोध हुआ जब दार्शनिक, सुधारक राजनीतिज्ञ और ढोंगी समग्र जीवन-मूल्यों पर विचार कर रहे थे एक पूरी सृष्टि मेरे विरुद्ध अड़ी थी रोजमर्रा की छोटी-छोटी बातों में और निरर्थक छिछली भावनाओं के उत्तेजित विस्तार में नर्क था! मैंने झील को देखा और वह पड़ी थी वहां ठंडी, तीक्ष्ण और निर्वैयक्तिक! अकस्मात जब मैं उसमें कूदने को था वह मुझे अंदर तक बेध गई और मैंने चाकुओं को पसलियों से टकराते हुए सुना! — वहां भी स्वागत मेरा नहीं था मैं सड़क की ओर निकला तो वह भी उतनी ही निस्पृह लेटी थी कुत्ते और गधे, सवारियां और सुंदरताएं मेरे साथ-साथ उस पर चल रही थीं मैं कभी जान नहीं पाया कि वह अच्छाई जिसका दावा मैं अपने अंदर करता हूं क्या एक छद्म भी नहीं है! * मनवांछित धीरे से पृथ्वी का स्पर्श करो सुख होगा कुछ तो अब संयम से काम लो लौटो जब शाम को तो काम की बात मत करो अपने में गुम होकर लेटो वहीं धरती पर सुख होगा * महत्वपूर्ण लोग मैं जब महत्वपूर्ण लोगों को देखता हूं तो बिल्कुल एक बच्चे-सा चकित रह जाता हूं वे कैसे सदा अपने को इतना महत्वपूर्ण बनाए रखते हैं लोग ही तो होते हैं वे लिखने के बाद या उसके बाद मुझे निराशा होती है मैंने सब देर से किया जैसे कहीं जाते वक्त किसी और का ख्याल आ जाए पर कुछ लोग इतने निश्चित होते हैं कि शुरू से ही अपनी मंजिल पर खड़े होते हैं * दूरियां नापने के लिए दूरियां नापने के लिए समुद्र चाहिए सुबह सूर्य दमदमाता हुआ निकलता है शाम गए थका तारा बच्चे की उछाल फेंकी गेंद-सा उसमें जा बुझता है मरी हुई चीजों पर मरता हुआ जीवन है अंधियाती रेत पर प्रेमहारी लड़की अब तक खड़ी रोती है समुद्र उसे समझाने उस तक लाड़ भरा शाम गए आता है
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